ढहा दो, जला दो, जला दो….जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वह कहाँ हैं???

ढहा दो, जला दो, जला दो….जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वह कहाँ हैं???

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Mohd Zahid i
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ढहा दो, जला दो, त्याग दो :
कल फिर एक और संगीत छेड़ी गयी, गुजरात चुनाव तक संगीत के तमाम वाद्य यंत्रों से ऐसी धुन निकलती रहेगी, जिससे शायद कोई एक सुपरहिट होकर गुजरात में भाजपा की हवा बना दे, अब कल संगीत सोम के निशाने पर फिर “ताजमहल” था।
दुनिया में प्रेम के एकलौते मंदिर के रूप में माना जाने वाला “ताजमहल” अब नफरत के सौदागरों के आक्रमण के केन्द्र में है। और वह केवल इसलिए कि ताजमहल को बनाने वाले मुसलमान और मुग़ल थे।

तुम्हारे पास सत्ता है, तुम्हारे पास बहुमत है तुम बहुसंख्यक हो, ढहा दो, ढहा दो ताजमहल जिससे दुनिया तुम्हारा यह रूप भी देख सके।

परन्तु तुमको मुग़लों की निशानियाँ मिटाने के लिए सिर्फ़ ताजमहल ढहाना ही अधिक नहीं होगा, तुमको और भी बहुत कुछ ढहाना, मिटाना और छोड़ना पड़ेगा।

तुमको आगरा इलाहाबाद और दिल्ली का वो लालकिला भी ढहाना होगा जिसमें भारतीय सेना की गोपनीय गतिविधियाँ चलती हैं और प्रधानमंत्री सीना तान कर स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराते हैं और दुनिया गर्व से देखती है, तुमको हुमायूँ मकबरा, दिल्ली की जामा मस्जिद भी ढहानी होगी, तुमको भारत की जीवन रेखा कही जाने वाली शेरशाह सूरी की बनवाई जीटी रोड भी उखाड़ कर फेंकनी होगी।

जहाँगीर द्वारा बनवाया श्रीनगर का शालीमार बाग उजाड़ना होगा, तो फतेहपुर सीकरी का बुलंद दरवाज़ा, नूरजहाँ द्वारा बनवाया एत्मादुद्दौला का मकबरा भी ढहवाना होगा।

कुतुबमिनार को भी तो ढहाना होगा संगीत की बेसुरी सुर।

इसके बाद भी तुम मुगलों और मुसलमानों की निशानियों को इस देश से मिटा नहीं पाओगे क्युँकि वह तुम्हारे रग रग में है, खून में है जीवन पद्धति में है।

तुमको जूते चप्पल को जलाकर उसकी जगह खँड़ाऊँ पहनना पड़ेगा, कुर्ता पजामे को जलाकर धोती पहनना होगा और ऊपर नग्न रहना होगा, दस्तरखान अर्थात डाइनिंग टेबल को घरों से निकाल कर फेंकना होगा और चटाई पर बैठकर केले के पत्ते पर भोजन ग्रहण करना होगा।

और फिर क्या नहीं खाओगे ? वो भी सुन लो

परांठा , मुगलाई परांठा , लाहौरी चिकन, लाहौरी मटन, पेशावरी तवा चिकन, चिकन चंगेजी, अफगानी कढ़ाई और अफ्लातून टिक्का , मुगलई चिकन , चिकन और मांसाहार के सारे पकवान मुर्ग मखानी ,मुगलई मुर्ग , बिरियानी , बिरयानी बादशाही,कीमा मटर, मीट दरबारी, कबाब मुगलई ,मुर्ग नुरजहाँ,मुर्ग काली मिर्च,मलाई कोफ़्ता, नवरत्न कोरमा, शाही मटन कोरमा, शामी कबाब, सीक कबाब, बोटी कबाब, शहजनानी मुर्ग मसाला, शाही मुर्ग मसाला, शाही काजु आलु, रोगन जोश, मुर्ग मोसल्लम और भोजन बनाने की तंदूर पद्धति के सभी व्यंजन।

क्युँकि तंदूर पद्धति मुगलों और मुसलमानों की ही देन है।

बटर चिकन, फ्राईड चिकन, तंदूरी चिकन और पनीर टिक्का के बिना दारू गटकनी होगी।

गटक पाओगे ? बूचड़खाना के संगीत ?

और सुनो

अकबर के नवरत्नों में से एक तानसेन जिनका नाम रामतनु पांडेय था और एक महान संगीतकार थे उनके द्वारा अविष्कार किए “मियां की मल्हार”, “मियां की तोड़ी” और “दरबारी कनड़” जैसे नए रागों को भी छोड़ना पड़ेगा।

और सुनो, तमाम वाद्य यंत्रो से तौबा भी करनी होगी जो मुगल काल में लाए गये थे।

और सुनो

अकबर के समय, फैज़ी द्वारा पंचतंत्र, रामायण और महाभारत का फारसी में किया अनुवादन भी जलाना होगा।

और सुनो

अब्दुल रहीम खान-ए-खाना के दोहों को गंगा सागर में बहाना होगा।

और सुनो

शेरशाह सूरी और फिर अकबर की बादशाहत में राजस्व मंत्री टोडर मल द्वारा आधुनिक मानक बाट और माप को बदलना होगा, राजस्व अधिकारियों की नियुक्त की व्यवस्था ध्वस्त करनी होगी। मने आयकर आधिकारी और बिक्री कर अधिकारी, उत्पाद कर और सेवा कर की व्यवस्था त्यागनी होगी क्युँकि यह सब मुगलों की ही बनाई व्यवस्था है।

और सिर्फ़ यही क्युँ ? और सुनो

पूरी आधुनिक शासन व्यवस्था तुमको बदलनी होगी जिसमें अलग अलग क्षेत्र और विभाग के लिए अलग अलग वज़ीर (मंत्री), केन्द्र, प्रान्त (राज्य), जिले , परगना और ग्राम की आधुनिक व्यवस्था भी मुगलों की ही देन है जिसे वजीर, मीर बख्शी, खान-ए-सामा और रुद्र-उस-सुदूर, काजी-उल-कुजात, मीर आतिश मुहतसिब, दरोगा-ए डाक चौकी, मीर-बहर, मीर अदल, हरकारा के नाम दिए गये थे जो तुमने इस मुगल व्यवस्था को, अपना तमाम नाम फला मंत्री फला अध्यक्ष देकर अपना लिया

इसे समाप्त करके मनु-स्मृति लागू कर दो

http://www.vivacepanorama.com/mughal-administration-art-an…/

और सब छोड़ो

ये जो तुम इतिहास इतिहास बोलते हो ना ? उस इतिहास को लिखना भी तुमको मुगलों ने ही सिखाया।

“बाबरनामा” इस भारत का पहला इतिहास है जिसमें दिन प्रतिदिन का इतिहास लिखा गया, फिर उनके बेटे हुमायूँ और अकबर ने एक एक दिन का इतिहास लिखवाया,अबुल फजल अकबर के शासन का इतिहासकार था । उसने अकबर की जीवनी, अकबरनामा, लिखी, अबुल फजल ने सात साल तक अपने युग का इतिहास दर्ज किया जिसे अबुल फजल ने आईन-ए-अकबरी मेँ की है।

तब तुम समझ पाए कि इतिहास भी किसी चिड़िया का नाम है।

महान इतिहासकार यदुनाथ सरकार के अनुसार

“इतिहास के बिना मनुष्य बोगस नजर आता है। भारत में मुग़लों के आने के पहले इतिहास लेखन की परंपरा नहीं थी।आरएसएस के लोग मुसलमानों को बर्बर और हिन्दू विरोधी प्रचारित करने के चक्कर में यह भूल ही गए कि मुसलमानों के आने के बाद ही भारत में इतिहास लिखने की परंपरा का श्रीगणेश हुआ है। मुग़लों के आने के पहले हिन्दुओं में सांसारिक घटनाओं और दैनंदिन ज़िंदगी की घटनाओं का इतिहास लिखने की प्रवृत्ति नहीं थी। हिन्दुओं के लिए तो संसार माया था और माया का ब्यौरा कौन रखे ! मुसलमानों को इसका श्रेय जाता है कि हमने उनसे इतिहास लिखना सीखा। मुग़लों के आने के पहले हिन्दू समाज में दैनंदिन जीवन में क्या घटा और कैसे घटा इसका हिसाब रखना समय का अपव्यय माना जाता था । यही वजह है कि मुग़लों के आने के पहले कभी किसी व्यक्ति ने इतिहास नहीं लिखा। कुछ राज प्रशस्तियाँ या अतिरंजित वर्णन जरुर मिलते हैं। उनमें तिथियों का कोई कालक्रम नहीं है, उस दौर में काल -निरुपण ग्रंथ तो एकदम नहीं मिलते।”

कहने का तात्पर्य है कि भारत के निर्माण में मुसलमानों की देन को भूलना नहीं चाहिए। इतिहास रचना करने की सीख इस देश को मुसलमानों से ही प्राप्त हुई तो आज से इतिहास इतिहास करना बंद कर दो।

और सुनो, सब उजाड़ देना तो दिल्ली को भी उजाड़ देना क्युँकि दिल्ली को देश की राजधानी मुसलमानों ने ही बनाया और खिलजी वंश से इसकी शुरुआत हुई नहीं तो पहले तो यह “इन्द्रप्रस्थ” नाम का एक छोटा सा गाँव था।

तो सब त्याग दोगे, जला दोगे, ढहा दोगे तो बचेगा क्या, बताऊँ ?

कंद मूल, केले के पत्ते पर चावल दाल और चटाई पर बैठकर भोजन, मनुस्मृति व्यवस्था और नंगी पुंगी काम क्रिणा करतीं अजंता एलोरा और खजुराहो की मुर्तियाँ।

और हाँ, संसद, राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट, साउथ नार्थ ब्लाक और पूरा लुटियन ज़ोन मत ढहाना क्युँकि यह सब तुम्हारे बाप ने बनवाया था।