☆अल्लाह तआला से अपनी बात मनवाने का बेहतरीन तरीक़ा, क़िस्सा एक बुज़ुर्ग का👇

Posted by

मैं ने एक बुज़ुर्ग से एक सवाल पुछा के अल्लाह तआला से अपनी बात मनवाने का बेहतरीन तरीक़ा क्या है…?
बुज़ुर्ग ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुरा कर बोले तुम्हें अल्लाह तआला से क्या चाहिये..?
हम दोनों इस वक़्त जंगल में बैठे हुए थें और गर्मी के मौसम में सांस तक लेना मुशकिल हो रहा था, मैं ने मुसकुरा कर बुज़ुर्ग से अर्ज़ किया के इस कड़कती धुप में ठंडी हवाएं चलने लगे और बादल आ जाए तो मौसम अच्छा हो जाएगा,
मेरी ये फरमाईश सुन कर बुज़ुर्ग हंसने लगे और बोले लो देखो, उसके बाद वो बुज़ुर्ग नमाज़ के लिये खड़े हो गये,
नमाज़ के बाद अल्लाह तआला की बारगाह में दुआ के लिये हांथ उठाया, उनके आंखों से आंसु जारी होने लगे, वो रोते जाते और दुआ करते जा रहे थे,
उनके मुंह से सिसकियों की आवाज़ें आने लगी वो बहुत गिड़गिड़ा कर रो रहे थें, मैं उनको इस हालत में देख कर परीशान हो गया,
मैं ने ज़िंदगी में बहुत से लोगों को रोते देखा था लेकिन इनका रोना अजीब था,
अभी दुआ ख़्तम भी न हुई थी के मैं ने फिर वहां अजीब मंज़र देखा,
हवा ठंड होने लगी थी मेरे चेहरे का पसीना सुख चुका था, मैं ठंडी हवा को महसुस कर रहा था और हैरान हो रहा था,
फिर देखते ही देखते कहीं से एक बादल का टुकड़ा आया और हमारे और सुरज के दरमियान ठहर गया,
बुज़ुर्ग रुके और दुआ के लिये हांथ उठाकर अल्लाह तआला का शुक्र अदा करने लगे,
वो काफी देर तक अल्लाह तआला का शुक्र अदा करते रहे, जब वो दुआ से फारिग़ हुए तो मेरी तरफ मुड़ कर बैठ गये, उनकी सफेद दाढी आंसुओं से पुरी तरह भीग चुकी थी,
उन्होंने जेब से रुमाल निकाला और दाढी साफ करते हुए बोले, देख लो अल्लाह तआला ने अपने दोनों बंदों की बात मान ली,
मैं ने उनका हांथ पकड़ कर चुमा और पुछा के बाबाजी अल्लाह तआला से बात मनवाने का फॉरमुला किया है..? अल्लाह तआला कब और कैसे राज़ी होतें है.?
वो मुस्कुराएं और बोले मैं ने ये फॉरमुला अपनी माँ से सीखा है, बचपन में जब भी मैं माँ से अपनी कोई बात मनवाना चाहता था तो मैं रोने लगता था, मेरा रोना मेरी माँ से बरदाश्त नही होता था, वो तड़प उठती थी मुझे गोद में उठा लेती थी मुझे चुमती थी और मेरी ख़ाहिशें भी पुरी करती थी,
मैं जब मदरसे में पढने जाता था तो एक दिन मौलवी साहब ने फरमाया अल्लाह तआला इंसान से सत्तर माँओं से ज़्यादा प्यार करता है, बस यही बात मेरे दिल में उतर गई,
मैं ने सोंचा मैं रो रो कर अपनी माँ से अपनी सारी ख़ाहिशें मनवा लेता हुं ,
फिर अल्लाह तआला तो हमें सत्तर माँओं से ज़्यादा प्यार करता है, तो फिर मैं रो रो कर उस्से क्या कुछ नही मनवा सकता,
वो रुके और बोले, बस वो दिन है और आज का दिन है मैं रोता हूँ और दुआ माँगता हूँ अल्लाह तआला की ज़ात में सत्तर माँओं की मुहब्बत जगाता हूँ ,
और मेरी हर ख़्वाहिश हर दुआ क़बुल हो जाती है।
दिन चाहे सुख के हों या दुख के,
खुदा अपने बन्दों के साथ हमेशा रहता हैं।