#गांधी, #कांग्रेस और #मुसलमानों का विरोध करना इन समझौतों में प्रमुख था, ऐसे थे #वीर #सावरकर

#गांधी, #कांग्रेस और #मुसलमानों का विरोध करना इन समझौतों में प्रमुख था, ऐसे थे #वीर #सावरकर

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Satyendra Kumar Pandey//विशुद्ध ब्लॉग
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आखिर वीर कौन ?

भारत के एकमात्र क्रांतिकारी जिसको अंग्रेज उस समय ₹60/प्रतिमाह महीने की पेंशन देते थे।लिखित एग्रीमेंट कर #गांधी, #कांग्रेस और #मुसलमानों का विरोध करना इन समझौतों में प्रमुख था। ऐसे थे हमारे #वीर #सावरकर। इनका कहना था कि हिन्दू वही है जिसकी पितृभूमि, मातृभूमि और पुण्यभूमि भारत ही हो। ऐसे में मुसलमान और ईसाई कभी हिन्दू नहीं कहलाए जा सकते थे क्योंकि उनकी पुण्यभूमि मक्का और इजराइल थी। भारत के जनमानस को बांटने में उनकी इस थ्योरी ने अंग्रेजों की अत्यधिक सहायता की। उनका प्रमुख उद्देश्य था महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन को कुचलकर भारतीय जनमानस को धर्म के आधार पर बांट देना ताकि अंग्रेजों को अपनी सत्ता चलाने में कम से कम समस्याएं झेलनी पड़ें। ब्राह्मण कुल में जन्मे सावरकर ने महात्मा गांधी से अपनी पहली ही मुलाकात में झींगा खाने की इस तर्क के साथ पेशकश की थी की बिना प्रोटीन के अंग्रेजों से लड़ नहीं सकते जिसे महात्मा गांधी ने शाकाहारी होने के कारण ठुकरा दिया था। वो नशे में तम्बाकू और व्हिस्की लेते थे। उस ज़माने में 60 रुपये की पेंशन मिलने के कारण ठाठ बाट में रहते थे और पुणे में काफी संपत्ति अर्जित की थी जिसपर आज इनके खानदानी बिल्डर बने बैठे हैं।

सावरकर द्वारा प्रतिपादित हिंदुत्व की थ्योरी उनकी पुस्तक “हिंदुत्व” से ली गई जिसपर आगे चलकर हेडगेवार ने संघ की स्थापना की जो आगे चलकर आरएसएस में परिवर्तित हो गया। उनका कहना था कि हिंदुत्व कोई धर्म नहीं है बल्कि एक राजनैतिक पहचान है। और ये पहचान मुसलमानों और ईसाइयों के लिए नहीं है। सावरकर ने मुख्यरूप से अंग्रेजों के डबल एजेंट का काम किया लेकिन संघ ने उनकी #हिंदुत्व की थ्योरी और #सुभाषचंद्र #बोस की #साम्यवादी #संघ नामक संविधान विहीन एकल पार्टी सिस्टम की थ्योरी, जो उन्होंने अपनी जीवनी द इंडियन स्ट्रुगल में लिखी थी, को लेकर स्वयं सेवक सरकार बनाने का संकल्प लिया।

आज भी आरएसएस और उसके राजनैतिक पक्ष बीजेपी वाले सावरकर को #वीर कहते हैं और उनके सुझाए राजनैतिक हिंदुत्व और बोस के साम्यवादी संघ के संविधानविहीन एकल पार्टीतंत्र को साध्य मानकर काम कर रहे हैं।

सावरकर ने तब हिंदुओं और मुसलमानों को बाँटने की बात कही थी जिसे जिन्ना ने सहमति दी जो आगे चलकर भारत के विभाजन का कारण बनी। वो स्वयं ब्रिटिश शासन के प्रति वफादार रहे और लगातार पेंशन लेते रहे।

आज के वक़्त में साध्वी प्रज्ञा जैसे व्यक्तित्व को राजनीति में लाकर आरएसएस और बीजेपी के पीछे काम कर रहे साम्यवादी संघ के लोग उसी प्रयोग को दोहराना चाहते है ताकि भारत मे संविधानविहीन एकल पार्टीतंत्र की स्थापना हो सके और साम्यवादी संघ का पूर्ण राज्य स्थापित कर सावरकर और बोस के सपनों का भारत बनाया जा सके जिसमे अधिनायकवाद हो और धर्मों को मानने की छूट न के बराबर हो।