#फ़ेनी तूफ़ान_दलित परिवार को सरकारी शिविर में नहीं घुसने दिया गया

#फ़ेनी तूफ़ान_दलित परिवार को सरकारी शिविर में नहीं घुसने दिया गया

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Jitendra Narayan

फिर आप कहेंगे कि इस हिन्दू धर्म को manipulative धर्म न कहा जाए….

फेनी तूफान भी जातीय घृणा को कम नहीं कर पाया, दलित परिवार (डोम जाति) को सरकारी शिविर में घुसने नहीं दिया गया।

तीन दलित परिवारों के अपमान, यातना और दुख की कहानी।

3 मई के भयानक फेनी तूफान ने उड़ीसा में भयानक तबाही मचायी। लाखों लोगों को घर-बार छोड़कर भागना पड़ा। लोगों ने सरकारी शिविरों में पनाह ली। लेकिन कई दलित परिवारों को सरकारी शिविरों में घुसने नहीं दिया गया। ऐसे ही ती दलित ( डोम जाति) परिवारों की आपबीती की रिपोर्ट बीबीसी संवादताता फैसल मुहम्मद ने लिखी है।

वे लिखते हैं कि ‘वक्तपुरी के बिड़िपोड़िया गांव के दलितों को अछूत बताकर सरकारी शिविर में शरण की जगह दुत्कार मिल रही थी’ इस परिवार की बिनिता गोछाएत बार-बार भर्रा जाती आवाज़ के बीच बताती हैं कि ‘सब दरवाज़े बंद थे, हमने मिन्नतें कीं, लेकिन किसी ने हमें जगह नहीं दी. हरिजन हैं ये कहकर दुत्कार दिया,’

इस परिवार को जड़ से उखड़ गए बरगद के तने के नीचे पनाह मिली। यहीं ये तीन दलित परिवार पनाह लिए हुए हैं।

इस परिवार के त्रिनाथ मलिक कहते हैं, “जब हमने दो तारीख़ की शाम में सुना कि तूफ़ान आ रहा है तो हम लोग स्कूल चले गए. वहां लोगों ने हमें घुसने नहीं दिया, कहा तुम लोग डोम हो, तुम्हें हम जगह नहीं दे सकते.

एक कमरा बड़ी गुहार के बाद इन दलित परिवारों को दिया तो गया मगर दूसरों से अलग, पक्के कमरों से दूर. पर एस्बेस्टस शीट की छत 200 किलोमीटर की रफ़्तार से भी तेज़ आंधी का सामना भला कबतक कर पाती?

“छत टूट गया. हम 10-15 लोग बरामदे की छत के नीचे दुबक कर बैठ गए. हम लोग ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे कि प्रभु हमें बचा लो. जब हवा तेज़ हुई तो हम 15 आदमी वहीं बरामदे में बारिश से तर-बतर खड़े होकर रह गए,” उस रात को याद कर बनिता गोछाएत की आवाज़ फिर भर्रा जाती है.

‘खाने को कुछ नहीं था’
इन परिवारों ने रात नारियल खाकर गुज़ारी और उसके चार दिन बाद तक उन्हें खाने को कुछ हासिल नहीं हुआ.

ख़ुद के साथ हो रहे इस भेदभाव के ख़िलाफ़ कुछ दलितों ने आवाज़ भी उठाई और एक पक्के कमरे का दरवाज़ा तोड़कर अंदर भी घुसे, लेकिन उन्हें पुलिस से पकड़वा देने की धमकी मिलने लगी.

रीना मलिक कहती हैं, ”मैंने धक्के देकर दरवाज़ा तोड़ दिया, हममें झड़प हुई लेकिन वो थाने में शिकायत दर्ज कराने की धमकी देने लगे तो हम सोचने लगे कि अगर सचमुच में मामला दर्ज हो गया तो हम क्या करेंगे. हमारे पास तो पैसे भी नहीं हैं, एक दिन खाते हैं तो एक दिन भूखे मरते हैं.”

“घर टूट गया और उसमें पानी भर गया था तो हम स्कूल गए थे, लेकिन वहां भी पानी में ही बैठना पड़ा तो हम वापस चले आए, अब तो यही बरगद हमारा घर है”, रीना की सास मीना मलिक कहती हैं.

ओडिशा में उन्नीसवीं सदी में एक भयंकर अकाल आया था। जिसमें सबसे साथ खाना खाने वालों की एक जाति ही बन गई। जिन्हें ‘छतर खिया’ नाम दे दिया गया।. ये उन लोगों के लिए इस्तेमाल होता है जिन्होंने सभी के साथ बैठकर सरकारी शिविरों में खाना खाया था.

लेकिन लगता है डेढ़ सौ से अधिक सालों में कुछ भी नहीं बदला.

साभार : Siddharth सर।