••॥#वैकुंठ_की_कुंठा॥••#भाग_१

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Ashutosh Rana

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कुंठा रहित स्थान को वैकुंठ कहा जाता है, जहाँ विश्व के प्रत्येक अणु में प्रकाशित होने वाली ऊर्जा भगवान विष्णु समस्त चराचर जगत् को उसके लक्ष्य तक पहुँचाने वाली शक्ति, श्री लक्ष्मी जी के साथ निवास करते हैं।
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किंतु इस समय वैकुंठ में कुंठा व्यापी हुई थी, माता श्री लक्ष्मी व्यथित, चिंतित और दुखी थीं।
इसका कारण था, राजा बली ने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया था, जिससे इंद्र आदि देवता व्यथित थे। भगवान विष्णु राजा बलि की तपस्या और विक्रम से उत्पन्न प्रताप को क्षीण करने हेतु गए हुए थे, किंतु अभी तक वापस नहीं लौटे थे, उनका कहीं पता भी ना था !

अपने प्रिय के खो जाने पर समस्त संसार भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी से प्रार्थना करता है कि मुझे मेरा खोया हुआ प्रिय फिर से मिल जाए, और वे उस प्रार्थी की प्रार्थना को पूर्ण करते हैं, किंतु जब समाधान स्वयं ही समस्या से ग्रस्त हो तो वो किसका आश्रय ले ?

माता श्री लक्ष्मी ने विचार किया की नारद जो उनके मानस पुत्र हैं और श्रीहरि के सबसे बड़े भक्त भी हैं, उन्हें अवश्य ही प्रभु की जानकारी होगी। क्योंकि परमात्मा की जानकारी शक्ति को भले ही ना हो, किंतु भक्ति को अवश्य होती है।


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उन्होंने श्री नारद जी को बुला भेजा, नारद जी तत्काल ही माता के सामने उपस्थित हुए। माँ को व्यथित, कुंठित देख आश्चर्य से भरे हुए बोले- माता वैकुंठ में रहते हुए कुंठित रहना आपको शोभा नहीं देता।

माता लक्ष्मी ने कहा- पुत्र नारद, अकेली लक्ष्मी जहाँ होती है वहाँ कुंठा ही व्याप्ति है, ये लोक तो कुंठा रहित तब होता है जब श्रीहरि इसमें विराजते हैं। लोक से श्रीहरि का लुप्त हो जाना ही कुंठा को जन्म देता है। श्रीहरि का कहीं पता नहीं है नारद !

नारद जी ने मुस्कुराते हुए कहा- समस्त विश्व को उसके लक्ष्य तक पहुँचाने वाली माता श्रीलक्ष्मी, आपकी उपस्तिथि ही परमात्मा श्रीहरि के उपस्तिथ होने का प्रमाण है, आप स्वयं ही अपने लक्ष्य तक ना पहुँच पाएँ यह अविश्वसनीय है !

माता लक्ष्मी ने बहुत गम्भीरता पूर्वक कहा- नारद, विस्मय मत करो- शक्ति को सत्ता तक पहुँचने के लिए नारद जैसे संत का आश्रय अपेक्षित होता है। शक्ति जब सत्ता विहीन होती है तब वह विपत्ति निवारक नहीं विपत्ति कारक हो जाती है। मुझे भय लग रहा है नारद, श्रीहरि की अनुपस्थिति में ये संसार मेरा दुरुपयोग करते हुए मर्यादा का हनन करेगा। इसलिए ये शक्ति रूपी लक्ष्मी, भक्ति रूपी नारद से, सत्ता रूपी नारायण के संधान का निवेदन कर रही है।

नारद ने हँसते हुए कहा- माता ये उलटी बात है ! मैंने देखा है कि संसार आपकी पूजा, अभ्यर्थना करके श्रीहरि तक पहुँचने का प्रयास करता है। तभी तो जिनके पास लक्ष्मी होती है संसार उन्हें परमात्मा स्वरूप ही मानने लगता है।

माता ने कहा- परमात्मा दिखने और परमात्मा होने में बहुत अंतर होता है नारद। यह संसार की भूल है, वह मुझे प्रसन्न करके श्रीहरि की कृपा तो प्राप्त कर लेता है किंतु श्रीहरि को प्राप्त नहीं कर पता। इसलिए तुमने देखा होगा की मैं उस स्थान, उस व्यक्ति के पास कुछ समय के लिए रूकती तो हूँ किंतु वहाँ टिकती नहीं हूँ।
लक्ष्मी को साधकर श्रीहरि को नहीं पाया जा सकता किंतु जिसने श्रीहरि को साध लिया उससे लक्ष्मी स्वमेव प्राप्त हो जाती है, क्योंकि मेरा स्थाई वास तो श्रीहरि के चरणों में है।
नारद श्रीहरि के बिना मैं बहुत व्याकुल हूँ, तुम उनका पता करो अन्यथा ये वैकुंठ लोक कुंठित लोक में परिणित हो जाएगा। क्योंकि जब समाधान ही समस्या बन जाए तो भयंकर अराजकता का जन्म होता है।


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नारद ने शिष्टता पूर्वक अपनी असहमति व्यक्त करते हुए कहा- आप कैसी बातें करती हैं माते ? आप तो संसार की सृजना शक्ति हैं, भला आपके होते हुए अराजकता का जन्म हो सकता है ?

मैं संसार की माँ हूँ नारद, और पिता के ना रहने पर बच्चे बहुधा माँ के साथ बुरा व्यवहार करते हैं, इस संसार में जन्म लेने वाली प्रत्येक कन्या, चाहे वो किसी की भी माँ, बहन, बेटी क्यों ना हो वह मेरा अर्थात लक्ष्मी का ही रूप होती है, मातृभूमि और ये पृथ्वी भी मेरा ही रूप है।
मातृशक्ति, मातृभूमि के साथ किया गया बुरा व्यवहार संसार के जघन्य अपराधों की नहीं, पाप की श्रेणी में आता है।
जब श्रीहरि लुप्त हो जाते हैं तब मेरी ही संताने अपने अविवेक के अधीन होकर मेरा हरण, मेरा क्षरण करने लगते हैं, परिणामस्वरूप वे सभी मरण के मार्ग पर अग्रसर होते हैं। वे भूल जाते हैं की लक्ष्मी हरण का नहीं अपितु वरण का विषय है। वे भूल जाते हैं की वे अपने निर्माता का नाश करने के उपक्रम में स्वयं का सर्वनाश कर बैठे।
इसलिए तुम जाओ और किसी भी विधि से श्रीहरि का पता लगाओ कि वे कहाँ हैं ? ताकि मैं उनको फिर से वैकुंठ में स्थापित कर इस लोक को कुंठा से मुक्त करूँ।
जो आज्ञा माता कहते हुए नारद जी वहाँ से विदा ले गए।
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तीनों लोकों में निर्बाध विचरण करने वाले नारद को पता चला कि भगवान विष्णु एक बौने ब्राह्मण के रूप में पाताल लोक में राजा बलि के यहाँ द्वारपाल के रूप में नियुक्त हैं !
नारद, राजा बलि के महल के उस द्वार पर पहुँचे जहाँ असंख्य आकाशगंगाओं को अपनी मुट्ठी में समेट लेने वाले श्रीहरि एक बटुक के रूप मात्र बावन अंगुल के होकर बहुत सजगता से खड़े हुए महल की चौकीदारी कर रहे थे। श्रीहरि के बटुक रूप को देख नारद हास्य से भर गए और नारायण नारायण कहते हुए बोले~#आशुतोष_राणा

#क्रमशः …