6 हज़ार अमरीकी सैनिकों का जनसंहार होने वाला है!

6 हज़ार अमरीकी सैनिकों का जनसंहार होने वाला है!

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हुरमुज़ स्ट्रेट में युद्ध की संभावना को इराक़ के भीतर खींच ले गए अमरीकी विदेश मंत्री
क्या स्वयंसेवी बलों के हाथों 6 हज़ार अमरीकी सैनिकों का जनसंहार होने वाला है?

इस समय इस्लामी गणतंत्र ईरान और अमरीका के बीच टकराव और तनाव की स्थिति है तो तेज़ी से घटने वाली घटनाओं और परिवर्तनों पर नज़र रख पाना मुश्किल हो रहा है।

अमरीका ने अब्राहम लिंकन कैरियर भेजा तो इमारात की अलफ़ुजैरा बंदरगाह पर खड़े सुपर तेल टैंकरों पर हमला हो गया। इसके बाद सऊदी अरब की राजधानी रियाज़ से कुछ दूर सऊदी अरब के दो तेल प्रतिष्ठानों पर ड्रोन विमानों का हमला हो गया और अब इराक़ का मोर्चा सुलगने लगा है। अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेयो जो ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध का ढोल पीटने में आगे आगे रहते हैं, इराक़ की राजधानी बग़दाद पहुंचे हैं और अपने साथ कुछ सीडी ले गए हैं जिसमें यह दिखाया गया है कि इराक़ी स्वयंसेवी फ़ोर्स हश्दुश्शअबी ने सीरिया से मिलने वाली सीमा के निकट अमरीकी सैनिकों के ठिकाने से कुछ ही दूरी पर मिसाइलों का नेटवर्क स्थापित कर लिया है जिससे वह अमरीकी सैनिकों पर हमला कर सकता है।

हमें तो यह आशंका थी कि हुरमुज़ स्ट्रेट में कोई टकराव होगा लेकिन अचानक पोम्पेयो आकर इराक़ के प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल महदी तथा मीडिया को बताते हैं कि अमरीकी हितों और सैनिकों के ख़िलाफ़ गंभीर ख़तरा इराक़ के भीतर मौजूद है। इसमें दो प्रकार के संदेश हैं। एक संदेश यह है कि यदि अमरीकी सैनिकों पर हमला हुआ तो अमरीका इराक़ी सरकार से संपर्क किए बिना तत्काल जवाबी कार्यवाही करेगा और दूसरा संदेश यह था कि अमरीका ईरान से वार्ता करना चाहता है।

अमरीकी प्रशासन ने इराक़ से बग़दाद में अपने दूतावास के अधिकतर स्टाफ़ को वापस बुला लिया और अपने नागरिकों से कहा है कि वह इराक़ की यात्रा न करें। इससे पता चलता है कि अमरीका को जानकारियां प्राप्त हुई हैं कि अमरीकी हितों को ईरान से गंभीर ख़तरा है। इससे पहले पिछले साल सितम्बर में अमरीकी दूतावास के क़रीब धमाका हुआ और बसरा में अमरीकी काउंसलेट पर हमला हुआ तो अमरीका ने काउंसलेट बंद कर दी और दूतावास का स्टाफ़ बहुत कम कर दिया था क्योंकि सीधी सी बात यह है कि अमरीका डर गया था।

अमरीका ने इराक़ पर क़ब्ज़ा करने के लिए 3 लाख से अधिक सैनिक भेजे थे और 7 ट्रिलियन डालर खर्च कर डाले। अमरीका के कम से कम 3 हज़ार सैनिक मारे गए। इतना सब कुछ होने के बाद भी अमरीका के राष्ट्रपति या विदेश मंत्री में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह वह दिन दहाड़े और पूर्व घोषणा के साथ इराक़ की यात्रा करें। वह डरी हुई बिल्लियों की तरह चुपके से इराक़ में प्रवेश करते हैं और जल्दी से वहां से निकल जाते हैं। यहीं से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि यदि ईरान जैसे विशाल देश पर हमला किया तो अमरीका का क्या ख़मियाज़ा भुगतना पड़ेगा।

हमें यह नहीं पता कि पोम्पेयो अपने साथ जो जानकारियां लेकर गए हैं वह किस हद तक सही हैं मगर हमें दो बातें अच्छी तरह पता हैं। एक तो यह कि इराक़ी प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल महदी अमरीकी सैनिकों को बचा नहीं पाएंगे। पोम्पेयो ग़लत जगह पर गए हैं। स्वयंसेवी बलों के सैनिकों की संख्या डेढ़ लाख से अधिक है और वह भारी हथियारों से लैस है जो किसी भी सेना की तरह काफ़ी ताक़तवर है।

दूसरी बात यह है कि यही सारी जानकारियां लेकर पोम्पेयो यूरोपीय देशों में भी गए थे मगर किसी भी यूरोपीय देश को अपनी बात का विश्वास नहीं दिला जाए। इराक़ और सीरिया में अंतर्राष्ट्रीय एलायंस के प्रवक्ता ब्रिटिश जनरल क्रिस गीका ने साफ़ साफ़ कहा कि अमरीकी सैनिकों को इराक़ द्वारा समर्थित संगठनों से जो ख़तरा हो सकता है उसका स्तर हालिया समय में बिल्कुल भी बढ़ा रही है, अर्थात वह कह रहे हैं कि पोम्पेयो तुम झूठ बोल रहे हो!

ईरान को डराने के लिए विमान वाहक पोत, और बमबार फ़ोर्स भेजने वाले अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की हालत यह है कि वह ईरान को डराने के बजाए ख़ुद ही डरे हुए हैं और उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि अमरीकी सैनिकों पर किस तरफ़ से हमला हो सकता है। एक बात और भी है कि ट्रम्प अब ईरान के ख़िलाफ़ दूसरे चरण के प्रतिबंधों की बात नहीं कर रहे हैं यानी ईरान का तेल निर्यात ज़ीरो बैरल तक पहुंचाने पर ज़ोर नहीं दे रहे हैं बल्कि मध्यस्थों की सहायता से संदेश भेज रहे हैं कि ईरान उनसे बातचीत कर ले।

ट्रम्प ने कहा था कि यदि अमरीकी हितों पर अथवा अमरीका के घटकों के हितों पर कोई हमला हुआ तो वह बड़ा कठोर जवाब देंगे मगर देख लीजिए कि दो दिन के भीतर इमारात की बंदरगाह पर और सऊदी अरब के भीतर दो हमले हुए और ट्रम्प जवाबी कार्यवाही करने के बजाए अपने विदेश मंत्री को इराक़ भेज रहे हैं कि किसी तरह अमरीकी सैनिकों की जान बची रहे ताकि शायद अमरीका में चुनाव हों तो दोबारा ट्रम्प की विजय की संभावना बनी रहे। इसलिए कि यदि इराक़ में अमरीकी सैनिक मारे गए तो ट्रम्प के लिए चुनाव जीतना कठिन हो जाएगा।

 

ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका की चढ़ाई से सारे यूरोपीय देशों ने खुद को दूर कर लिया। ट्रम्प सरकार एक भी यूरोपीय देश को परमाणु समझौते से बाहर निकलने पर तैयार नहीं कर सकी। यदि ट्रम्प इन हालात में ईरान से जंग के लिए आगे बढ़ते हैं तो उन्हें इस्राईल और कुछ अरब देशों के अलावा किसी की मदद नहीं मिलेगी जो ख़ुद अपनी सुरक्षा के लिए अमरीका से मदद मांगने पर मजबूर हैं।

इस तनाव और टकराव से ट्रम्प हारकर ही बाहर निकलेंगे, ट्रम्प एक भी गोली फ़ायर होने से पहले ही जंग हार चुके हैं। उनकी धमकियों से ईरान नहीं डरा बल्कि हालात से ख़ुद ट्रम्प भयभीत हो गए हैं।

मध्यपूर्व के इलाक़े में पोम्पेयो, बोलटन और नेतनयाहू के अलावा कोई भी जंग नहीं चाहता। यदि अमरीका ने कोई भी ग़लती की तो उसे भारी ख़मियाज़ा भुगतना पड़ेगा। हमें यक़ीन है कि इराक़ और सीरिया में मौजूद अमरीकी सैनिकों में से एक भी जीवित अपने देश नहीं लौट पाएगा तो उनकी बात छोड़ ही दीजिए जो विमानवाहक पोत और समुद्री जहाज़ों पर बैठे दुआ मांग रहे हैं कि बिना किसी झड़प के स्वदेश वापसी हो जाए। हम यहां अमरीका के सऊदी अरब और इमारात जैसे घटकों की बात नहीं करेंगे क्योंकि उनके लिए तो यमन के हौसी ही काफ़ी हैं।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार