नांदेड़ में AIMIM की हार क्यों हुई, क्या पार्टी ऐसे चलती है, इस तरह नहीं मिलेगी क़ामयाबी!

नांदेड़ में AIMIM की हार क्यों हुई, क्या पार्टी ऐसे चलती है, इस तरह नहीं मिलेगी क़ामयाबी!

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महाराष्ट्र के नांदेड़ में हुए नगर निगम चुनावों में कांग्रेस पार्टी को बड़ी कामयाबी मिली है उसने यहाँ कुल 81 सीटों में से 69 पर जीत दर्ज की है, कांग्रेस नेशनल पार्टी है, 2014 से उसका बुरा समय चल रहा है, अब कुछ वापसी करती नज़र आ रही है, ख़ास कर गुजरात में अहमद पटेल की जीत के बाद से कांग्रेस में कॉन्फीडेन्स पैदा हुआ है, राहुल गाँधी इन दिनों अच्छे पोलिटिकल मैनेजर्स की निगरानी में सीख रहे हैं, गुजरात के विधान सभा चुनावों में इस बार कांग्रेस अच्छा करेगी ऐसा माना जा रहा है|

बात करते हैं नांदेड़ नगर निगम चुनावों की,,,यहाँ पर बड़ी हार आल इंडिया मजलिस इत्तिहादुल मुस्लिमीन की हुई है,,,चुनाव और खेल में हार जीत, दोनों में से एक ही होती है, कोई जीतता है और कोई हार जाता है, बहुत बार हारने वाला जीत जाता है और जिससे जीतने की उम्मीद होती है हर जाता है|

सोशल मीडिया में AIMIM से हमदर्दी रखने वाले बहुत सारे लोग हैं, एक से एक शानदार पोस्ट यहाँ देखने को मिलती हैं, लोग फेसबुक पर बहुत काम, मेहनत करते हैं मगर यही मेहनत ज़मीन पर तो कहीं भी नज़र नहीं आती| AIMIM के कार्यकर्ता जोश से भरे हुए हैं पर उनके बड़े नेता उनसे सम्पर्क नहीं रखते हैं|

AIMIM में जो भी कार्यकर्ता हैं वह कम उम्र के नौजवान हैं, इनकी सियासी तरबियत करने वाला कोई नहीं, राजनैतिक रूप से पार्टी का ढांचा नज़र तो आता है पर वह बेतरतीब और छितरा हुआ है|

पार्टी में सुधर की बहुत गुंजाईश है, कई सारे फील्ड ऐसे हैं जिन पर बारीकी, गहराई से काम होना ज़रूरी है|

उत्तर प्रदेश में AMIM पार्टी की 60 से ज़यादा ज़िलों में यूनिट्स बन चुकी हैं ऐसा जानकारी मिलती है, मगर यह यूनिट्स कितने काम की हैं इनका अंदाज़ा किसी को शायद ही होगा|

AIMIM के ऊपर के नेताओं के साथ एक बड़ी समस्या नीचे काम करने वाले कार्यकर्ताओं से तालमेल न रखना भी है, अब इस को यूँ समझें,,,उत्तर प्रदेश में पार्टी ने विधानसभा में 38 उम्मीदवार उतारे थे, बहुत मज़बूती के साथ लोगों ने चुनाव लडे, हर सीट पर शायद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की सभायें हुईं, चुनावों के नतीजे जब आये तो पार्टी को कहीं कामयाबी नहीं मिली, सभी का हार जाना वैसे तो अच्छा नहीं था, उम्मीद भी थी कि कुछ सीटों पर AIMIM को कामयाबी मिलेगी, पर ऐसा हुआ नहीं,,,चुनाव ख़तम होने के बाद होना यह चाहिये था कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सभी कैंडिडेट्स की मीटिंग बुलाते, उन से समीक्षा करते, उनका हौंसला बढ़ाते और आगे कैसे काम करना है बताते,,,मगर ऐसा नहीं हुआ, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से कोई पार्टी का नेता जिसको उन्होंने शायद इजाज़त दे रखी है के आलावा बात करना चाहे, मुलाक़ात करना चाहे तो वह मुमकिन ही नहीं है,,,राष्ट्रीय अध्यक्ष के मोबाइल फ़ोन पर कोई भी पार्टी का नेता एक बार फ़ोन करे या एक हज़ार बार रिप्लाई कभी नहीं आयेगा, आप एक बार मैसेज करें या दस बार जवाब कभी नहीं मिलेगा,,,तो फिर ऐसे में कौनसा तरीक़ा है जिससे पार्टी को मज़बूत बनाया जाये|

उत्तर प्रदेश में आज जहाँ – जहाँ भी मज्लिश की यूनिट्स हैं, वहां अंदर ही अंदर घमासान मचा हुआ है, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के पास भी समय नहीं होता कि वह अपने लोगों से SMS/फ़ोन के ज़रिये संपर्क में बने रहें, अगर किसी को कोई काम या बात करना है तो तब फ़ोन कर बात कर सकता है, अध्यक्ष, पार्टी की तरफ से फ़ोन शायद ही कभी आये|

जब तक पार्टी के संगठन को ऑर्गनाइज़्ड नहीं किया जायेगा, कार्यकर्तों को ट्रेनिंग नहीं दी जाएगी, उन्हें यूनिटी & डिसिप्लिन नहीं सिखाया जायेगा, उनका मोरल बूस्ट नहीं किया जायेगा, सिर्फ सोशल मीडिया की पोस्ट वगैरह और जोशीली तकरीरों से चुनाव नहीं जीता जा सकता है|

उत्तर प्रदेश में पार्टी को आये हुए अब कई वर्ष का समय हो चुका है मगर आज तक पार्टी यह नहीं कह सकती है कि हम ने ‘यह काम समाज’ के लिए किया है, सरकारी अधिकारीयों को ज्ञापन देना, मीडिया में खबरें छप जाना राजनीती नहीं है| काम बोलता है,,,काम AIMIM ने अभी तक कोई भी नहीं किया है|

अभी तक उत्तर प्रदेश कार्यकारणी में अन्य वर्गों, धर्मों के लोगों को शामिल नहीं किया जा सका है, प्रदेश के साथ साथ जिला कमेटियों की भी यही हालत है, इन में भी अन्य धर्मों के लोगों को नहीं लिया गया है| इस से सन्देश अच्छा नहीं जाता है|

मजलिस के नेताओं की भाषण शैली ऊबा देने वाली है, सभी नेता राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की शैली को अपनाते नज़र आते हैं, ऐसे भाषण ओवैसी की ज़बान से तो अच्छे लगटी है, लोग तालियां बजाते हैं, तारीफ करते हैं, मगर सच में यह भाषण और लोगों के मूँह से सुन कर लोग ‘बुरा सा मुंह’ बना लेते हैं|

आज के समय में लोगों को काम चाहिए, भाषण से किसी का पेट नहीं भरता, न ही किसी समस्या का समाधान होता है, आम आदमी चाहता है कि राजनैतिक पार्टी उसके दुःख, दर्द की बात करे उसका समाधान करे,,,अब अगर नेता लोग मजमा जमा कर ‘तमाशा’ दिखाना चाहें तो यह बाज़ीगरी जनता समझने लगी है|

AMIM की उत्तर प्रदेश कमेटी में कुछ सुधार की तत्काल आवश्यकता है अगर वह सुधार नहीं हुए तो पार्टी सोशल मीडिया के दम पर नहीं चल सके गी| अच्छी अच्छी बातें करने और उन बातों पर अमल करने में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ होता है, मुसलमानों के ओलिमा हज़रात बहुत अच्छी अच्छी बातें करते हैं मगर जब उन्होंने ज़मीनी काम नहीं किये तो समाज का ढर्रा ही बिगड़ गया, ऐसा ही राजनीती में होता है, यहाँ काम करना पड़ता है, ज़बान चलाने से वोट नहीं मिलते हैं, वोटों के लिए सडकों पर उतरना होता है|

मज्लिस के ऊपर लोग आरोप लगते हैं कि संघ, बीजेपी से मिले हुए हैं, ऐसे आरोप बेबुनियाद और बे सर पैर के हैं, हाँ इस तरह की बातें कर के लोग पार्टी को नुक्सान ज़रूर पहुँचाने की कोशिश करते हैं, मुस्लिम समाज अंदर से डरा हुआ, टूटा हुआ है,,,,समाज के समझदार लोग पार्टी के साथ खड़ा होने से डरते हैं, वह खुद भी वोट नहीं देते हैं औरों को भी रोकते हैं, पार्टी के लोगों को चाहिये कि पार्टी में ग़ैरमुस्लिमस को शामिल करें, मुस्लिम समाज अपने आप साथ आ जायेगा|

प्रदेश और जिला स्तर के नेताओं को पब्लिक में कैसे और क्या बात करना है सीखना चाहिए, जन सभाओं में किन मुद्दों पर बात हो उनको बताई जाएं, वार्ना माईक पर सभी ओवैसी की तरह दहाड़ते रहेंगे और लोग दूर भागते रहेंगे|

– परवेज़ ख़ान

Tabish Khan
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शुक्रिया नांदेड़ में MIM को नकारनेवालो मुसलमानों,
तुम्हारा “सेक्युलरिज्म” जीत गया, MIM का सेक्युलरिज़्म हार गया ।
हां , जिस सेकुलरिज्म ने RSS को पाल पोस कर बड़ा किया वो जीत गया,
जिस सेक्युलरिज़्म ने हर शहर में मुसलमानों को झुग्गियों में समेट कर रख दिया वो जीत गया,
जिस सेक्युलरिज़्म ने मुसलमानों को पढ़ाई से लेकर नोकरियों तक सबसे पीछे कर दिया वो जीत गया,
जिस सेक्युलरिज़्म ने सिर्फ कश्मीरी पंडितो का खयाल रखा , उन्हें हर तरह से मुआवजा दिया, और मुसलमानों के खिलाफ हुए दंगो में मुसलामानों को आज तक मुआवजा ना दिला सका वो सेक्युलरिज़्म जीत गया,
जिसने स्टेट एजेंसियों का इस्तेमाल करके सिर्फ “मुसलमान ही आतंकवादी होता है, RSS और दूसरे लोग जो आतंक फैलाते है वो आतंकवादी नही” ऐसी सोच को आम किया है वो सेक्युलरिज़्म जीत गया,
जिसने ने पार्टीशन का जिम्मेदार जिन्ना को नकारनेवाले भारतिय मुसलमानो के ठहराकर अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल किया वो सेक्युलरिज़्म जीत गया,
जिस ने आदर्श जैसे घोटाले किये ,जिसने मुसलमानो के हक़ की वक़्फ़ की जमीन पर अम्बानी का घर बनवा दिया, और कई सारी वक़्फ़ की जायदादें आपस मे बांट कर खाली , वो सेक्युलरिज़्म जीत गया,
जिस सेक्युलरिज़्म ने मुसलमानो के हालात के उपर कई रिपोर्ट तो बनवाई पर उसे लागू कभी नही किया वो जीत गया,
जिस सेकुलरिज्म ने हज़ारो दंगों में गुनाहगारो को सज़ा नही दिलवाई बलकी , हारने के डर से चुप रहे वो सेक्युलरिज़्म जीत गया,
जो सेकुलरिज्म, तुम्हे वंदे मातरम न बोलने पर महाराष्ट्र की विधानसभा में मुसलमानो को निष्काषित करने को कहता है वो सेकुलरिज्म जीत गया,
जो सेकुलरिज्म , BJP के सत्ता के पहले शिकार मोहसिन शेख, पुणे के हक़ में सिर्फ हिंदुत्ववादी लोगो के वोट ना चले जाए इस लिए चुप रहता है , वो सेक्युलरिज़्म जीत गया,
जो सेकुलरिज्म मदरसों को RSS के शिशु मन्दिर जैसा बताता है वो सेक्युलरिज़्म जीत गया,
जो सेक्युलरिज़्म अपने ही सांसद अहसान जाफरी गुजरात को इंसाफ न दिला सका, वो सेक्युलरिज़्म जीत गया….
और हां MIM का सेक्युलरिज़्म हार गया, हा हमारे संविधान वाला सेक्युलरिज़्म हार गया,
जो किसी भी पिछड़े तबकों को उन का हक़ दिलाने की बात करता है, जो तुम्हारे हर मुद्दे पर सड़क से संसद तक आवाज उठाता है,
जो तुम्हे रिजर्वेशन मिले, तुम्हारे इलाकों में भी साफ़ सफाई रहे, तुम्हारे इलाकों में स्कूल बने, तुम्हे स्कॉलरशिप मिले, सच्चर कमिटी से लेकर कुंडू कमिटी तक जितनी भी रिपोर्ट्स हुई उनको इम्पलीमेंट करने की बात करता है, जो तुम्हारे हमारे जज़्बात दुनियाके सामने रखता है वो हार गया,
जो बर्मा से लेकर फलीस्तीन के मज़लूमो के उपर तुम्हारा नज़रिया मीडिया से लेकर संसद तक मे रखता है वो सेक्युलरिज़्म हार गया,
जो कहता है कि मेरे इस्लाम पर चलने की इजाजत मुझे संविधान देता है, और हम किसी भी हाल में इस्लाम या संविधान के खिलाफ वाले जुमलो(वंदे मातरम) को नही बोलेंगे वो सेक्युलरिज़्म हार गया,
जो अपना पुणे या सोलापुर में कोई वजूद न होते हुए भी मोहसिन शेख से लेकर तमाम हिंदुत्ववादियों के शिकार मज़लूमो के इंसाफ के लिए खड़ा रहा, वो सेक्युलरिज़्म हार गया,
जो अहसान जाफरी से इंसाफ की गुहार संसद में हमेशा उठाता रहा वो सेक्युलरिज़्म हार गया,
जो अपना वजूद किसी और स्टेट्स में न होते हुए भी, तुम्हारे लिए अपने पर्सनल प्रॉपर्टी से आसाम, बिहार बाढ़ से लेकर उत्तराखंड बाढ़ और फलीस्तीन के मुसलमानो के लिए तक इमदाद भेजता हो वो सेक्युलरिज़्म हार गया….
हां पैसावाला सेक्युलरिज़्म जीत गया,
जो सिर्फ कुछ पैसों की खातिर अपने हक़ की आवाज उठाने वाले मुसलमानो को कट्टर या कम्युनल कहता हो उस शायर का सेक्युलरिज़्म जीत गया,
जो शायरी के नाम पर मुसलमानों को कांग्रेस जैसी दोगली पार्टियों के पैरों में घुंगरू की तरह बांधना चाहता है,
जो 2 4 लोगों को लेकर सारे मुसलमानो को गाली देनेवाला बताता है ,
जो “जय श्री राम” कहकर बाबरी मस्जिद गिराने वालो को और दंगे कराने वालो को और “अल्लाह हु अकबर” कहने वालों को एक जैसा बताता है,
जो आज़ादी के दौर में मुसलमानों को फ़र्ज़ी सेक्युलर पार्टियों का गुलाम बनाये रखना चाहता है,
जो सेक्युलरिज़्म बचाने के नाम पर सिर्फ कांग्रेस जैसी दोगली पार्टियों को बचाना चाहता है ,
उस शायरका सेक्युलरिज़्म जीत गया,
तय्यार रहिये ,
आगे होने वाले तुम्हारे खिलाफ़ दंगो के लिए,
क्योंकि ना कभी कांग्रेस जैसी पार्टिया RSS के खिलाफ कुछ करेंगी ,
नाही ये उन्हें उभरने से रोक पाएंगे,
10 साल कांग्रेस फिर 5 साल बीजेपी ,
और मरते रहो इन्ही के कदमो के नीचे,
क्योंकि ,हमें अपने आप पे भरोसा नही है,
हम हमेशा यही चाहते है कि हमारी आवाज कोई और उठाये ,
हम कहते तो है कि हम सिर्फ अल्लाह से डरते है,
पर हम अल्लाह से नही डरते ,हम BJP से डरते है,
इसलिए हम इंसाफ के हक़ में खड़े रहने वाले पार्टियों को भी सिर्फ मुसलमान नाम होने के वजह से नकार देते है,
हम मिसाल तो देते है 313 कि,
पर सिर्फ 15 % है इसलिए हमारा नाइंसाफी के खिलाफ बोलना सही नहीं ये सोचकर चुप रहते है,
अब बांध लिए है फ़र्ज़ी सेक्युलरों के घुंगरू तो बांधे ही रहो,
तुम्हारा मुस्तक़बिल तुमने खुद चुना है।
(किसी भी कौम के हालात तब तक नहीं सुधरते जब तक,
वो खुद हालात नही बदलना चाहते)