10 अप्रैल का इतिहास : मोरारजी देसाई का निधन हुआ, लालू यादव और शरद यादव न होते तो पिछड़ा रह जाता मधेपुरा

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टाइटैनिक जहाज का आज, 10 अप्रैल से गहरा नाता है। यह अभागा जहाज आज ही के दिन ब्रिटेन के साउथेम्पटन बंदरगाह से अपनी पहली और अंतिम यात्रा पर रवाना हुआ था। वैसे टाइटैनिक जहाज का जिक्र आते ही इससे जुड़ी दुर्घटना के तमाम मंजर आंखों के सामने से गुजर जाते हैं। जहाज कब बना, किसने बनाया, यह कब अपनी यात्रा पर निकला यह सब तथ्य 1997 में आई फिल्म टाइटैनिक ने धुंधले कर दिए और याद रह गई जेम्स कैमरन की शानदार फिल्म, विशाल जहाज के डैक पर बांहें फैलाए खड़े लिआनार्दो डीकैप्रिया और केट विंस्लेट, नीले हीरे वाली माला और पानी का रौद्र रूप।10 अप्रैल का दिन आने के साथ ही इस साल ने अपना सैकड़ा पूरा कर लिया। अब साल के 265 दिन बाकी हैं। आज ही के दिन स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्यसमाज की स्थापना की। पहले गोल्फ टूर्नामेंट का प्रोफेशनल तरीके से आयोजन हुआ। ईरान में भूकंप से करीब 5 हजार लोगों की मौत हो गई। भारत के बहुउद्देशीय उपग्रह इनसेट-1A का सफल प्रक्षेपण हुआ। भारत रत्न से सम्मानित भारत के 5वें प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का निधन हुआ। पहली बार सिंथेटिक रबर का उत्पादन हुआ। इस दिन को अन्तरराष्ट्रीय सिबलिंग्स दिवस के रूप में मनाया जाता है।

आज का दिन देश दुनिया के इतिहास में कई कारणों से दर्ज है। इन घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा इस प्रकार है:
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1847: पुलित्जर पुरस्कारों के प्रणेता अमेरिकी पत्रकार एवं प्रकाशक जोसेफ पुलित्जर का जन्म।
1875 : स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्यसमाज की स्थापना की।
1894: भारतीय उद्योगपति घनश्यामदास बिड़ला का जन्म।
1912: टाइटेनिक ब्रिटेन के साउथेप्टन बंदरगाह से अपनी पहली और आखिरी यात्रा पर रवाना हुआ।
1916: पहले गोल्फ टूर्नामेंट का प्रोफेशनल तरीके से आयोजन।
1930: पहली बार सिंथेटिक रबर का उत्पादन हुआ।
1972: ईरान में भूकंप से करीब 5 हजार लोगों की मौत।
1982: भारत के बहुउद्देशीय उपग्रह इनसेट-1A का सफल प्रक्षेपण।
1995: भारत रत्न से सम्मानित भारत के 5वें प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का निधन।
2002: 15 सालों में पहली बार एलटीटीई के सुप्रीमो वी प्रभाकरन ने प्रेस कांफ्रेस में भाग लिया

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1894: भारतीय उद्योगपति घनश्यामदास बिड़ला का जन्म.

1912: टाइटेनिक ब्रिटेन के साउथेप्टन बंदरगाह से अपनी पहली और आखिरी यात्रा पर रवाना हुआ.

1916: प्रोफेशनल तरीके से पहले गोल्फ टूर्नामेंट का आयोजन.

1930: पहली बार सिंथेटिक रबक का उत्पादन हुआ.

1938: आस्ट्रिया जर्मनी का एक राज्य बन गया.

1960: यूएस सिनेट में सिविल राइट्स बिल पास.

1972: ईरान में आए भूकंप से करीब 5 हजार लोगों की मौत हो गई.

1986: भारतीय अभिनेत्री आयशा टाकिया का जन्म.

1995: भारत रत्न से सम्मानित भारत के पांचवे प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का निधन.

2002: 15 सालों में पहली बार एलटीटीई के सुप्रीमो वी. प्रभाकरन ने प्रेस कांफ्रेस में भाग लिया.
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10 अप्रैल
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भारत के छठे प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का आज ही के दिन 1995 में निधन हो गया. वह भारत के पहले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री थे. हालांकि वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए.

मोरारजी देसाई 1977 से 1979 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे. वह पहले कांग्रेस में थे और प्रधानमंत्री पद के लिए उनका नाम तभी से दौड़ में शामिल था. लेकिन प्रधानमंत्री का पद उन्हें कांग्रेस से अलग होने के बाद 1977 में इंदिरा गांधी की सरकार गिरने पर मिला.

प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 1966 में मृत्यु के बाद जब कांग्रेस ने इंदिरा गांधी को नया प्रधानमंत्री बना दिया तो यह मोरारजी देसाई को नहीं भाया. तब उन्हें उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री का पद दिया गया. लेकिन 1969 में वह पार्टी से अलग हो गए. 1975 में आपातकाल के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में जो आंदोलन चला उसमें मोरारजी भी शामिल थे. इस आंदोलन से निकली जनता पार्टी जब 1977 के चुनावों में जीत कर आई तो मोरारजी देसाई का प्रधानमंत्री पद के लिए लंबा इंतजार खत्म हुआ.

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने महात्मा गांधी के साथ अहम भूमिका निभाई. 1930 से 1940 के बीच उन्होंने करीब 10 साल ब्रिटेन की जेल में बिताए. वह पहले ऐसे भारतीय हैं जिन्हें भारत और पाकिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न और निशान ए पाकिस्तान से नवाजा गया.

1980 के आम चुनाव में भी वह जनता पार्टी की तरफ से चुनावी प्रचार में शामिल हुए, हालांकि उन्होंने खुद चुनावी दौड़ में हिस्सा नहीं लिया. रिटायरमेंट के बाद वह मुंबई में रहने लगे. वहीं 10 अप्रैल 1995 को 99 साल की उम्र में उनका निधन हुआ.
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10 अप्रैल का यह दिन बन जायेगा मधेपुरा के विकास के इतिहास का गवाह

लालू व शरद न होते तो शायद पिछड़ा रह जाता मधेपुरा
मधेपुरा : मंगलवार को मधेपुरा रेल विद्युत इंजन कारखाना राष्ट्र को समर्पित किया जा रहा है, लेकिन इस दौरान लोगों की जुबान पर बार-बार लालू यादव व शरद यादव का नाम आ रहा है. कहीं न कहीं यह सच भी है. अगर लालू प्रसाद यादव न होते तो शायद मधेपुरा पिछड़ा ही रह जाता. वर्तमान परिदृश्य में मधेपुरा को राजनीतिक तौर पर हाइप्रोफाइल बनाने का श्रेय इन्हीं दोनों नेताओं को जाता है. समाजवादियों का गढ़ होने के कारण इस क्षेत्र में लालू प्रसाद यादव को आकर्षित किया. उन्हें यहां से जीतने का भरोसा हासिल हुआ. यही कारण रहा कि शरद यादव भी मधेपुरा खींचे चले आये. उन्होंने लालू यादव को यहां से हराया भी.

इन दोनों नेताओं की राजनीति का केंद्र बनने के कारण मधेपुरा को हमेशा सौगात मिलता रहा. लालू प्रसाद यादव ने ही यहां भूपेंद्र नारायण मंडल विवि दिया तो केंद्र में रेलमंत्री बनते ही उन्होंने अपने दोनों क्षेत्र मधेपुरा व छपरा में रेल इंजन फैक्ट्री की घोषणा भी की. मधेपुरा स्लीपर फैक्ट्री भी दिया. यह अलग बात है कि उनके रेलमंत्री के पद हटने के बाद मधेपुरा की रेल इंजन फैक्ट्री परियोजना ठंडे बस्ते में चली गयी. शरद यादव मधेपुरा की राजनीति पर हावी रहे. उनके कारण ही नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री बनने के बाद मधेपुरा से विशेष लगाव हो गया. उन्होंने भी मधेपुरा में मेडिकल कॉलेज दिया जो संभवत: इस वर्ष के अंत तक या अगले वर्ष तक शुरू भी हो जायेगा.
लालू प्रसाद ही हैं रेल इंजन फैक्ट्री के सूत्रधार : प्रभाष
मुंगेर मंडल कारा से स्थानांतरित किये जायेंगे दर्जनभर कुख्यात अपराधी
जेल गश्ती के दौरान कक्ष पाल को गोली मारने के बाद खुली पुलिस प्रशासन की नींद
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1972: ईरान में भूकंप, हज़ारों की मौत

इस भूकंप में 4000 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.
10 अप्रैल 1972 को दक्षिणी ईरान में आए भीषण भूकंप में कम से कम 4,000 लोग मारे गए थे.

इस भूकंप का केंद्र घिर नाम के शहर में था, जो लगभग पूरी तरह से तबाह हो गया था. इस भीषण भूकंप के बाद भी पूरे दिन दक्षिणी ईरान में भूकंप के झटके महसूस किए गए, जिससे पूरे क्षेत्र में खलबली मच गई थी.

ऐसा माना जाता है कि मरने वालों में ज़्यादातर महिलाएं और बच्चे थे.

तेहरान विश्वविद्यालय के मुताबिक़ रिक्टर पैमाने पर इस भूकंप की तीव्रता 7.1 थी, जो ईरान के इतिहास का सबसे भयंकर भूकंप था.
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1858: बिग बेन की विशाल घंटी लगाई गई

इस महान घंटे ने सबसे पहले 1859 में समय बताना शुरू किया था.
दस अप्रैल 1858 के दिन लंदन में स्थित बिग बेन घड़ी की 14 टन की विशालकाय घंटी लगाई गई थी.

बिग बेन ब्रितानी इतिहास के धरोहर का प्रतीक है और लंदन के वेस्टमिनिस्टर पैलेस के सेंट स्टीफ़ेन्स टॉवर पर स्थित है.

बिग बेन के साथ दिलचस्प इतिहास जुड़ा हुआ है. इस महान घंटे ने सबसे पहले 1859 में समय बताना शुरू किया था.

जिस समय इस घंटे का निर्माण हुआ था तब निर्माण कार्यों के आयुक्त सर बेंजामिन हॉल थे और उन्होंने क़रीब 13 हज़ार 760 किलोग्राम वज़न वाले एक घंटे का निर्माण किया था, और बस उसी की तर्ज़ पर इस घंटे का नाम रखा गया.

सेंट स्टीफ़ेन्स टॉवर पर लगे इस घंटे पर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मन सेनाओं ने दर्जन भर हमले किए थे लेकिन यह अपनी जगह यूँ ही खड़ा रहा