वैज्ञानिक का दावा, कुत्ते जितना ही सूंघ सकती है इंसान की नाक!

वैज्ञानिक का दावा, कुत्ते जितना ही सूंघ सकती है इंसान की नाक!

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NYT न्यूज़ सर्विस |जोआना क्लेन
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अब तक यह माना जाता रहा है कि इंसान के सूंघने की शक्ति जानवरों के मुकाबले काफी कम होती है। लेकिन अमेरिका के न्यू जर्जी की रतगर्स यूनिवर्सिटी के एक वैज्ञानिक का कहना है कि इंसान की सूंघने की शक्ति कुत्ते, चूहे व अन्य जानवरों से कम नहीं होती। गुरुवार को प्रकाशित हुए एक रिव्यू में न्यूरोसायंटिस्ट जॉन पी मैकगैन ने बताया कि उन्होंने कैसे इस मिथक को तोड़ा कि इंसान कुत्ते या अन्य जानवरों जितना नहीं सूंघ सकता। जॉन ने बताया, ‘सच यह है कि इंसान सूंघने में काफी अच्छे होते हैं।’ जॉन ने कहा, ‘हमें जितना बताया गया इंसान उससे ज्यादा सूंघ सकता है।’

इस मिथक की शुरुआतल 19वीं सदी में एक फ्रेन्च फिजिशन पॉल ब्रोका ने की। पॉल इंसानी दिमाग पर शोध करते थे और बताते थे कि वह जानवरों से कैसे अलग है। उन्होंने तर्क दिया कि जानवरों के दिमाग में मौजूद बड़े ऑलफैक्टरी बल्ब (दिमाग़ में बल्ब के आकार का एक हिस्सा) उन्हें दूर तक और ज्यादा सूंघने में मदद करते है, जबकि इंसानों के दिमाग का आगे का बड़ा हिस्सा (फ्रंटल लोब) उन्हें हर तरह की गंध से दूर रखने में मदद करता है। दूसरे वैज्ञानिकों ने जानवरों की सूंघने की योग्यता से टेस्ट किए बिना ही उनकी थ्योरी को और सरल कर दिया। इसके बाद 1924 में एक महत्वपूर्ण टेक्स्टबुक में बताया गया कि इंसान के विचार करने की क्रांति के चलते उनके दिमाग के ऑलफैक्टरी बल्ब सिकुड़ गए और लगभग बेकार हो गए।

अब डॉ. मैकगैन का कहना है कि ‘अलग-अलग पर्यावरण में जानवरों के लिए अलग-अलग समस्याएं होती हैं जिनके मुताबिक उन्हें ढलना होता है।’ उनका कहना है कि हम अपनी नाक से काफी कुछ कर सकते हैं। कुत्तों की तरह हम भी खुशबू (या गंध) को फॉलो करते हुए निशान तक पहुंच सकते हैं। कुछ वैज्ञानिक तो यह भी कहते हैं कि अगर किसी इंसान को दूसरों को सूंघने की बीमारी हो तो वह पसीना, खून या पेशाब के जरिए अपना जीवनसाथी भी ढूंढ सकता है। किसी का डर या दबाव भी जान सकता है। हालांकि इसके पुख्ता सबूत नहीं हैं।