धन्यवाद भोपाल : मुझे तो अच्छी लगती है ग़ुलामी

धन्यवाद भोपाल : मुझे तो अच्छी लगती है ग़ुलामी

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Pratima Rakesh

मोदी दुबारा सत्ता में आएँ तो भी और ना आएँ तो भी मुझे व्यक्तिगत तौर पर क्या फ़र्क़ पड़ता है ?
तो फिर रात भर नींद क्यों नहीं आई ?
क्या ये डर कि कभी किसी गली किसी मोड़ किसी सड़क पर कोई भीड़ अचानक व्हॉट्सअप सूचना पर एकत्र होकर किसी बेटी को किसी बेटे को किसी ग़रीब को किसी कमजोर को पीट पीट कर अधमरा कर देगी ?
लेकिन मेरे बच्चे तो सुरक्षित हैं सरकारी पद पर हैं सरकारी सुरक्षा के दायरे में भी हैं फिर ?
तो क्या मेरे या मेरे पति के साथ ऐसी किसी अनहोनी की आशंका ने मुझे सोने नहीं दिया ?
लेकिन हम तो बाहर सड़क पर अब बहुत ही कम निकलते हैं !
क्या गाय से टकरा जाने पर जान जाने की आशंका है ?
यह आशंका भी मुझे या मेरे परिवार को तो नहीं ही है !
फिर ?
तो क्या हिन्दू धर्म की आलोचना करना हमें महंगा पड़ सकता है ?
लेकिन हमारी साड़ी हमें हिन्दू बताकर बचा ही लेगी और पंडिज्जी ना तो ऊँचा पायजामा पहनते हैं ना दाढ़ी रखते हैं ?
आर्थिक परेशानी ?
ना जी पेन्शन ज़िन्दाबाद !
फिर रात भर नींद क्यों नहीं आई ?
??????????????????????


Abdul H Khan

धन्यवाद भोपाल वालो आज उन्होनें बता दिया कि देश से बड़ा धर्म होता है,

शहीद से बड़ा आतंकवादी होता है।

विशुद्ध चैतन्य
सोच रहा हूँ दारू छोड़ दूं 🤔

पर छोडूँ किसके पास ???

दोस्त सारे कमीने हैं…..पी जायेंगे सब !!! 😟

~विशुद्ध चैतन्य


Sajjad Noori

“मैं ग़ुलाम था……, हूँ…..…, और रहूंगा”
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मुझे तो अच्छी लगती है ग़ुलामी। और ये कोई आजकी नहीं है, बहुत…पुरानी है हमारी ग़ुलामी, मुझे तो फ़ख्र है कि मैं ख़ानदानी ग़ुलाम हूँ, लकड़ दादा से पर दादा….. पर दादा से दादा…… दादा से अब्बा……. और अब्बा से हम। वैसे मौक़ा मिला था एक बार ग़ुलामी से मुक्ति का… सन 47 में… लेकिन हमारे बाप दादा ने ठुकरा दिया सुसरी आज़ादी को….. आज़ाद जीना भी कोई जीना है यार….. इस से बेहतर तो ग़ुलामी है जिस में, खाना, पीना, ओढ़ना-बिछोना सब मुफ़्त। वैसे…. सुना है…. आज़ादी भी उतनी आसानी से नही मिलती……उसके लिए खून पसीना बहाना पड़ता है। एक मिनट….. मानलो के ….. जद्दोजहद करके हम आज़ादी हालिस कर भी लिए तो……तो किया होगा?…. उस से पेट तो नही भरेगा न?……..।
कुछ लोग आए थे हमें आज़ादी का पाठ पढ़ाने……. हम भी खूब पढ़े….. इतना पढ़े…… इतना पढ़े के…… इम्तिहान होने से फर्स्ट नही….. बल्के टॉपर कहलाते….., लेकिन हम भी बेकूफ़ थोड़ी न है…… कि उनके खहने से मान जाएंगे…. और बाप दादा की विरासत को एक लम्हे में बर्बाद कर देंगे। अगर इसे बर्बाद कर दिया…..तो अपनी नसलों को किया देंगे…..
एक दौर था जब ग़ुलामी के किस्से बड़े चाव से सुनते थे….. मगर ये कम्बख़्त आज का दौर…. बच्चे किस्सा सुन्ना ही नहीं चाहते….. इस लिए मन मे एक तरकीब सूझी है… एक किताब लिख डालूं… और उसका नाम होगा….
“मैं ग़ुलाम था….., हूँ……, और रहूंगा”
-सज्जाद नूरी…/

Arun Maheshwari
दार्शनिक स्लावोय जिजेक चंद महीने पहले एक साक्षात्कार में कह रहे थे कि ट्रंप के खिलाफ अमेरिकी मीडिया के लगातार अभियानों के बावजूद ट्रंप आगामी चुनाव में फिर जीतेंगे क्योंकि ये अभियान ही ट्रंप को शिक्षित समुदाय के प्रति आम लोगों के संदेह और अविश्वास का प्रतीक बना देते हैं । बहरहाल, जब समाज में किसी भी वजह से तर्क और विवेक ही एक सिरे से अमान्य होने लगे, तो उसे उसके भविष्य के लिये कोई अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता है ।

 

 

Disclaimer : लेख सोशल मीडिया में वॉयरल है, लेखक/लेखिका के निजी विचार हैं, तीसरी जंग हिंदी का कोई सरोकार नहीं है!