1 घंटे बाद मुझे संयोग से चिक्की अधमरी हालत में मिल गई !~!!!

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Pratima Jaiswal
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जब मैं किसी भूखे कुत्ते को बिस्किट खिलाती हूं, तो आसपास के लोग देखकर कहते हैं कि यही बिस्किट किसी भिखारी को खिला देती. जब मैं किसी कुत्ते को पीटते हुए देखती और उसे बचाने की कोशिश करती हूं, तो सुनने को मिलता है कि इस देश में हर रोज लोग मरते रहते हैं. उनकी सुध लेनी चाहिए. कुत्तों या जानवरों के बारे में इतना क्या सोचना!
मुझे इन लोगों पर गुस्सा नहीं बल्कि तरस आता है. सही तो है, जिस देश में लोगों की स्थिति इतनी बदहाल है, वहां जानवरों के बारे में कैसे सोचा जाए? इंसान आज तक दो वक्त की रोटी, मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए आज भी निचले स्तर पर खड़ा है. ऐसे में जानवरों के बारे में सोचना बेमानी ही होगा. कहीं-कहीं तो इंसानों की स्थिति जानवरों से बदतर है. गर्भवती की डिलीवरी सड़क पर हो रही है, बच्चे ऑक्सीजन की कमी के चलते अस्पतालों में मर रहे हैं, मानसिक रोगी को एक मुट्ठी चावल चुराने के लिए पीट-पीटकर मार दिया जाता है. बच्चियों को रेप करके जला-काट दिया जाता है. अब तो ये खबरें अखबार भरने भर का ही काम करती हैं. उफ! पकाऊ-थकाउ टॉपिक.

ऐसे में कोई जानवरों के बारे में सोचेगा तो मानसिक रोगी ही लगेगा न? मैं हूं वो मानसिक रोगी जिसे बेजुबान जानवर का दुख चुप होकर नहीं देखा जाता. मैं जितना सामने तकलीफ में खड़े इंसान को देखकर विचलित होती हूं, उतना ही जानवरों की तकलीफ भी मुझे चुभती है.

एक ऐसा ही गली का आवारा बोले जाने वाला जानवर, जिसकी मदद करने के इरादें ने मेरा भरोसा एक बार फिर से सिस्टम पर से उठा दिया है.
एक फीमेल डॉगी जिसने 5 बच्चे दिए थे. हां, वही पिल्ले. अचानक कुछ दिनों बाद वो टूटी हुई नाली के पास से फिसलकर गिर गई. (नाली की शिकायत कर-करके लोग खुद से कह चुके हैं कि यहां का कुछ नहीं हो सकता)

अचानक गिरने से उसके पीछे के शरीर ने काम करना बंद कर दिया. वो घसीट-घसीटकर खुद को बच्चों के पास ले जाने की कोशिश कर रही थी. लेकिन नहीं पहुंच पा रही थी. बच्चों की आंखें भी नहीं खुली थी. किसी तरह मैंने और घरवालों ने उसे बार-बार उठाकर उसके बच्चों तक पहुंचाया. उसकी हालत देखी नहीं जा रही थी. पहले लगा कि शायद कहीं चोट लग गई है. हो सकता है ठीक हो जाए लेकिन धीरे-धीरे अंदाजा होने लगा कि मामला गंभीर है. फिर मैंने एक डॉक्टर से बात की. सुबह कुत्ते (चिक्की) को दिखाने की बात हुई. लेकिन मेरे डॉक्टर के पास ले जाने से पहले ही पड़ोस के लोगों ने संजय गांधी एनिमल केयर वालों को फोन कर दिया. सुबह-सुबह एम्बुलैंस आ गई. मुझे सरकारी व्यवस्था पर ज्यादा भरोसा नहीं है. अनुभव ही इतने कड़वे रहे हैं. जब इंसानों के अस्पतालों में लोगों को मांस का लोथड़ा समझा जाता है, तो जानवर तो एक खिलौना है. इस बात का एहसास मुझे एक घटना घट जाने के बाद हुआ.
मेरे मना करने के बाद मुझे समझा-बुझाकर वो चिक्की को ठीक करने के लिए ले गए. मेरे लिए उसका ठीक होना मायने रखता था. चाहे वो कहीं भी होती. अब सवाल ये था कि जिन बच्चों की आंखें भी नहीं खुली उन्हें कौन रखेगा? बच्चों को मेरे घरवाले उठा लाए. उनके लिए बेबी बॉटल मंगवाई. मम्मी ने दिन रात बच्चों की तरह पाला उन्हें. इस आस में कि उनकी मां आ जाएगी. 2 दिनों के बाद खबर आई कि चिक्की को प्लास्टर चढ़ा है. 10 दिन बाद घर आएगी. ये सुनकर मम्मी को बच्चों की फिक्र हुई लेकिन मां तो मां होती है. चाहे जानवरों की या इंसानों की.

खैर, 10 दिन बीते. जब फोन किया तो पता चला वो रविवार को ही कुत्ते घर पर छोड़ते हैं. बार-बार फोन करने पर गोल-मोल बातें.

इन 10 दिनों में मैं चिक्की को देखने इसलिए नहीं गई क्योंकि प्लास्टर वाली बात ने मुझे रोके रखा. मुझे लगा कि मुझे देखकर वो एक्साइटेड होकर कोई हरकत करेगी इसलिए नहीं गई. फिर सोचा 10 दिन बाद तो आ ही जाएगी. बचपन से ही पनौती हूं इसलिए इस बार भी लगा कि मेरी वजह से कुछ बुरा न हो जाए.

आखिर मैं परसों पहुंच ही गई. वहां जाकर पूछा तो किसी को उसके बारे में पता ही नहीं है. उसकी एंट्री भी अलग नाम से की हुई है. न उन पड़ोसियों को कुछ पता है जिन्होंने फोन किया था और न इन्हें. बहुत फोन घुमाने और डॉक्टर्स से कहा-सुनी के बाद वो आईसीयू में ले जाने को राजी हुए. वहां जाकर देखा तो हालात बदतर थे. 80-100 कुत्तों को मोबाइल टॉर्च जलाकर पहचाने की कोशिश की. 1 घंटे बाद मुझे संयोग से चिक्की अधमरी हालत में मिल गई. उसके शरीर पर हजारों मक्खियां थीं. उसके साथ और भी अपाहिज जानवर थे. शायद नर्क से भी बुरी दशा वाले कमरे को वो आईसीयू बोलते थे. सबसे हैरानी वाली बात ये थी कि उसे कोई प्लास्टर नहीं चढ़ा था. जिसके काटने की वजह से उसे 10 दिन रोका गया था. पीछे का शरीर लकवाग्रस्त हो गया था. वो मुझे देखते ही पहचान गई. मेरी आंखें वहां के हालात को देखकर नम हो गई. मैं उस नर्क से निकलना चाहती थी. भाग जाना चाहती थी धरती पर हजार नर्कों में से इस एक नर्क के बीच से. एक डॉक्टर संदीप थे, जिन्होंने मेरी मदद चिक्की को ढूंढने में की.
6 बजे के बाद वो किसी को रिलीज नहीं करते लेकिन बहुत कहने-सुनने पर वो तैयार हो गए.

चिक्की कार में गुमसुम बैठी रही. मुझे वहां से झूठ के पुलिन्दों के सिवाय कुछ नहीं मिला. अगर उसको प्लास्टर नहीं चढ़ा था तो झूठी बातें क्यों फैलाई गई? अगर वो ठीक नहीं हो सकती थी, तो चेकअप के बाद दूसरे ही दिन उसे वापस क्यों नहीं भेजा गया. ये जानते हुए कि उसके 5 बच्चे हैं और ज्यादा दिनों तक स्तनपान न करवा पाने की वजह से दूध सूख जाएगा. मैं किससे पूछती ये सवाल एक भी जिम्मेदार बंदा नहीं दिखा. गोल-मोल बातें.
छोटे बच्चे अब थोड़ा बड़े हो गए थे. आंखें खुलते ही मेरी मां को सबसे पहले पाया. हर तरह से वही सेवा करती थी इसलिए वो मां के पास से जाने को तैयार ही नहीं थे. कुछ देर तक चिक्की भी बच्चों को पहचान नहीं पाई थी. शायद सदमें में होने की वजह से. उसके साथ वहां क्या हुआ मुझे नहीं पता. उसने क्या-क्या सहा मुझे नहीं पता क्योंकि वो बेजुबान है. शिकायत नहीं कर सकती.

‘संजय गांधी एनिमल केयर’ लापरवाही का पुतला है. क्या करेगा कोई शिकायत की जाएगी तो ज्यादा से ज्यादा निचले वर्ग पर गाज गिरेगी, निलंबित कर दिया जाएगा. आनन-फानन में कुछ कदम अस्थायी रूप से उठा लिए जाएंगे.

बस नहीं लौट पाएंगे उस जानवर के 10 दिन और मौत से बदतर हालात. जहां उसे ईलाज के लिए भेजा था लेकिन जिसे 10 दिनों तक खानापूर्ति करके एक कोने में पटक दिया गया.

आखिर में 100 सवालों का एक जवाब मिलेगा ‘एक जानवर के लिए इतना बवाल क्यों काट रही है. मरते-जीते रहते हैं. सोचना है तो इंसानों की सोचो.’
किसी समाज की सोच और विकास को समझना हो, तो ये देखा जाना चाहिए कि वो अपने से नीचे यानि जानवरों और दूसरे जीवों से कैस बर्ताव करते हैं.
बाकी मैं खुद एक जानवर हूं इसलिए जानवरों से प्यार करती हूं. आप इंसान हैं इंसानों की सोचिए. किसी का तो भला हो. जीवन, भूख तो दोनों में एक-सी है.
चिक्की को फिलहाल एक और डॉक्टर के पास ले जा रही हूं. दुआ कीजिए ठीक हो जाए. खुद को अपराधबोध से घिरा हुआ महसूस कर रही हूं.
~प्रतिमा