हकलाने और तुतलाने से कैसे पाएं निजात!!!!

हकलाने और तुतलाने से कैसे पाएं निजात!!!!

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ज्यादातर बच्चे छुटपन में तुतलाते हैं और आगे सही बोलने लगते हैं। लेकिन कई बच्चे बड़े होकर भी तुतलाते रहते हैं। इसी तरह हकलाहट की समस्या भी अक्सर बच्चे के विकास में बाधक बनती है।

हकलाने और तुतलाने से कैसे पाएं निजात, एक्सपर्ट्स से बात करके बता रही हैं प्रियंका सिंह…

किंग खान शाहरुख खान का ‘डर’ फिल्म में का…क…क…क… किरन बोलना फैन्स को भाता है। वैसे, शाहरुख ने तो फिल्म के लिए यह स्टाइल अपनाया, लेकिन फिल्म स्टार रितिक रोशन वाकई बचपन में हकलाते थे। इसकी वजह से वह स्कूल जाने से भी कतराते थे, खासकर जिस दिन मुंहजुबानी टेस्ट होता, वह कोई बहाना बनाकर स्कूल जाने से बचने की कोशिश करते थे। बाद में स्पीच एक्सपर्ट की मदद से उन्होंने अपनी इस कमी को दूर कर लिया और आज वह हमारे चहेते स्टार हैं। इसी तरह ब्रिटिश लेखक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, साइंटिस्ट आइजक न्यूटन, ग्रीक फिलॉसफर अरस्तू को भी बोलने के लिए शब्द नहीं मिलते थे। लेकिन इन लोगों ने अपनी इस कमजोरी पर काबू पाकर अपने लिए अलग मुकाम बनाया।

वैसे हकलाने या तुतलाने की समस्या बेहद आम है लेकिन ज्यादातर मामलों में इसका इलाज मुमकिन है। आरना 5 साल की हो गई लेकिन बाकी बच्चों की तरह साफ नहीं बोल पाती। वह तुतलाती थी। क्लास में बच्चे उसका मजाक उड़ाते थे, इसलिए वह स्कूल भी नहीं जाना चाहती। आरना की मम्मी उसे चाइल्ड स्पेशलिस्ट की सलाह पर स्पीच थेरपिस्ट के पास लेकर गईं। 3 महीने के अंदर ही आरना करीब-करीब साफ बोलने लगी। 21 साल के मोहनीश जब बहुत खुश होते हैं तो उनकी जबान लड़खड़ाने लगती है। उन्होंने अपनी इस कमी को दूर करने की ठानी और शीशे के सामने खड़े होकर धीरे-धीरे बोलने की प्रैक्टिस करने लगे। कुछ ही महीनों में उन्होंने खुद में काफी सुधार पाया। इसी तरह 5 साल का अविरल अक्सर हकलाता था। पैरंट्स उसे सायकॉलजिस्ट के पास लेकर गए। काउंसलिंग में पता चला कि घर में पैरंट्स में झगड़ा काफी होता था। इससे अविरल की पर्सनैलिटी का सही विकास नहीं हो पा रहा था। धीरे-धीरे काउंसलिंग से अविरल पूरी तरह ठीक हो गया।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, हकलाने और तुतलाने के करीब 80-90 फीसदी मामलों को कोशिशों से पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है। तुतलाने या हकलाने से बच्चों और बड़ों, दोनों में आत्मविश्वास कम होने लगता है। वे अपने मन के भावों को बोलकर जाहिर करने से बचने लगते हैं। बेहतर है कि छुटपन में ही इसका इलाज कराएं। आमतौर पर बच्चा 3-4 साल की उम्र तक साफ बोलने लगता है। ऐसा न हो तो बच्चों के डॉक्टर (पीडियाट्रिशन) को दिखाएं। अगर इलाज जल्दी शुरू किया जाए तो सुधार के चांस ज्यादा होते हैं, क्योंकि इस उम्र में थेरपी अच्छा असर करती है।