जिन्होंने शिवाजी का ध्वज उतारकर अँग्रेज़ों का यूनियन जैक लहराया, वह मराठाओं की बात कर रहे हैं!

जिन्होंने शिवाजी का ध्वज उतारकर अँग्रेज़ों का यूनियन जैक लहराया, वह मराठाओं की बात कर रहे हैं!

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मराठा सेवा संघ दिल्ली प्रदेश के अध्यक्ष कमलेश पाटिलने अपने लेख में उन लोगों को करारा जवाब दिया है, जो मराठा शासन के गौरवशाली इतिहास पर सवाल उठाते हैं।

मराठा कमलेश पाटिल ने लिखते हैं कि जिनके पूर्वजों का इतिहास भारत को गुलाम बनाने का रहा है, उनकी हैसियत ही क्या है मराठाओं के बारे में बात करने की।

पानीपत के तीसरे युद्ध में भारत को बचाने के लिए डेढ़ लाख मराठा सेना मैदान में थी, उसमें कितने मिश्रा, झा, दुबे, तिवारी, त्रिपाठी, त्रिवेदी द्विवेदी, अग्रवाल, गुप्ता जैन थे…? निम्न संक्षिप्त संदर्भ में मराठों का (सिंधिया का) इतिहास उन्हीं लोगों के लिए है जिन्हे मराठों से जलन है और MP BJP के प्रभात झा जैसे नेता समय-समय पर कहते रहते है की “ सिंधिया की हालत लालू जैसी करेंगे ?

जिनके पूर्वजों ने भारतीय स्वराज्य की राजधानी पुणे में छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज्य का ध्वज उतारकर अंग्रेजो का यूनियन जैक लहराया वह सिंधिया का भ्रष्टाचार सुना रहे है…?

अंग्रेजो से मिलकर पूरे भारत को गुलाम बनाने की येाजना तुमने बनाई, भारतीय राजाओं की गुप्त जानकारी देकर अंग्रेजो की मदद की, परिणामत: भारत जगह-जगह हारता गया. ऐसी स्थिति में महाराज जयाजी सिंधिया की तत्कालीन ताकत को नजरअंदाज करके आरोप लगाना केवल चोरो एवं ठगों का काम होता है.

ऐसे बुरे समय में, विद्वान ब्राह्मणों को अपनी वैदिक शक्ति का प्रयोग करके भारत को गुलाम बनाने से बचाना चाहिए था. क्योंकि इन्होने को मंत्रो से अमोघ शक्ति प्राप्त कर रखी है। तो फिर राजा महाराजा और उनकी सेना पर क्यूं निर्भर रखा देश को।

रानी लक्ष्मीबाई ने देश प्रेम की खातिर अंग्रेजों से जंग नही छेड़ी थी. बल्कि अंग्रेजों ने लक्ष्मीबाई के गोद लिये बच्चे को युवराज मानने से मना करते हुए सुविधाएं देने से मना कर दिया था इससे नाराज लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध छेड़ा था. इस स्वार्थी युद्ध में जयाजी सिंधिया ने सहयोग नहीं दिया तो उन्हे अंग्रेजों का सहयोगी साबित करने पर तुल गए जातिवादी इतिहासकार।

अंग्रेजों ने भारतीय राजाओं से किए करार के अनुसार केवल रक्त संबंधी वारिस को ही सुविधा देने का निर्णय लिया था. रानी ने तो बच्चा गोद लिया था. यह करार के खिलाफ था. यह पारिवारिक स्वार्थ का विषय था. देशप्रेम-राष्ट्रप्रेम का विषय तो था ही नहीं।

अगर रानी का संघर्ष प्रस्ताव केवल राष्ट्र हित मे स्वराज्य हित में होता तो रानी को जयाजी, इंदौर के होलकर, बड़ौदा के गायकवाड़, नागपुर के भोसले और उत्तर भारत के राजपूत जाट राजा भी खुले दिल से समर्थन करते लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जनेऊ जमात द्वारा यह अतार्किक असमर्थनीय ठीकरा केवल ग्वालियर घराने पर क्यों फोड़ना चाहते हैं ?

वजह ये है कि मराठों के प्रति ब्राह्मणों का गुस्सा आज भी खत्म नही हुआ है। 670 साल तक इस्लामिक राजाओं के साथ सत्ता मे अकेले ब्राह्मणों की भागीदारी को खत्म करके भारतीयों का स्वराज्य आंदोलन खड़ा करने का अलौकिक कार्य महाराज शहाजी राजे भोंसले, राष्ट्रमाता जीजाबाई के नेतृत्व मे छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके लाखों मराठा सैनिकों ने किया.

इस बात से चिढ़कर गाहे-बगाहे वह मराठा, कुर्मी, जाट, गुर्जर, यादव आदि जातियों के प्रति अपना गुस्सा निकालते रहते हैं. इनकी राष्ट्रभक्ति असल मे पानीपत के तीसरे युद्ध में दुनिया को देखने को मिली. इतिहासकार कहते हैं की पानीपत में पेशवाओ ने मनसे मराठों का साथ दिया होता तो शायद इस युद्ध के बाद भारतीयों को पुन: सम्राट अशोक के समय के महान भारत के दर्शन होते.
पूरा लेख अगले भाग में…

(लेखक कमलेश पाटिल, संयोजक, जाति जोड़ो भारत बनाओ अभियान- “85 करोड़ किसान गण परिषद”, एवं दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष, मराठा सेवा संघ हैं)