शेखावाटी की महिलाऐ बडी मेहनकस व सब्र वाली!

शेखावाटी की महिलाऐ बडी मेहनकस व सब्र वाली!

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।अशफाक कायमखानी।
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सीकर।राजस्थान के शेखावाटी जनपद की महिलाऐ बडी मेहनतकस व सब्र वाली होने के कारण आज वो हर मुकाम पर पहुंचकर जनपद के विकास मे भागीदार बन कर अपने साथ अपने परीवार का सर भी फक्र से ऊंचा करने मे लगातार प्रयासरत है।
शेखावाटी की महिलाओ पर वेसे तो काफी कुछ लिखा जा सकता लेकिन मै एक तरह से अलग हटकर एक अनछुऐ पहलू पर आज लिखना चाहता हु कि काफी सालो पहले सभी समाजो व बिरादरियो मे रिवाज होता था कि किसी भी शादी-छुछक, तिर्थ यात्रा मे जाने से पहले या बाद मे हेसियत वालो द्वारा सामुहिक भोज करने सहित अन्य खुशी के सामाजिक मोके पर होने वाले भोज मे पहले पुरुष भोजन करते थे। पुरुषो के भोजन करने के बाद महिलाओ को भोजन करवा जाता था। यह परिपाटी कहां से शुरु हुई यह तो ठीक ठीक मुझे पता नही है। लेकिन ऐसे अनेक परीवार आज भी मोजूद है कि रोजाना पत्नी तब तक खाना नही खाती है जब तक पती भोजन नही कर लेता है। अनेक दफा तो आज भी पती के घर से बाहर होने पर वो घर फोन से संदेश देते है कि मेने भोजन कर लिया है या फिर घर से फोन आता है कि आपने भोजन कर लिया क्या? यह पुरुष प्रधान प्रथा है या फिर कोई धार्मिक कारण? इसकी गहराई मे ना जाकर असल बात यह है कि आज भी चाहे कम बिरादरियो मे लेकिन प्रथा है कि उत्सवो व शादियो मे होने वाले सामुहिक भोजन मे महिलाओ को खाना पुरुषो के खाने के बाद परोसा जाता है चाहे रात के 11-12 ही क्यो ना बज गये हो?
हालाकि आजके पच्चीस-तीस साल पहले तो महिलाओ को पुरुषो के बाद उत्सवो के सामुहिक भोजन कराने का आम चलन सभी समाज व बिरादरियो मे था। लेकिन ज्यो ज्यो तालीम का आम होना हुवा तो त्यो त्यो इसमे सुधार होता गया। धिरे धिरे महिला व पुरषो के भोजन करने या कराने के मंडप अलग अलग होने लगे। उसके बाद तो अब काफी जगह एक ही मंडप मे सेल्फ सर्विस या फिर अदर सर्विस के मार्फत साथ साथ भोजन का सिस्टम आम होने लगा है। फिर भी अधिकांस जगह दोनो के भोजन मंडप आज ही अलग अलग ही होना देखा जाता है।
सामाजिक प्राणी होने के कारण काफी जगह अल्लाह पाक के करम से मुझे भी अनेक जगह काफी तरह के उत्सवो मे भोजन करनै का मोका मिला तो मेने खासतोर पर मुस्लिम समुदाय की अनेक बिरादरियो मे महिलाओ को इन उत्सवो मे भोजन कराने को लेकर काफी विरोधा भाषी रिवाज देखने को मिला। जिनमे खासतोर पर उन कामकाजी बिरादरियो मे जिनमे महिलाऐ अपने खानदानी काम मे पुरुषो के साथ रोजाना बराबर हाथ बंटवाकर उनसे अधिक अर्थ भी कमाती है।