?? ख़्वाब भी …हक़ीक़त भी ??

?? ख़्वाब भी …हक़ीक़त भी ??

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Rizwan Aijazi
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सच्चे इरादे हों तो क़ुदरत चमत्कार करती है
किताबें लिखने दूसरी बार गोवा गया तो मपसा में एक अतिसामान्य से
गेस्ट हॉउस में रुका । दस दिन का किराया तय किया 3000 रूपये ।
थोड़ा बहुत मोलभाव कराया ,ज़्यादा मोलभाव मेरे बस की नहीं होती ।
ख़ैर ,शाम को सिटी बस से घूमने कलंगूट बीच पर पहुँचा ।
बाज़ार में एक किताबों की शॉप पर लिखा था “”रेहान बुक डिपो “”।
रेहान बेटे का नाम और किताबों के हम रसिया ।
शॉप पर पहुँच गये । किताबें उलटते पलटते हुए शॉप वाले से पूछा ,”
यहाँ कोई सस्ता गेस्ट हॉउस है क्या ? ”
क्योंकि मपसा मेरे मूड मुताबिक जगह नहीं थी
समंदर किनारे से 10 किमी दूर जबकि कलंगूट तो समंदर किनारा ही है ।
उसने सामने एक हेयर ड्रेसर की शॉप की तरफ़ इशारा किया ।
वहाँ मुझे हरि मिला जिसने मुझे 250 रूपये प्रतिदिन के
हिसाब से कमरा दिलवा दिया ।
मैं सुबह आने का वादा कर वापिस मपसा चला गया ।
बहुत झिझक थी कि गेस्टहाउस मैनेजर कैसे पेश आयेगा
क्योंकि मैं 3000 रूपये एक साथ दे चुका था
सुबह मैं ने हिम्मत के साथ सारी बात समझाई
ख़ैर बेरुख़ी दिखाते हुए उसने 2700 रूपये वापिस दे दिये
मेरी जान में जान आई ।
रिसेप्शन पर जब यह सब चल रहा था तब मैं लगातार मैनेजर
के पीछे एक ख़ूबसूरत रिसॉर्ट की तस्वीर
बड़ी हसरत से देख रहा था ,जिसमें बीच में स्विमिंग पूल और
आसपास खूबसूरत बिल्डिंग्स थीं ,ख़ूब सारे नारियल के पेड़ थे ।
चलते चलते मैं ने मेनेजर से यूँ ही पूछ लिया ,”यह होटल आपका है ?
इसके कमरे का कितना किराया होगा ? ”
उसने नाराज़गी से जवाब दिया ,” आप वहाँ नहीं ठहर पायेंगे ।”
मैं ने ठहरी हुई निगाहों से तस्वीर फिर मैनेजर की ओर देखा
जो रजिस्टर में कुछ लिख रहा था ।
मायूसी से सूटकेस उठाया और गेस्टहाउस की सीढियाँ
निगाहें झुकाये उतरता चला आया ।
सिटी बस में बैठ कर कलंगूट आया
हरि मुझे नये गेस्ट हॉउस में ले आया लेकिन मन कुछ उदास सा था ।
मैं ने हरि से कहा ,” भाई मुझे अगर यहाँ कोई प्रोपर्टी
ख़रीदना हो तो मिल जायेगी क्या ? “
जैसे हरि को तो इशारा चाहिये था ,
एक घण्टे बाद ही वो प्रॉपर्टी एजेंट डेविड को ले आया ।
डेविड आज तक मेरे साथ बना हुआ है ।
वो मुझे स्कूटर पर घुमा कर बहुत सी जगहें दिखाने लगा ।
दो तीन दिन में हमने कई जगहें देख डालीं ।
एक रिसॉर्ट में मुझे दो फ़्लेट बहुत पसन्द आये ।
मैं ने डेविड से उनकी जानकारियां लीं और जयपुर आ गया ।
मपसा के गेस्टहाउस मैनेजर की बात दिमाग़ से निकल गई थी ।
डेविड से लगातार मोबाइल पर बात होती रहती थी ।
एक दिन डेविड की कॉल आई कि जिस रिसॉर्ट में दो फ़्लेट देखे थे
वहाँ पूल साइड में फ़्लेट मिल सकता है ,क़ीमत मुझे बहुत उचित लगी
और मैं ने फ़ोन पर ही बात करके भयानक रिस्क उठा ली
और 12 लाख रूपये प्रॉपर्टी मालिक ब्रिगेन्ज़ा के एकाउंट में मैं ने डलवा दिये ।
( इस दुस्साहस की मुझे सज़ा मिली और
इनकमटैक्स स्कुटनी में अपुन का केस आ गया ?)
मैं ने छोटे भाई मुज़फ्फर और बेटे रेहान को गोवा भिजवाया
उन दोनों ने वहाँ जाकर फ़्लेट का पजेशन लिया और
फ़र्नीचर ,AC ,टीवी , फ्रीज से फ़्लेट को सुसज्जित कर दिया ।
कहानी में ट्विस्ट आता है अब ……
?
हम शेष रक़म का इंतज़ाम करके गोवा आते हैं और
डेविड के साथ रजिस्टरी कराने मपसा पहुँचते हैं ।
दो तीन घण्टे वहाँ लगते हैं ।
अचानक हमें मपसा गेस्टहाउस का वही मैनेजर दिखाई देता है ,
जिसे हम लगभग भूल चुके थे ।
मैं ने डेविड से पूछा ,” इसको जानते हो डेविड ?”
भावहीन अंदाज़ में डेविड बोला ,” जी हाँ ! ब्रिगेन्ज़ा का यहाँ होटल है
उसका मैनेजर है ।”
दिमाग़ में 440 वोल्ट का झटका लगा ।
चौंक कर मैं ने डेविड से पूछा ,” कहाँ है होटल ?”
डेविड ने सामने इशारा किया ।
अरे यह तो वही गेस्टहाउस था जहाँ मैं एक दिन ठहरा था ।
मैं ने डेविड का हाथ कस कर पकड़ा और
तेज़ क़दमों से गेस्टहाउस की सीढियाँ चढ़ गया ।
रिसेप्शन के एकदम पास उस कमरे की ओर निगाह डाली
जहाँ दो माह पहले एक रात गुज़ारी थी और
रिसेप्शन के पीछे उस तस्वीर को ग़ौर से देखने लगा ।
डेविड बोला ,” सर ! यह जो तस्वीर में सामने फ़्लेट दिख रहा है ,
यही हमने ख़रीदा है । “
विश्वास करना ,मैं ने बहुत मुश्किल से अपने आपको सम्भाला ।
मेरे दिल की धड़कन धक् धक् हो रही थी ।
बड़ी हैरानी से मैं तस्वीर देख रहा था ।
डेविड ने पूछा ” क्या हुआ सर ? You are all right ?”
मैं ने उसे तमाम कहानी सुनाई । इतने में वहाँ मैनेजर आ गया ।
डेविड ने मेरा उससे परिचय कराया कि ये रिज़वान सर हैं
आपने कॉलोनीया द ब्रिगेन्ज़ा में फ़्लेट ख़रीदा है ।”
मैनेजर ने मुझ से हाथ मिला कर बधाई दी ।
मैं ने पूछा ,” क्या आप मुझे जानते हैं ? “
उसने मुझे ग़ौर से देखते हुए इंकार में सिर हिला दिया ।
मैं ने कहा ,” दो महीने पहिले मैं इस कमरे में एक दिन रुका था ।”
कहीं अंदर से अहँकार कहलवाने की कोशिश कर रहा था कि
बोल दे !बोल दे ! बोल दे !
कि मैनेजर साहब जिसके लिये आपने कहा था
कि यहाँ किराये से नहीं रुक पाओगे ।
हाँ ! मैं किराये से नहीं रुक सकता हूँ लेकिन ख़रीद सकता हूँ ।
मैं कुछ नहीं बोला । एक शब्द नहीं बोला ।
उसे अपमानित नहीं कर सका ।
लेकिन जवाब ख़ुदा ने दिया
ख़ुदा ने मेरी हसरत भरी निगाहें देखी थीं
ख़ुदा ने मेरी हैसियत देखी थी
ख़ुदा ने मुझे बहुत कुछ दे रखा था
ख़ुदा ने मेरी ख़ामोशी और मायूसी को परखा था
ख़ुदा ने मेरे लिये राह आसान की और उस जगह
का मालिक बना दिया जिसे में हसरत से देख रहा था
जो आज आपके सामने है ।
सच्चे दिल से आप कोई इरादा कर लेते हैं तो
कायनात चमत्कारिक रूप से आपकी मदद करती है
उतनी मदद करती है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते
उससे मांगिये ,सच्चे दिल से मांगिये
ख़ूब मांगिये ,वो छप्पर फाड़ कर नहीं देगा
लेकिन सच्ची मेहनत करने वालों के लिये
असम्भव को सम्भव बना देगा ।
(यह संस्मरण मेरी लिखी जा रही किताब “”सेवन स्टार “” का हिस्सा है ।)