I wish…#JusticeforSanjivBhatt…तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो?

I wish…#JusticeforSanjivBhatt…तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो?

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Madan Mackker

गर्लफ्रेंड : तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो?

पप्पू : कुछ भी…

गर्लफ्रेंड : तो मुझे एक Rolex की घडी ले दो।

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पप्पू : बहन पूरा तो बोलने दे….

“कुछ भी नहीं”🙏😝😝😝

😂😂😂🤣🤣🤣😄😄😄😉😉😉

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Jitendra Narayan

रंगा सियार

एक बार की बात है। एक सियार कई दिन से भोजन नहीं मिलने के कारण बहुत भूखा था। भोजन की तलाश में भटकते हुए वह सियार किसी शहर में पहुँच गया। जैसे ही सियार शहर में पहुंचा उसका सामना बड़े ही भयानक कुत्तों के झुण्ड से हुआ। कुत्ते तो उसके पीछे ही पड़ गए। सियार अपनी जान बचाने के लिए भागा और एक बड़ी सी नाद में कूद गया। वाह नाद किसी रंगरेज का था और उसमे नीला रंग भरा हुआ था। जब कुत्तों के जाने के बाद सियार उस नाद में से बाहर निकला तो वह नीले रंग का हो चुका था।

सियार वापस अपने जंगल में पहुँच गया। जब दूसरे जानवरों ने उसे देखा तो नीले रंग के कारण उसे पहचान नहीं पाए। उन्होंने सोचा कि वह कोई अजीब सा लेकिन शक्तिशाली जानवर होगा। सभी जानवर रंगे सियार के सामने नतमस्तक हो गए और उसे अपना राजा घोषित कर दिया।

जंगल का राजा बनकर तो सियार ख़ुशी से फूले नहीं समा रहा था। हमेशा उसकी सेवा में शेर और बाघ लगे रहते थे । वे रंगे सियार के लिए ताजा शिकार लाते थे। इस तरह से रंगे सियार की तो निकल पड़ी। एक रात सभी जानवर सियार की मांद के पास सो रहे थे। तभी उसे दूर से किसी सियार की हुँआ-हुँआ सुनाई पड़ी। अब एक सियार दूसरे सियार की हुँआ-हुँआ में सुर ना मिलाए ऐसा कैसे हो सकता था। रंगे सियार ने अपने आप को रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन उसके मुंह से भी हुँआ-हुँआ निकलने लगा।

जब दूसरे जानवरों ने चिर परिचित आवाज सुनी तो उन्हें असलियत का पता चल गया। इसके बाद तो रंगे सियार की जमकर धुनाई हुई।

Disclaimer:- इस कहानी का मोदी जी से कोई संबंध नहीं है।


ऊदबिलावों में भगदड़ देखते ही बनी !

बंगाल पहुंचने पर शाह को भी लोकतंत्र याद आ गया। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े कर दिए । वाह जी वाह ! [संघी] ऊदबिलावों में भगदड़ देखते ही बनी,– जनाब नारायणसिंह तहळाण


This is Shweta Sanjiv Bhatt,

Today I write with a heavy and disappointed heart. It has now been over 8 months since Sanjiv was unlawfully taken away. The Honourable Supreme Court of India, after having taken cognisance of our Special Leave Petition in March and after having directed us to wait for a month and a half, declared on the 9th of May that it will not interfere with the bail application at this point in time, and reserved to comment on its merits. It directed us to approach the Gujarat High Court again in 6 months for bail – adding another 6 months to this never-ending delay. By this time, Sanjiv will have been in jail for more than a year.

One may wonder what truly justifies keeping a man in custody for over a year, in a vindictively and conveniently re-opened 23-year old case. While we shuttle from pillar to post within the judiciary, I cannot help but bemoan the new lows our democracy has sunken to in the past five years. It is indeed a sorry state of affairs where an upright officer is being persecuted for doing his job honestly, whereas convicted murderers are roaming scot free on bail, courtesy the blessings of a certain political duo. I cannot help but wonder till what end will the people of this democratic nation observe as silent spectators, while individuals who have been relentlessly fighting for them continue to be persecuted by this fascist political regime.

Sanjiv continues to remain in custody, denied of the basic civil right of a bail; his only crime – that he did his duty with honesty and honour, that he dared to stand up against the ill doings of a fascist regime, that he did not succumb to pressure and continued his fight to bring justice to the victims of the politically orchestrated Gujarat Pogrom.

Sanjiv’s fight for justice and for a better India continues; in the face of atrocities, his honour and spirit remain unbroken and unbent.

God Bless.

#Enoughisenough #JusticeforSanjivBhatt
Sanjiv Bhatt


Lalit Mohan

अंबेडकर की मूर्ति तोड़ने वाले,
पेरियार रामास्वामी की मूर्ति तोड़ने वाले, शबरीमाला में हुड़दंग मचाने वाले…वही लोग है जो
ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ रहे है !
जो पुलवामा से वोट खींच सकता है,
वो कलकत्ता में दंगा का प्रोग्राम क्यों सेट नही करा सकते ?