अमित शाह हिंदुत्व का सबसे बड़ा ठेकेदार बना हुआ है लेकिन वो हिंदू नहीं है, वो जैन है

अमित शाह हिंदुत्व का सबसे बड़ा ठेकेदार बना हुआ है लेकिन वो हिंदू नहीं है, वो जैन है

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Pradeep Kasni
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अमित शाह हिंदुत्व का सबसे बड़ा ठेकेदार बना हुआ है, लेकिन अमित शाह हिंदू नहीं है,

अमित शाह जैन है,

जैनियों ने लंबे समय तक मांग करी कि उन्हें हिंदू धर्म से अलग माना जाए और अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाए, उनकी इस मांग पर भारत सरकार ने जैनियों को अल्पसंख्यक मान लिया, अब अमित शाह हिंदुओं को बदनाम करने के लिए हिंदू धर्म के प्रतीकों का इस्तेमाल कर रहा है जिसका उसे कोई अधिकार नहीं है

कुछ दिन पहले अमित शाह ने हनुमान और वानर सेना के प्रतीकों का इस्तेमाल किया और हिंदू धर्म को बदनाम किया, अमित शाह ने अपने जलूस में हनुमान का स्वांग भर कर हजारों लोगों को सड़क पर पैदल चलवाया उनसे तोड़फोड़ दंगा-फ़साद करवाया, ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ी और बाद में उन हनुमान वेशधारियो को डंडों से पिटवाया,

अमित शाह एक घोषित गुंडा है इसका हिंदू धर्म से कोई लेना देना नहीं है, हत्या में शामिल होने के कारण अमित शाह को गुजरात की अदालत ने तड़ीपार भी किया था, यह अपने पूंजीपति और गुंडे साथियों की मदद करने के लिए सत्ता हथियाना चाहता है और उसके लिए हिंदू धर्म का इस्तेमाल कर रहा है,

इस अपराध के लिए चुनाव आयोग को इसके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाना चाहिए और इसके खिलाफ एफ़आइआर कर तुरंत जेल में डाला जाना चाहिए

नीचे के लिंक में भारत सरकार का यह फैसला दिया गया है जिसमें जैनियों को हिंदू धर्म से अलग माना गया है —

आखिरकार पूरी हुई जैन समुदाय की पुरानी मांग

जाहिद खान

केंद्र सरकार ने जैन समुदाय को राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्जा दे दिया है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। दिल्ली, मध्य प्रदेश और राजस्थान सहित लगभग दर्जन भर से अधिक राज्य पहले ही राज्य स्तर पर जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा दे चुके हैं। अब जैन समुदाय के 50 लाख लोगों को भी देश के अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की तरह सरकारी योजनाओं व कार्यक्रमों का फायदा मिलने लगेगा। जैन समुदाय अपने निजी शिक्षण संस्थानों को स्वशासी बना सकेगा। वर्तमान में मुस्लिम, सिख, पारसी, ईसाई व बौद्ध समुदाय के लोगों को यह दर्जा हासिल है।

जैन समुदाय के लिए अल्पसंख्यक दर्जे की मांग काफी पुरानी है। हालांकि एक बड़ा वर्ग इसका विरोध भी करता रहा है। इसकी वजह यह रही कि उसे इस संबंध में कई बुनियादी जानकारी ही नहीं थी। हमारे संविधान के अनुच्छेद 29 में अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण और अनुच्छेद 30 में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की स्थापना एवं संचालन करने आदि अधिकारों का साफ-साफ उल्लेख है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार (यूएनएचआर) से जुड़े नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार अंतरराष्ट्रीय नियम 1966 के तहत ऐसे समूहों को अल्पसंख्यक अधिकार प्रदान किए जा सकते हैं, जो जातीय, धार्मिक एवं भाषायी अल्पसंख्यक हों और जिनकी अपनी अलग पहचान एवं संस्कृति हो। यानी भारतीय संविधान और संयुक्त राष्ट्र द्वारा दी गई अल्पसंख्यकों की परिभाषा के दायरे में जैन समुदाय भी आता है।

जनसंख्या के नजरिए से देखें तो देश में पारसी समुदाय के बाद, जैन समुदाय दूसरा कम जनसंख्या वाला समुदाय है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक देश की कुल आबादी में जैन समुदाय की हिस्सेदारी महज 0.4 फीसदी है। इस समुदाय के लोग देश के अन्य धर्मों-समुदायों के लोगों के मुकाबले आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक सभी स्थितियों में बेहतर स्थिति में हैं। इस आधार पर भी उन्हें अल्पसंख्यक दर्जा दिए जाने का विरोध किया जाता रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने चर्चित टीएमए पई केस में ‘अल्पसंख्यक कौन है ‘, इस विवाद पर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी थी। अदालत का कहना था- ‘देश के किसी भी हिस्से में अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए हर राज्य को एक इकाई माना जाएगा और हर राज्य में पचास फीसद से कम संख्या वाले जो समूह होंगे, उन्हें अल्पसंख्यक माना जाएगा। फिर वे चाहे कोई भी मजहब या भाषा के बोलने वाले हों।’

जैन समुदाय की दलील यह रही है कि उसे अल्पसंख्यक दर्जा इसलिए नहीं चाहिए कि वह आर्थिक लाभ या विशेष रियायतें ले सके। बल्कि इसके पीछे उसका मकसद जैन विचारधारा पर आधारित अपने शैक्षणिक संस्थानों को स्वयं संचालित करना है, ताकि वह अपनी विचारधारा एवं संस्कृति को सुरक्षित रख सके। इस दलील में कुछ भी गलत नहीं। जब मुस्लिम, पारसी, बौद्ध एवं सिख समुदाय ऐसा कर रहे हैं तो जैन समुदाय क्यों नहीं कर सकता? जैन समुदाय को अल्पसंख्यक दर्जा देने के खिलाफ लोगों का मानना रहा है कि चूंकि जैन समुदाय, एक धर्म विशेष की शाखा है, लिहाजा उसे यह दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए। यानी वह तबका जैन समुदाय के एक अलग और स्वतंत्र धर्म के अस्तित्व से ही इंकार करता है। जबकि जैनागम और इतिहास का तटस्थ अध्ययन करने से साफ मालूम होता है कि जैन धर्म विश्व का प्राचीनतम धर्म है। यह एक स्वतंत्र धर्म है। यह न वैदिक धर्म की शाखा है और न बौद्ध धर्म की।

पुरातत्व, भाषा, विज्ञान, साहित्य और नृतत्व विज्ञान आदि से स्पष्ट है कि वैदिक काल से भी पहले भारत में एक बहुत ही समृद्ध संस्कृति थी। यही संस्कृति आज जैन संस्कृति के नाम से जानी जाती है। जैन धर्म के अपने मौलिक सिद्धांत, परंपरा, इतिहास और ग्रंथ हैं, जो इसे अन्य धर्मों से अलग करते हैं। जाति, धर्म के आधार पर मंडल कमिशन ने भी जैन समुदाय को अहिंदू धार्मिक ग्रुप में मुस्लिम, सिख, बौद्ध व ईसाइयों के साथ रखा है। जाहिर है, केंद्र सरकार ने काफी सोच-समझकर ही यह फैसला किया है।

नवभारत टाइम्स |