तब ख़लीफ़ा-ए-मुस्लिमीन उमर बिन ख़त्ताब रह. ने कहा ”अल्लाह की क़सम मेरे जीते जी ऐसा नही होगा”

तब ख़लीफ़ा-ए-मुस्लिमीन उमर बिन ख़त्ताब रह. ने कहा ”अल्लाह की क़सम मेरे जीते जी ऐसा नही होगा”

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Mujeebur Rehman
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रोम की सल्तनत की चुले हिलाने वाले फारस जैसी सुपर पावर को मिट्टी में मिलाने वाले इस्लाम के शेर खालिद बिन वलीद रह० जब श्याम के गवर्नर थे उस वक्त का वाक्या है बचपन से शहज़ादे की तरह जिंदगी गुज़ारी इस्लामी फौजो के सिपहसलार रहे, जिस वजह से आपके मिज़ाज में शहंशहाना अ़दाज़ था एक बार मजलिस में बेठे हुए थे, शाम (सीरिया) का एक शायर आपकी खिदमत में हाज़िर हुआ और उसने चंद अशार आपकी शान में कहे, खुश होकर अल्लाह की तलवार हज़रत खालिद बिन वलीद ने दस हज़ार दिनार उस शायर को दे दिये,,, जब ये बात खालीफा ए मुस्लिमीन हज़रत उमर को पता चली तो उनहोने हज़रत बिलाल हब्शी को शाम रवाना किया और कहा जाओ और खालिद की पगड़ी से उसके हाथ बांध कर पुछो (क्यों के हर मुजरीम को उस दौर में उसकी पगड़ी से हाथ बांध कर पुछताछ की जाती थी) तुमने ये इनाम माले गनीमत से दिया या अपने माल से,,, अगर माले गनीमत से दिया तो ये खेयानत है और अगर अपने माल से दिया तो ये फ़िजुल ख़र्ची है जो इस्लाम में हराम है,,,, और उन्हे दोनो ही सुरत में माज़ूल कर दो, जब खालिद बिन वलीद रह० से पुछा गया तो उन्होने कहा मैने अपने माल से इनाम दिया है, जिसकी वजह से उन्हे माज़ूल कर दिया गया, खालिद बिन वलीद इस बात पर बहुत नराज़ हुए एक दिन जब मदीने की एक गली में खलीफा मुस्लिमीन से मिले तो कहा उमर तुमने मेरे साथ न इंसाफी की है, ये सुनकर खलीफा ए मुस्लिमीन उमर रह० ने कहा तू चाहता है इस्लाम में भी कैसर और किस़रा की तरह शान ओ शोकत बदशाहत की नींव पड़ जाय अल्लाह की कसम मेरे जीते जी एसा नही होगा,

कैसर और किस़रा की तरहा शान ओ शोकत बदशाहत की नींव पड़ जाय अल्लाह की कसम मेरे जीते जी एसा नही होगा, यही शेर ओ शायरी की रिवायत जब इस्लामी हकुमतों में पन गयी तो उनका नाम सफे हस्ती से मिट गया जिसकी मिसाल हिन्दुसतान की मुगलिया सलतनत भी है आज हम तीन लाख में एक शायर को बुलाते हैं और कहते हैं इस्से इंकलाब आयेगा, हम भुल गये अपनी तारीख अल्लाह के रसुल सल० और खुलफाये राशदीन के तरीको के इंकालाब इन बिकाउ शायरो से नही इंकलाब आता, इमान से आता है!