49 वर्ष से सरायतरीन सम्भल के महबूब रोज़ेदारों को ‘सहरी’ में उठातें हैं

49 वर्ष से सरायतरीन सम्भल के महबूब रोज़ेदारों को ‘सहरी’ में उठातें हैं

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Sambhal

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रमजान में वर्तमान समय में हर कार्य में लोग जहां मोबाइल का प्रयोग कर रहे हैं। चाहे इफ्तार हो या सहरी में जागने के लिए अलार्म लगाकर रोजेदार जागते हैं। पुराने समय में लोगों को जगाने के लिए लाउडस्पीकर बजाकर सहरी के लिए उठाते थे।

वहीं 49 वर्ष से सम्भल के सरायतरीन के मुहल्ला कोटला निवासी महबूब ढपली बजाकर रोजेदारों को आज भी उठा रहे हैं। पुराने समय में रमजान महीने में लोगों को सहरी के वक्त जगाने की परंपरा आज भी कायम है। 49 साल से परंपरा बदस्तूर जारी रखने वाले महबूब सहरी में लोगों को जगाने के लिए जुबां पर – दीन मिला इस्लाम मिला कुरआन मिला पढ़ने को, ला इलाहा इलल्लाह, इस्लाम का डंका बजाया सारे आलम में कमली वाले ने, कमली वाले के सदके में, सहरी वालों सहरी के लिए उठ जाओ..जैसे जुमले गाते रहते हैं और ढपली को पीटते हुए आगे बढ़ते हैं।

महबूब के प्रयास से हजारों लोग रोजाना सहरी के वक्त उठते हैं और उनका शुक्रिया अदा करते हैं। रमजान के पवित्र महीने में सहरी के वक्त गली मुहल्लों में निकलने वाली टोलियां रोजेदारों को जगाती थीं। उस वक्त वो नजारा देखते ही बनता था। रमजान के शुरू के पंद्रह दिनों में फजीलत पढ़ी जाती थी जबकि बाद के पंद्रह दिन में विदा के नगमें पढ़े जाते थे। काफिले के बाद इनकी जगह ढोल, नगाड़ों ने ली थी। बाद में धीरे-धीरे रवायत खत्म होती रही मगर आधुनिक दौर में भी खत्म नहीं हुई एक परंपरा जो 49 साल पहले शुरू हुई थी। परंपरा शुरू करने वाले हैं सरायतरीन के मुहल्ला कोटला निवासी महबूब पुत्र फरमूद।

वर्तमान में महबूब 75 साल के हैं मगर इन्होंने अपनी परंपरा को कायम रखा हुआ है। पेशे से रिक्शा चलाकर पेट भरने वाले महबूब सहरी के वक्त से लगभग एक घंटे पहले उठ जाते हैं और सरायतरीन के मुहल्ला कोटला, बरखेरियान, होज कटोरा, भूड़ा, तकिया, मंगलपुरा, लाल मस्जिद, दरबार, पैठ इतवार, नजर खेल, बागीचा, पीला खादाना, समेत कई मुहल्लों में तकरीबन ढाई घंटे में तीन किलोमीटर की दूरी तय करते हुए लोगों को जगाने का काम करते हैं। महबूब कहते हैं कि जिस जमाने में बिजली की व्यवस्था नहीं थी और लालटेन जलती थी, तब से सहरी के वक्त लोगों को उठाने का काम कर रहे हैं। ईद के दिन लोग खुश होकर ईदी देते हैं। रमजान में महबूब पूरे महीने लोगों को जगाते हैं। तमाम ऐसे लोगों को सहूलियत मिलती है जो नींद में होते हैं। महबूब को मेहनताना के तौर पर ईदी दी जाती है। ईद के मौके पर लोग उन्हें कपड़े, रुपये और दूसरे सामान देते हैं। लोगों के इस कदम से महबूब का हौंसला भी कम नहीं होता।