शोहरत की ख़ातिर … !!! ( उर्दू अफ़साना)

शोहरत की ख़ातिर … !!! ( उर्दू अफ़साना)

Posted by

( मोहम्मद खुर्शीद अकरम ‘ सोज़’ )
————————
वह ख़ुद पेशे से एक डॉक्टर थी ,लेकिन हर वक़्त मर्ज़-ए-इज़्तिराब में मुब्तला रहती थी । दरअस्ल उस के इज़्तिराब यानि बेचैनी की वजह यह थी कि वह सारी दुनिया में मशहूर होना चाहती थी , शोहरा-ए-आफ़ाक़ बनना चाहती थी और शोहरत हासिल करने का उसका यह शौक़ जुनून की हद तक पहुँच चुका था । लेकिन ब-हैसियत डॉक्टर मेडिकल साइन्स में कोई नया रिसर्च पेश करके शोहरत हासिल करना कोई आसान काम नहीं था । इसलिए उसने राइटर बनने का फैसला किया !! शायद उसे इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि शेर-ओ-अदब की दुनिया में कोई शाहकार तख़लीक़ करके शोहरा-ए-आफ़ाक़ हो जाना भी कोई बच्चों का खेल नहीं !!!

बहरकैफ़ अपनी इस ख़्वाहिश की तकमील के लिए उस ने अफ़साना-निगारी से ले कर नसरी नज़्म तक कई अदबी सिनफ़ों में तब’अ आज़माई की ( पाबंद शायरी उस के लिए टेढ़ी खीर बनी रही ) । उसकी चंद तख़लीक़ात को चंद नीमअदबी रसायल में जगह भी मिलने लगी , लेकिन जिस शोहरत की तमन्ना के साथ उसने क़लम से रिश्ता क़ायम किया था ,उस शोहरत-ओ-मक़्बूलियत के आसार दूर-दूर तक नज़र नहीं आरहे थे । लिहाज़ा उसका इज़्तिराब बढ़ता ही जा रह था ….!!!

वह दिन रात इसी ग़म में डूबी रहने लगी कि उसे ऐसी शोहरत जो सारी दुनिया में मशहूर कर दे , कैसे हासिल होगी ? इसी फ़िक्र में ग़म से निढाल एक शब वह अपनी ख़्वाब-गाह में बिस्तर पर बेचैनी के आलम में लगातार करवटें बादल रही थी , नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी……. , कि अचानक एक साया उसके कमरे में नमूदार हुआ! साये को देखकर वह सहम गई और बिस्तर से उठ गई । फिर उसने खौफ़ज़दा हो कर साये से पूछा ,”कौन हो तुम ? मेरी ख़्वाब-गाह में कैसे आये ???”

“खौफ़ज़दा मत हो हसीना”, साये ने जवाब दिया, “मैं तेरा हमदर्द और बहि-ख्वाह हूँ , तुझ जैसी बे-ताब हस्ती की मैं हमेशा रहनुमाई करता हूँ, तेरी भी रहनुमाई करूँगा !”

“फिर भी तुम कौन हो ? कुछ तो बताओ !”, उसने साये को टोका ।
“नाचीज़ को लोग इबलीस कहते हैं “, साये ने निहायत इत्मिनान से जवाब दिया ।
साये का जवाब सुन कर उस का खौफ़ एकदम ख़त्म हो गया । उस ने फ़र्ते-इंबिसात से तक़रीबन चीख़ते हुए कहा ,”ऐ हज़रत-ए-इब्लीस ! मैं ने तो सिर्फ़

आप का नाम ही सुना था, लेकिन आप को देखने और आप से मिलने का एक मुद्दत से इश्तियाक़ था मुझे ! ज़हे नसीब , आज मेरी देरीना आरज़ू पूरी हो रही है , लेकिन मैं कहीं ख़्वाब तो नहीं देख रही हूँ ???”
“ नहीं हसीना तू ख़्वाब नहीं देख रही है। “ इब्लीस ने जवाब दिया , “:यह हक़ीक़त है कि मैं तेरे रू-ब-रू हूँ । “

( 2 )
“ अब मेरी देरीना ख़्वाहिश पूरी हो जायेगी,” उस ने पुरमुसर्रत लहजे में इब्लीस से कहा,” आप मेरे पीर-ओ-मुरशिद बन जाइये और मेरी रहनुमाई कीजिये कि मैं आनन-फ़ानन में सारी दुनिया में मशहूर हो जाऊँ ! शोहरा-ए-आफ़ाक़ बन जाऊँ !!”
“ परेशान मत हो हसीना , धीरज रख ! तेरी यह ख़्वाहिश ज़रूर पूरी होगी !!”, इब्लीस ने जवाब दिया, “ मैं ने तुझे अपने खास शागिर्दों में शामिल कर लिया ! अब मैं तुझे मशहूर होने का ऐसा आसान नुसख़ा बताऊँगा कि कि तू बग़ैर कोई कारनामा अंजाम दिये ही रातों-रात सारी दुनिया में मशहूर हो जायेगी !!!”
यह सुनते ही वह पागलों कि तरह हिज़्यानी अंदाज़ में चीख़ते हुए बोली , “ मेरे मुर्शिद ! आप मुझे फ़ौरन वह नुस्ख़ा बताइये ! मैं सारी दुनिया में शोहरत हासिल करने के लिए आप की हर तज्वीज़ पर अमल करने के लिए तैयार हूँ !!!”
“तो सुन हसीना !”, इब्लीस ने कहना शुरू किया , “ एक डॉक्टर की हैसियत से अगर तू मशहूर होना चाहे तो यह तेरे बस की बात नहीं । क्यूंकि मेडिकल साइन्स में कोई नया रिसर्च पेश करके या कुछ नई दवाएँ ईजाद करके तहलका मचाना तेरे बस की बात नहीं, इसी तरह दुनिया-ए-अदब में भी शोहरा-ए-आफ़ाक़ होना आसान नहीं !!! इसके लिए भी बड़ी अर्क़-रेज़ी करनी पड़ती है । सदियों में मीर, ग़ालिब, इक़बाल, टैगोर, और कालीदास जैसी हस्तियाँ पैदा होती हैं ! “
“ फिर मैं आखिर क्या करूँ ?” उसने साये की बात काटते हुए कहा ।
“ बीच में मत बोल ! ,” इब्लीस ने उसे डांटते हुए कहा, “ध्यान से मेरी बात सुन ! ”
“ फ़र्माइये मेरे आक़ा !” , वह गिड़गिड़ाते हुए बोली ।
“ तो सुन !”

इब्लीस ने उसे शोहरत हासिल करने का आसान तरीक़ा बताना शुरू किया , “ ऐ बेचैन हसीना तेरे लिये आसानी से सारी दुनिया में मशहूर होने का सिर्फ़ एक ही रास्ता है , और वह यह है कि तू अपने मज़हब इस्लाम और पैग़ंबर-ए-इस्लाम के खिलाफ़ कुछ भी अनाप-शनाप लिखना शुरू कर दे । बस तू देखते ही देखते सारी दुनिया में मशहूर हो जायेगी । क्यूंकि तू जैसे ही मज़हब इस्लाम और पैग़ंबर-ए-इस्लाम के खिलाफ़ लिखना शुरू करेगी , इस्लाम-मुखालिफ़ ताक़तें तुझे शोहरत की बुलन्दियों तक पहुँचा देंगी और रही सही कमी इस्लाम के नादान दोस्त तेरे खिलाफ़ हर शहर में मुज़ाहिरा करके और तेरे खिलाफ़ फ़त्वा जारी करके पूरी कर देंगे ! और तू शोहरा-ए-आफ़ाक़ हो जायेगी ……. तू शोहरा-ए-आफ़ाक़ हो जायेगी ……. हा,हा,हा,हा,हा,……… तू शोहरा-ए-आफ़ाक़ हो जायेगी…………..!!!” ठहाका लगाते हुए इब्लीस उसकी ख़्वाब-गाह से ग़ायब हो गया ।

और उसने उसी वक़्त से इब्लीस की तज्वीज़ पर अमल करना शुरू कर दिया और देखते ही देखते वह सारी दुनिया में मशहूर हो गई । लेकिन उसका मर्ज़-ए-इज़्तिराब ख़त्म नहीं हुआ । शोहरा-ए-आफ़ाक़ होने की उसकी तमन्ना हो चुकी थी लेकिन इसके बावुजूद उसकी बेचैनी थमने का नाम नहीं ले रही थी ….???
इब्लीस दूर खड़ा मुस्कुरा रहा था । आदम की एक और संतान को उसने आसानी से गुमराही के रास्ते पर धकेल दिया था ।
इस्लाम और पैग़ंबर-ए-इस्लाम के खिलाफ़ ज़हर-अफ़शानी करने से उनकी अज़मत पर भला कोई हर्फ़ आ सकता है ??? हाँ, शोहरा-ए-आफ़ाक़ होने की उसकी ख़्वाहिश ने उसे अब्दी इज़्तिराब का शिकार और अब्दी अज़ाब का मुस्तहक़ ज़रूर बना दिया था ।
काश ! शोहरत और सुकून की तलाश में भटकने वालों को यह हक़ीक़त समझ में आजाये कि ख़ुदा को नाराज़ करके जो शोहरत हासिल हो उससे बेहतर गुमनामी है, क्यूंकि ऐसी शोहरत का अंजाम सिर्फ़ अब्दी-अज़ाब और इज़्तिराब है ।
सबसे बड़ी चीज़ रूहानी सुकून है और अल्लाह के ज़िक्र के अलावा कोई भी चीज़ क़ल्बी सुकून नहीं दे सकती !!!

**********

तस्लीमा नसरीन फिर चर्चा में हैं।
एक उर्दू अफ़साना “शोहरत की ख़ातिर .” इसी पसमंज़र में तहरीर किया गया है । यह अफ़साना 24/08/1996 को उर्दू रोज़नामा ” क़ौमी तंज़ीम ” पटना , के ख़वातीन एडिशन में प्रकाशित हुआ था । पहली बार इसका देवनागरी लिपि में लिप्यंतरण पेश कर रहा हूँ । उम्मीद है आप इसे प्रकाशित करके शुक्रिया का मौक़ा इनायत करेंगे ।
भवदीय
मोहम्मद खुर्शीद अकरम ‘ सोज़’