उस खूंख़ार ज़माने में अगर किसी ने हिम्मत की तो वे थे ईश्वरचंद्र विद्यासागर

उस खूंख़ार ज़माने में अगर किसी ने हिम्मत की तो वे थे ईश्वरचंद्र विद्यासागर

Posted by

Abhay Vivek Aggroia

आज बंगाल जल रहा है . ==अभय ==
ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति को तोड़ दिया गया है. याद रहे ईश्वरचंद्र विद्यासागर बंगाल ही नहीं विश्व के महापुरुष हैं, जिसे भुलाने में पूंजीपतियों और कम्युनिस्ट पार्टियों ने अत्यंत प्रयतन किये गए और आज के युवा-युवतियों और शिक्षकों को उनका नाम और काम के बारे में अंश मात्र ही मालूम नहीं. घोर सामंतवादी और अंध विश्वासी और दलित विरोधी जात-पात व् कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले एक महान व्यक्तित्व का नाम है –ईश्वरचंद्र विद्यासागर. उनका जीवन, चरित्र और उद्देश्य एक दूसरे से जुड़े हुए थे. सामाजिक परिवर्तन के रुख में जिन बाधाओं से जूझे हैं–वह उस युग के क्रांतिकारी पुरुष थे. एक कम्युनिस्ट ही क्रांतिकारी हो–ऐसा कोई मंत्र अलापना समाज की सीढ़ियों की सही ऊंचाइयां को मापने का एक ढोंग मात्र ही होगा. इसी परिपेक्ष्य में कम्युनिस्ट (आज के )–शहीद भगत सिंह को एक क्रांतिकारी मानने से इंकार करते रहे हैं. ब्राह्मिणवाद के खिलाफ और दलितों और महिलाओं के उत्थान के लिए उन्होंने लगातार संघर्ष किया और जिसके परिणाम विधवा पुनर्विवाह कानून-1856 पारित हुआ. उन्होंने खुद एक विधवा से अपने बेटे की शादी करवाई थी. उन्होंने बहुपत्नी प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ भी आवाज उठाई थी. दलितों के बच्चों को सवर्णों के बच्चों के साथ एक जगह एक विद्यालय में बैठाने वाले चरित्र के नाम है –ईश्वरचंद्र विद्यासागर. अंग्रेजी भाषा और विकसित पश्चिमी सभ्यता और विज्ञानं के बीज बीने वाले उस खूंखार ज़माने में अगर किसी ने हिम्मत की तो वे थे –ईश्वरचंद्र विद्यासागर
ज्ञान के सागर == विद्यासागर
जिनका उद्देश्य ही था –गरीबों को अँधेरे से निकाल उन्हें ज्ञान और विज्ञानं का रास्ता दिखाया जाये ताकि वे अपने दुःख दरदों की जड़ों को पहचान कर उसके उन्मूलन का रास्ता निकाल सके .
इस लिए उन्हें बंगाल से जोड़ कर सीमित रखने की कोशिश की गयी–पूंजीपतियों और कम्युनिस्ट दलों ने
ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने साबित और लागु किया कि ज्ञान और विज्ञानं की कोई भौतिक सीमा नहीं होती
उन्होंने यह भी साबित किया कि पुराने गले सड़े समाज की नींव को उखाड़ कर ही नए समाज की स्थापना की जा सकती है .
गरीबों और महिलाओं और दलितों के उत्थान के लिए उस समय में जो क्रांतिकारी कदम उन्होंने उठाये अगर उस की तर्ज़ पर सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक आंदोलन चलते होते तो आज हिंदुस्तान के आवाम की यह हालत नहीं हो सकती थी.
कम्युनिस्ट राज और अब TMC की ममता बैनर्जी ने कैसे बंगाल के लोगों को हताहत किया है–इतिहास गवाह है. BJP और कांग्रेस सारे देश में विभिन्न जनविरोधी तरीकों से आम जन के एके को तोड़ कर भाई से भाई को लड़ा रही है.
TMC और ममता बनर्जी आज BJP के खिलाफ इस कुकृत्य के खिलाफ सड़क पर आने की जो नौटंकी कर रही है–उसे यह जताना जरूरी है–उनका अपना चरित्र जनविरोधी और तानाशाही है.
इस शर्मसार कुकृत्य की जिम्मेदारी केवल BJP और TMC पर डालने से ही समस्या का हल नहीं होता. देश व्यापी एक सशक्त जन आंदोलन इस कुकृत्य के खिलाफ चलाने की जरूरत है–यह दिखाने
की जरूरत है की सर्वहारा केवल भूख के लिए ही लड़ाई नहीं करते–अपने मूल्यों और ऊँची नैतिकता के लिए और अपने आदर्शों के बचाव के लिए भी संघर्ष करना जानते हैं

===अभय ==