इस्लाम में औरत को मर्द से ज़्यादा ये 7 अधिकार मिले हुऐ हैं, जानिये!

इस्लाम में औरत को मर्द से ज़्यादा ये 7 अधिकार मिले हुऐ हैं, जानिये!

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Sikander Khanjada Khan
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जाने इनके बारे में,इस्लाम में औरत को मर्द से ज्यादा मिले हैं ये 7 अधिकार, ये बातें सभी को जानने चाहिये
: 1-इस्लाम ने औरतों को संपत्ति का अधिकार -औरत को बेटी के रूप में पिता की जायदाद और बीवी के रूप में पति की जायदाद का हिस्सेदार बनाया गया। यानी उसे साढ़े चौदह सौ साल पहले ही संपत्ति में अधिकार दे दिया गया है

2-औरतों को अपनी पहचान बनाये रखने का सम्मान-इस्लाम ने औरतों को अपनी पहचान बनाये रखने का भी सम्मान किया है इसलिए जब अन्य महज़ब में शादी के बाद नाम बदलने की इज़ाज़त है ,इस्लाम में औरत शादी के बाद भी अपना नाम बरक़रार रख सकती है। उन्होंने कहा कि अगर इसके बाद भी लोग सोचते हैं कि हम लोग अपनी औरतों को दबा कर रखते हैं तो हमें इस पर सोचना चाहिए।

3-तलाक़ (तलाक़े खुला) लेने का अधिकार-इस्लाम के पहले दुखी और कष्टपुर्ण वैवाहिक जीवन को समाप्त करके पति पत्नी के अलग अलग सुखी जीवन जीने का कोई वैज्ञानिक उपाय किसी मज़हब में नहीं था। जहाँ मर्द को बुरी औरत से निजात के लिए तालाक़ का अधिकार दिया है। वही औरत को भी “खुला” का अधिकार प्रदान किया गया है। जिसका प्रयोग कर वो ग़लत मर्द से छुटकारा पाने का आसान रास्ता दे दिया गया हैं
अन्य धर्मो मे तो जालिम पति या पत्नी से निजात कैसे मिले, कोई नियम नही था/ हाल ही मे यूरोप और अपने भारत मे हिंदू लोगो ने , इस्लाम के तरह तलाक़ लेने की प्रथा की प्रारम्भ की, जिस मे बहुत पेचीदेगी है/ यूरोप मे अगर तलाक़ हो जाता है और बीबी चाहे जितनी भी जालिम हो , उसको ज़िंदगी भर पैसा देने होगा या सतत्लेम्मेंट के तौर पर एक एक भारी रकम बिना किसी जुर्म किए चुकाना पड़ेगा/ भारत मे भी हिंदू तलाक़ के सिस्टम मे भारी पेचेदगि है/ वर्षो वर्षो लग जाते है तलाक़ लेने मे और आज दिल्ली समेत कई शहरो मे ग़लत औरतो द्वारा कई शादी करके पैसे हड़पनेकी / हिंदू पति जी परेशान है जालिम औरतो से छुटकारा पाने के लिए/ बहुत कम ही खुशकिस्मत है जिनको दस पंद्रह साल मे तलाक़ मिल जाए/
ज़रा सोचिएगा कि एक दंपत्ति जिनका दांपत्य जीवन कटुता और विष से भरा है तो उसके पास किसी अन्य धर्म के अनुसार अलग-अलग सुखमय जीवन जीने का क्या विकल्प है
अदालतों में पति न्यायाधीश और वकीलों तथा रिश्तेदारों की उपस्थि ्मेंअपन पत्नी के चाल चरित्र से लेकर स्वभाव तक का गलसही आरोप लगाता है , उसे कुलटा कलमुही और कुलच्छनी साबित करता है , गैर मर्द के साथ उसके हमबिस्तर होने की झूठी सच्ची गवाही दिलाता ह
यही पत्नी भी करती है , वह अपने पति को नामर्द और शारीरिक संतुष्टि ना देने वाला सिद्ध करती है , अलग अलग महिलाओं से उसके नाजायज़ संबंध सिद्ध करती है , मारपीट करने वाला सिद्ध करती है।
: फिर न्यायाधीश भी उकता कर दोनों को अलग होने का फैसला सुना देता है ।
: दोनों अलग हो जाते हैं पर उनको मिलता क्या है ? उन दोनों पर एक दूसरे के लगाए झूठे सच्चे आरोप उनके अगले वैवाहिक जीवन की संभावना को समाप्त कर देते हैं
अदालत में एके दूसरे को नंगा कर के पाए तलाक उनके लिए जीवन भर के लिए काल बन जाते हैं और पुनर्विवाह के हर शुरुआती बातचीत का अंत कर देते ह
इसीलिये पत्नी को जलाकर मार देना या लटका देना पतियों को एक बेहतर विकल्प लगता है और ऐसी घटनाएँ बहुतायत में होती है
सोचिए कि कौन सी स्थिति बेहतर है ? एक कमरे में पति पत्नी का चुपचाप इस्लामिक पद्धति से अलग हो जाना या नंगानाच करके अलग होना।
आप चिढ़ में इस्लामिक व्यवस्थाओं को लाख बुरा कहिए परन्तु एक ना एक दिन आपको इसे अपनाना ही पड़ेगा , उच्चतम न्यायालय भी हिन्दुओं को तलाक की अनुमति दे चुकी है।

4-समान पुरस्कार और बराबर जवाबदेही– इस्लाम में आदमी और औरत एक ही अल्लाह को मानते हैं, उसी की इबादत करते हैं, एक ही किताब पर ईमान लाते हैं | अल्लाह सभी इंसानों को एक जैसी कसौटी पर तौलता है वह भेदभाव नहीं करता
अगर हम दुसरे मज़हबों से इस्लाम की तुलना करेंगे तब हम देखेंगे की इस्लाम दोनों लिंगों के बीच भी न्याय करता है | उदाहरण के लिए इस्लाम इस बात को ख़ारिज करता है कि माँ हव्वा हराम पेड़ से फल तोड़ कर खाने के लिए ज्यादा ज़िम्मेदार हैं बजाय हज़रत आदम के | इस्लाम के मुताबिक माँ हव्वा और हज़रत आदम दोनों ने गुनाह किया | जिसके लिए दोनों को सजा मिली | जब दोनों को अपने किये पर पछतावा हुआ और उन्होंने माफ़ी मांगी, तब दोनों को माफ़ कर दिया गया।

5-तलाकशुदा का विवाह- समाज मे हर व्यक्ति को बिना शादी के नही रहना चाहिए/ अगर तलाक़ हो गयी है तो फ़ौरन अच्छे साथी चुन कर सुखमय जीवन बिताना चाहिए/तलाकशुदा और विधवा महिलाओं को सम्मान देकर पुरुषों को उनसे विवाह करने के लिए प्रेरित किया है , सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हज़रत मुहम्मद ने ऐसी तलाकशुदा और विधवा महिलाओं से खुद विवाह करके अपने मानने वालों को दिखाया कि देखो मैं कर रहा हूँ , तुम भी करो , मैं सम्मान और हक दे रहा हूँ तुम भी दो , मुसलमानों के लिए विधवा और तलाकशुदा औरतों से विवाह करना हुजूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की एक सुन्नत पूरी करना है जो बहुत पुण्य का काम है।
भारत में ही विधवाओं को पति की चिता में सती कर देने की व्यवस्था थी तो उसी भारत में जीवित रह गयी विधवाओं और विधुरों के लिए क्या व्यवस्था थी निययोग प्रथा

6-वर चुनने का अधिकार-वर चुनने के मामले में इस्लाम ने स्त्री को यह अधिकार दिया है कि वह किसी के विवाह प्रस्ताव को स्वेच्छा से स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। इस्लामी कानून के अनुसार किसी स्त्री का विवाह उसकी स्वीकृति के बिना या उसकी मर्जी के विरुद्ध नहीं किया जा सकता। बीवी के रूप में भी इस्लाम औरत को इज्जत और अच्छा ओहदा देता है। कोई पुरुष कितना अच्छा है, इसका मापदंड इस्लाम ने उसकी पत्नी को बना दिया है। इस्लाम कहता है अच्छा पुरुष वहीं है जो अपनी पत्नी के लिए अच्छा है। यानी इंसान के अच्छे होने का मापदंड उसकी हमसफर है।

7-स्वतंत्र बिज़्नेस करने का अधिकार-इस्लाम ने महिलाओं को बहुत से अधिकार दिए हैं। जिनमें प्रमुख हैं, जन्म से लेकर जवानी तक अच्छी परवरिश का हक़, शिक्षा और प्रशिक्षण का अधिकार, शादी ब्याह अपनी व्यक्तिगत सहमति से करने का अधिकार और पति के साथ साझेदारी में या निजी व्यवसाय करने का अधिकार, नौकरी करने का आधिकार, बच्चे जब तक जवान नहीं हो जाते (विशेषकर लड़कियां) और किसी वजह से पति और पुत्र की सम्पत्ति में वारिस होने का अधिकार। इसलिए वो खेती, व्यापार, उद्योग या नौकरी करके आमदनी कर सकती हैं और इस तरह होने वाली आय पर सिर्फ और सिर्फ उस औरत का ही अधिकार होगा। औरत को भी हक़ है। (पति से अलग होना का अधिकार)