👍💐👍सभ्यता के दूसरे अंग ‘समता’ पर विचार करें👍💐👍

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तो इस विषय में इस्लाम ने सभी अन्य सभ्यताओं को बहुत पीछे छोड़ दिया है। वे सिद्धांत जिनका श्रेय अब कार्ल मार्क्स और रूसो को दिया जा रहा है वास्तव में अरब में जन्मे। मुहम्मद सल्ल. के सिवा संसार में और कौन धर्म-प्रणेता हुआ है जिसने ख़ुदा के सिवा किसी मनुष्य के सामने सिर झुकाना गुनाह ठहराया हो ?
मुहम्मद सल्ल. के बनाये समाज में बादशाह का स्थान ही नहीं था। शासन का काम करने के लिए केवल एक ख़लीफ़ा की व्यवस्था कर दी गई थी जिसे समाज के प्रतिष्ठित लोग चुन लें। चुने हुए खलीफा के लिए कोई वज़ीफ़ा, कोई वेतन, कोई जागीर, कोई रियायत न थी। यह पद केवल सम्मान का था। अपनी जीविका के लिए ख़लीफ़ा को भी दूसरों की तरह महनत मज़दूरी करनी पड़ती थी।
ऐसे-ऐसे महापुरुष जो एक बड़े साम्राज्य का संचालन करते थे, जिनके सामने बड़े-बड़े बादशाह अदब से सिर झुकाते थे, जिनके एक इशारे पर बादशाहतें बनती बिगड़ती थीं, जूते सी कर या किताबें लिखकर या बच्चों को पढ़ाकर अपनी जीविका अर्जन करते थे।
हज़रत मुहम्मद सल्ल. ने खुद कभी पेशवाई का दावा नहीं किया। ख़ज़ाने में उनका हिस्सा भी वही था जो एक मामूली सिपाही का। और अन्य संप्रदायों में गुरु-प्रथा ने जितने अनर्थ किये हैं उनसे इतिहास काला हो गया है। ईसाई धर्म में पादरीयों के सिवा और किसी को इंजील पढ़ने की आज़ादी न थी। हिन्दू समाज ने भी शूद्रों की रचना करके अपने सिर कलंक का टीका लगा लिया। पर इस्लाम पर इसका धब्बा तक नहीं।
ग़ुलामी की प्रथा तो उस वक़्त समस्त संसार में थी, लेकिन इस्लाम ने ग़ुलामों के साथ जितना अच्छा सलूक किया उस पर उसे गर्व हो सकता है। इस्लाम क़बूल करते ही ग़ुलाम आज़ाद हो जाता था। यहाँ तक कि ऐसे ग़ुलामों की कमी नहीं है जो अपने मालिक के बाद उसकी गद्दी पर बैठे और उसकी लड़की से विवाह किया। और किस समाज ने नीचों के साथ यह उदारता दिखाई है ?
कोमल वर्ग के साथ इस्लाम ने जो सलूक़ किये हैं उनके देखते अन्य समाजों का व्यवहार पाशविक जान पड़ता है। किस समाज में स्त्रियों का जायदाद पर इतना हक़ माना गया है जितना इस्लाम में ?
यूँ बुद्धि और धन की असमता हमेशा रही है, लेकिन इस्लाम ने समाज के किसी अंग के पैरों में बेड़ी नहीं डाली। वहाँ प्रत्येक व्यक्ति उतनी मानसिक और सामाजिक उन्नति कर सकता है जितनी उसमें सामर्थ हो। इस लिहाज़ से भी इस्लामी सभ्यता दोष रहित है।

(मुंशी प्रेमचंद)