🏮*🏮*जो जिस क़ौम से मुशाबहत रखेगा उसका हश्र उसी के साथ होगा🏮*🏮*

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*🏮 मुसलमान 🏮*

*हदीस* – हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि *مَنْ تَشَبَّہَ بِقَوْمٍ فَہُوَ مِنْہُمْ* जो जिस क़ौम से मुशाबहत रखेगा उसका हश्र उसी के साथ होगा *📔 अबु दाऊद,हदीस 4033*
*📔 मिश्कात,सफह 375
📔 फैज़ुल क़दीर,जिल्द 6,सफह 104*

मुशाबेहत 2 तरह की होती है एक मज़हबी मुशाबेहत जैसे ज़न्नार या जिनीव बांधना माथे पर तिलक लगाना काफिरो के मज़हबी त्यौहार मनाना या उनके कुफ्रिया कामों में शामिल होना या उसकी मुबारक बाद देना अगर माज़ अल्लाह कोई मुसलमान इन कामों में मुलव्विस है तब तो वो खुद काफिर है,और दूसरी है क़ौमी मुशाबेहत ये उनका मज़हबी शियार तो नहीं मगर इससे भी परहेज़ चाहिए जैसे उनकी मुशाबेहत में उन जैसी वज़अ क़तअ बनाना कभी ये हराम होती है तो बाज़ मर्तबा ऐसी वज़अ क़तअ बनाना कुफ्र जैसे कि टाई बांधना क्योंकि ये ईसाईओं का मज़हबी निशान है कि उनके नज़दीक हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को सूली दे दी गयी माज़ अल्लाह जिसकी याद में वो सूली यानि क्रॉस का निशान अपने गले में टांगे फिरते हैं जब कि ये अक़ीदा महज़ बातिल है क्योंकि वो ज़िंदा आसमान पर मौजूद हैं और ये क़ुर्आन से साबित है लिहाज़ा मुसलमान का टाई बांधना हराम हराम हराम बल्कि उल्मा इसे कुफ्र तक लिखते हैं, उसी तरह मुसलमान का दाढ़ी मुंडाना या गैर शरई लिबास पहनना या औरतों का बे पर्दा घूमना या बोल-चाल में गैर इस्लामी अल्फाज़ इस्तेमाल करना खाने पीने में गैरों की तरह पेश आना ये सब भी मुशाबेहत है मगर ये कुफ्र नहीं हां इसके हराम होने में कोई कलाम नहीं,मिसाल के तौर पर हुज़ूर ताजुश्शरिया फरमाते हैं कि
*फुक़्हा* – पैंट पहनना या मर्दों का छोटे छोटे बाल रखना अगर चे ये भी नसारा की मुशाबेहत थी मगर चुंकि अब ये लिबास और तरीका सिर्फ उनका ही नहीं रहा बल्कि तमाम दुनिया के अफराद का हो गया है लिहाज़ा इस पर अब हराम का हुक्म नहीं लगेगा मगर कराहत से अब भी ये खाली नहीं है क्योंकि ये सुल्हा का लिबास तो हरगिज़ नहीं है *📔 टाई का मसला,सफह 19*

मगर आज के मुसलमान का तो हाल ही बुरा है वो तो कुफ्र भी माज़ अल्लाह ऐसे करता है जैसे कोई बात ही ना हो,कोई होली खेल रहा है तो कोई दीवाली मना रहा है कोई तो सीधा मुशरिकों की सूरतो हैबत बनाकर घूम रहा है फिर उस पर तुर्रा ये कि वो अब भी सच्चे पक्के मुस्लमान हैं,अभी पिछले साल अखबार में आया कि देवा शरीफ में वारिस पाक के अहाते में होली खेली गयी माज़ अल्लाह बल्कि तस्वीर तक आयी है कोई इससे इंकार नहीं कर सकता,जब नाम निहाद दीनदारों का ये हाल है तो अवाम तो वैसे ही जाहिल है उसे तो बस बहाना चाहिए और वो बहाना कुछ जाहिल मुल्ला अक्सर अवाम को फराहम कराते रहते हैं,अरे भाई इतनी सी बात समझ में नहीं आती कि जिसका जो त्यौहार है उसको मनाने दीजिये क्या आपके मज़हब में होली खेलना लिखा है अगर नहीं तो क्यों आप अपना ईमान खराब कर रहे हैं लेकिन अगर ईमान की इतनी ही फिकर होती तो ऐसा काम करते ही क्यों,उल्मा फरमाते हैं कि
*फतवा* – मुसलमान का गैर मुस्लिमो के मेलों में जाना हराम और अगर उनके कुफ्रिया कामों को अच्छा समझे जब तो काफिर,हां होली खेलना या राखी बंधवाना अगर चे ये उनका मज़हबी शियार नहीं है बल्कि क़ौमी शियार है इसलिए इसे कुफ्र नहीं कहा जा सकता मगर हराम तो है ही *युंही उनके त्योहारों की मुबारक बाद देना भी हराम है बल्कि कुफ्र के क़रीब है* लिहाज़ा उस पर तौबा तज्दीदे ईमान तज्दीदे निकाह लाज़िम है,युंही काफिरों को उनके त्यौहार के दिन तोहफा देना भी कुफ्र है
*📔 फतावा शारेह बुखारी,जिल्द 2,सफह 536/566*

*अब मुसलमान फैसला करले कि उसको यहां ऐशो-आराम चाहिए या आखिरत में क्योंकि दोनों जगह आराम मिलना मुश्किल है अगर यहां मुसीबत झेलेगा तो वहां नेअमत मिलना तय है और यहां आसानी ढूंढेगा तो वहां मुसीबत में पड़ जायेगा*