देश प्रेम की कविता उर्फ़ सारे जहां से अच्छा…!!!

देश प्रेम की कविता उर्फ़ सारे जहां से अच्छा…!!!

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Mukul Saral
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वरिष्ठ कवि-लेखक अजय सिंह का आज जन्मदिन है। यूं तो सरकारी तौर पर वह 15 अगस्त के दिन पैदा हुए लेकिन उस दिन से विभाजन की त्रासदी भी जुड़ी होने की वजह से वह भारत छोड़ो आंदोलन के दिन जिसे बहुत लोग आज़ादी का असली दिन मानते हैं, को अपना जन्मदिन मानते और बताते हैं। आज के दिन उन्हें उन्हीं की कविता के माध्यम से बधाई
देश प्रेम की कविता उर्फ सारे जहां से अच्छा…
मैं आधा हिंदू हूं
आधा मुसलमान हूं
मैं पूरा हिंदुस्तान हूं
मैं गंगौली का राही मासूम रज़ा हूं
मैं लमही का प्रेमचंद हूं
मैं इकबाल का बागी किसान हूं
मैं शमशेर के गवालियर का मजूर हूं
मैं पटना की शाहिदा हसन हूं
मैं नर्मदा की मेधा पाटकर हूं
मैं शाहबानो हूं
मैं शिवपति और मैकी हूं
मैं वामिक का भूका बंगाल हूं
मैं केदार की बसंती हवा हूं
मैं आलोकधन्वा का गोली दागो पोस्टर हूं
मैं अब्दुल बिस्मिल्लाह का उपन्यास हूं
मैं पूरा हिंदुस्तान हूं
मैं भिवंडी हूं
मैं बंबई का ख़ौफनाक चेहरा हूं
मैं सूरत की लुटी हुई इज्ज़त हूं
मैं भागलपुर बनारस कानपुर भोपाल में
जिंदा जलाया गया मुसलमान हूं
मैं नक्सलबाड़ी हूं
मैं मध्य बिहार का धधकता खेत-खलिहान हूं
मैं नयी पहचान के लिए छटपटाता उत्तर प्रदेश हूं
जो न कायर है न भदेस
मैं नया विहान हूं
मैं पूरा हिंदुस्तान हूं
मैं वो अनगिनत हिंदू औरत हूं
जैसा साल-दर-साल के आंकड़े बताते हैं
जिन्हें फ्रिज टी.वी. स्कूटर चंद ज़ेवरात के लिए
भरी जवानी आग के हवाले कर दिया गया
और कहा गया-
खाना बनाते समय कपड़े में आग लग गयी
मैं वो अनगिनत मुसलमान औरत हूं
जिन्हें तलाक तलाक तलाक कह कर
गर्मी की चिलचिलाती दोपहर
जाड़े की कंपकंपाती रात
घर से बेघर कर दिया गया
और कहा गया-
मेहरून्निसा बदचलन औरत है
जैसे गर्भवती सीता को
अंधेरी रात सुनसान जंगल में
कितनी अजब बात है!
सीता धरती से पैदा हुई
और वापस धरती में समा गयी-
बेइज्ज़त और लांछित होकर-
प्रकृति के नियम को धता बताते हुए
लेकिन आज की सीता फातिमा ज़हरा
धरती की कोख में नहीं लौटेंगी
यह द्वंद्ववाद के खिलाफ है
वे लड़ेंगी
क्योंकि, जैसाकि पाश ने कहा था,
साथी, लड़े बगैर कुछ नहीं मिलता
मैं बेवा का शबाब हूं
मैं कैथरकला की औरत हूं
मैं राजस्थान की भंवरी बाई हूं
मैं चंदेरी की मलिका बेगम हूं
जिसका दायां पांव काट लिया गया
पर जो अभी भी इच्छा मृग है
चौकड़ी भरने को आतुर- वीरेन की कविता की तरह
मैं भोजपुर का जगदीश मास्टर हूं
मैं जुलूस हूं
साझा हिंदुस्तान के लिए
बराबरी वाले हिंदुस्तान के लिए
इंसाफ वाले हिंदुस्तान के लिए
वो देखो!
जुलूस में जो लाल परचम और
बंद मुट्ठियां लहरा रही हैं
उनमें कितनी हिंदू कितनी मुसलमान
-कौन करे हिसाब?
हिंदुस्तान बनिए की किताब तो नहीं
जुलूस में सर से आंचल
कब कंधे पर गिरा
गेसू बिखरे
आज़ादी की छटा बिखरी
पतली लेकिन सधी आवाज़ में नारा लगा:
‘बलात्कारी को मौत की सज़ा दो!’
कब बुरका उठा
-जैसे बाहर की ओर खिड़की खुली
और उस सांवली सूरत ने नारा लगाया:
‘आज़ादी चाहिए… इंक़लाब चाहिए!’
आज़ादी
स्वतंत्रता
मुक्ति
हिंदू को भी उतनी ही प्यारी है जितनी मुसलमान को
जब ये शब्द रचे जा रहे थे
न जाने कितनी बेडिय़ां टूट रही थीं
न जाने कितने हसीन ख्वाब साकार होने को थे
ख्वाब भी कभी हिंदू या मुसलमान हुए हैं?
मैं वाम वाम वाम दिशा हूं
ओ मायकोवस्की!
ओ शमशेर!
यही है हकीकत हमारे समय की
मैं सथ्यू की फिल्म ‘गर्म हवा’ का आखfरी सीन हूं
मैं लाल किले पर लाल निशान
मांगने वाला हिंदू हूं मुसलमान हूं
मैं पूरा हिंदुस्तान हूं
लखनऊ: 13 जनवरी 1995. ‘पहल’ (जबलपुर): अंक 55, जनवरी-मार्च 1997.