निकाह कैसे करें :: शौहर पर लाज़िम हैं के औरतो का मेहर फ़ौरन अदा कर दिया जाये!

निकाह कैसे करें :: शौहर पर लाज़िम हैं के औरतो का मेहर फ़ौरन अदा कर दिया जाये!

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Sikander Kaymkhani
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इस हकीकत से इन्कार नही किया जा सकता के इन्सान अपनी फ़ितरत और दीन से दूरी के सबब इस हद तक इस्लाम से दूर हो चुका हैं और बुराई को इस तरह अपना रहा हैं के जैसे बुराई बुराई न होकर फ़रमान नबी“ﷺ” सल्लललाहो अलेहे वसल्लम हैं और दीन का एक अहम रुक्न हैं जिसके बिना कोई काम मुकम्मल नही हैं| इन्ही बुराईयो मे बुराई की एक ज़िन्दा मिसाल मौजूदा मआशरे मे होने वाली शादीया हैं जो नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम के तरीके से हटकर होती हैं| निकाह के मौके पर फ़हश गानो का या फ़िल्मी गानो का बजाना, आतिशाबाज़ी का शोर-शराबा, औरतो-मर्दो का एक साथ जमा होकर नाचना, बेपर्दगी का माहोल ये तमाम बदतरीन काम आज निकाह के मौके पर निकाह का एक अहम रुक्न समझ कर किये जाते हैं और इस दिलेरी और खुलूस व मोहब्बत के साथ होते हैं जैसे खुद नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने ये सब करने का हुक्म दिया हो नाऊज़ोबिल्लाह! गौर फ़िक्र की बात ये हैं के क्या नबी तशरीफ़ लाये और मेरे बिस्तर पर बैठे इसी तरह जैसे तुम इस वक्त मेरे पास बैठे हो| फ़्र हमारे यहा की कुछ लड़किया दफ़ बजाने लगी अय्र मेरे बाप और चचा जो जंगे बद्र मे शहीद हुए थे इनका मरसयाह पढ़ने लगी| इतने मे इनमे से एक लड़की ने पढ़ा – “और हम मे एक नबी “ﷺहैं जो इन बातो की खबर रखता हैं जो कुछ कल होने वाला हैं”| नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया – ये छोड़ दो| इसके सिवा जो कुछ तुम पढ़ रही थी वो पढ़ो| (बुखारी)
#हज़रत_मुहम्मद_बिन_हातिब_रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया – हलाल और हराम मे फ़र्क निकाह के मौके पर दफ़ बजाने और आवाज़ का हैं| (इब्ने माजा)

इन हदीस की रोशनी मे ये साबित हैं के निकाह के मौके पर अच्छे अशआर पढ़ना और दफ़ बजाना दुरुस्त हैं जो की मौजूदा गाने बजाने से कोसो दूर की बात हैं| क्योकि आजकल गाना बजाने मे सिवाये के शोर शराबे और फ़हश भरे फ़िल्मी गानो के अलावा कुछ नही होता हैं जबकि दफ़ बजाने से इसकी आवाज़ सिवाये महफ़िल के और बाहर नही जाती जिससे किसी को कोई परेशानी नही होती और जो के सुन्नत नबी के मुताबिक भी हैं| गानो गा बजाना जैसा के आज निकाह के मौके पर होता हैं ये सुन्नत की रूह से सरासर हराम हैं(आगे हदीस देखे)| इसके अलावा नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने नेचर निकाह खुद किये और दिगर दूसरे सहाबी ने भी कई-कई निकाह किये लेकिन सिवाये इस दफ़ बजाने की हदीस के (जैसे ऊपर गुज़री) और कही से ये साबित नही के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम के खुद के निकाह के मौके पर किसी किस्म का गाना बजाना या दफ़ ही बजाई गयी हो| जो लोग दफ़ की मिसाल ढोलक से या मौजूदा दौर के फ़िल्मी गानो से देते हैं और इसे दुरुस्त करार देते हैं वो सुन्नत नबी की मुखालिफ़त करते हैं क्योकि नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने अगर दफ़ बजाने से मना नही किया तो ये भी कही नही फ़रमाया के निकाह मे मौजूद मर्द या औरत दफ़ को बजा कर इज़हारे खुशी करे| क्योकि ऐसा करने से सिवाये महफ़िल मे शोर शराबा होगा जैसा का आजकल होता हैं|

हज़रत मुजाहिद रह0 से रिवायत हैं के इन्होने फ़रमाया – हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि0 के साथ थे के इन्हे ढोल की आवाज सुनाई दी| इन्होने फ़ोरन कानो मे उंगलिया दे ली और रास्ते से हट गये ताकि आवाज़ से दूर हो जाये| इन्होने तीन बार ऐसा किया फ़िर फ़रमाया – नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने भी इसी तरह किया था| (इब्ने माजा ये हदीस ज़ैइफ़ हैं ताहम हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि0 का ये अमल और इनका ये कहना के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ऐसा करते थे जनाब नाफ़े के हवाले से सही और हसन सनद के साथ मुसनद अहमद, अबू दाऊद, इब्ने हबान, तिबरानी सगीरा और बैहीकी मे मरवी हैं जिसे दिगर मुहककिकीन ने भी सही और हसन करार दिया हैं लेकिन इन रिवायतो मे ढोल के बजाये बांसुरी की आवाज़ का ज़िक्र हैं| बहरहाल बांसुरी की ये सनद दूसरे मुहददिसो की तहकीक की बिना पर साज़ (बांसुरी) की आवाज़ को खुशी के मौके पर बजाने की कोई दलील नही मिलती जैसा के आजकल के दौर मे फ़िल्मी गानो को बजा कर लोग करते हैं)

मौजूदा निकाह मे सिवाये फ़िल्मी गानो के कुछ और नही सुनाया और बजाया जाता जिसकी आवाज़ इस हद तक तेज़ कर दी जाती हैं के 200-300 मीटर के दायरे मे रहने वाला भी सुन लेता हैं या सुनने के लिये मजबूर हो जाता हैं| इस लिहाज़ से खुद भी गुनाह करते हैं और दूसरो को गुनाह करने पर मजबूर करते हैं| इसके अलावा अकसर निकाह के मौके पर लोग हिजड़ो को भी बुला कर नाच-गाना और तफ़रीह करते हैं जो की सिवाये गुनाह के और कुछ नही|
निकाह के लिये मेहर:

मेहर दरहकीकत एक किस्म का तोहफ़ा हैं जो औरत को शौहर की तरफ़ से निकाह मे दिया जाता हैं और इस मेहर का हुक्म अल्लाह के जानिब से तमाम मोमिन को जो निकाह करते हैं उन पर लाज़िम किया हैं| मेहर देना शौहर पर लाज़िम हैं के वो निकाह के वक्त अपनी होने वाली बीवी को अपनी हैसियत के मुताबिक दे न के अपनी हैसियत से ज़्यादा मेहर तय कर ले और निकाह के बाद उसे अदा भी न कर पाये| बाज़ लोग बीवीयो के मेहर मे नाइंसाफ़ी से काम लेते हैं जैसे मेहर को माफ़ करवा लेना या पूरा न देना| आमतौर पर ये भी आजकल एक उज्र हैं जिसकी बिनाह पर निकाह मे ताखिर होती हैं जैसे के लड़की वाले अपनी लड़की का मेहर शौहर की हैसियत से ज़्यादा तय कर लेते हैं और शौहर के लिये उसको अदा कर पाना कभी-कभी नामुमकिन हो जाता हैं।
जबकि अल्लाह और उसके रसूल ने मेहर के लिये जो हुक्म दिया वो इस तरह हैं:
“और औरतो का उनका मेहर राज़ी खुशी दे दो फ़िर अगर वो खुद अपनी खुशी से कुछ मेहर छोड़ दे तो शौक से खाओ पियो|” क़ुरआन (सूरह निसा सूरह 4, आयत 4)
“और उनका मेहर हुस्ने सुलूक से दे दो|” क़ुरआन (सूरह निसा सूरह 4, आयत 25)
“और मेहर के मुकरर्र होने के बाद अगर आपस मे (कम व बेश पर) राज़ी हो जाओ तो उसमे तुम पर कुछ गुनाह नही हैं|” क़ुरआन (सूरह निसा सूरह 4, आयत 24)
क़ुरआन की इन आयतो से वाज़े हैं के शौहर पर लाज़िम हैं के औरतो का मेहर उनको बिना किसी बहाने के फ़ोरन अदा कर दिया जाये अलबत्ता वो अगर खुद अपनी मर्ज़ी से कुछ छोड़ दे तो उसमे कोई हर्ज़ नही|
“और अगर तुम ने अपनी बीवीयो को हाथ तक न लगाया हो और न मेहर तय किया हो और उससे कब्ल ही तुम उनको तलाक दे दो तुम पर कुछ इल्ज़ाम नही हैं हां उन औरतो को कुछ न कुछ फ़ायदा दो| मालदार पर अपनी हैसियत के मुताबिक और गरीब पर अपनी हैसियत के मुताबिक अच्छा फ़ायदा दे| नेकी करने वालो पर ये लाज़िम हैं|” क़ुरआन (सूरह अल बकरा सूरह 2, आयत 236)
क़ुरआन की इस आयत से साबित हैं के मेहर देना मर्द का औरत के लिए एक हुस्नसुलुकी का मामला हैं चाहे मर्द ने अपनी बीवी को हाथ लगाया हो या न हो और तलाक दे दी हो| न के हाथ लगाये बिना तलाक के साथ साथ उसे रुसवा क घर से निकाल दे| लिहाज़ा क़ुरआन की रुह से साबित हैं के मेहर देना हर मर्द के लिये लाज़िम हैं जो की मालदार और गरीब की हैसियत के मुताबिक हैं|
हज़रत अबू सलमा रज़ि0 कहते हैं मैने हज़रत आयशा रज़ि0 से पूछा नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की बीवीयो का क्या मेहर था? इन्होने कहा बाराह औकिया चांदी के 500 दरहम होते हैं ये नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की बीवीयो का मेहर था| (मुस्लिम)
हज़रत अनस रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने हज़रत सफ़िया रज़ि0 को आज़ाद किया| पस इनसे निकाह किया और इनकी आज़ादी ही इनका मेहर मुकरर्र किया| (मुस्लिम)
हज़रत अबू अजफ़ा सलमी रज़ि0 कहते हैं मैने हज़रत उमर रज़ि0 से सुना वो खुत्बा दे रहे थे| तो इन्होने अल्लाह की हम्दो सना ब्यान की फ़िर फ़रमाया खबरदार तुम लोग औरतो के मेहर मे ज़्यादती न करो, अगर ये काम दुनिया मे बुज़ुर्गी और अल्लाह के नज़दीक परहेज़गारी का होता तो इसके मुस्तहक तुम से बढ़कर नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम थे हांलाकि बाराह औकिया से ज़्यादा न तो आप सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने अपनी बीवीयो का मेहर मुकरर्र किया और न ही बेटिया मे से किसी का किया गया| खबरदार बाज़ लोग अपनी बीवीयो के मेहर मे ज़्यादती करते हैं| इसके दिल मे औरत की तरफ़ से अदावत बाकी रहती हैं| ह्त्ता के वो कहता हैं मैने तेरी वजह से सख्त तकलीफ़ उठाई| (अबू दाऊद, सुनन दार्मी)
हज़रत अनस रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रज़ि0 पर ज़ाफ़रान के निशानात देखे तो नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने पूछा ये क्या हैं? इन्होने कहा ऐ अल्लाह के रसूल सल्लललाहो अलेहे वसल्लम मैने एक औरत से निकाह कर लिया हैं| आप सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने दरयाफ़्त फ़रमाया – मेहर कितना दिया? कहा के गुठली के वज़न के बराबर सोना| आप सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया – वलीमा करो अगरचे एक बकरी हि हो| (सही मुस्लिम, अबू दाऊद)
नोट: इमाम अबू दाऊद रह0 फ़रमाते हैं – एक गुठली पांच दरहम के बराबर होती हैं, नश बीस दरहम के बराबर होती हैं, औकिया चालिस दरहम के बराबर होती हैं|
मौजूदा उल्माओ के मुताबिक एक दरहम का वज़न 2.975 ग्राम चांदी के बराबर और पिछले उल्माओ के मुताबिक 3.06 ग्राम चांदी के बराबर होता हैं|
हदीस नबवी के मुताबिक नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की बीवीयो और बेटीयो का मेहर साढे बारह औकिया से ज़्यादा न था जो के 500 दरहम चांदी के बराबर था और ये 500 दरहम मौजूदा वक्त के 1530 ग्राम चांदी के बराबर हैं| इस हिसाब से अगर चांदी के कीमत देखी जाये तो ये तकरीबन 90,000 हज़ार रुपये के बराबर हैं| लेकिन अगर चांदी की कीमत को 10 साल पीछे जाकर देखा जाये तो पता चलता हैं के 1530 ग्राम चांदी की कीमत 45,000 हज़ार रुपये के बराबर हैं| इसी तरह जितना पीछे के वक्त मे जायेगे तो पता चलता हैं के चांदी की कीमत घटती जाती हैं| यहा तक के अगर नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम के ज़माने तक तहकीक की जाये तो पता चलता हैं के दरहम उस ज़माने का अरब मुमालिक मे चलने वाला 1 रुपया हैं जैसा के हमारे मुल्क मे 1 रुपया हैं| इस हिसाब से ज़रा गौर करे के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने 500 रुपये के लगभग ही अपनी बीवीयो और बेटियो का मेहर मुकरर्र किया था| मेहर कम से कम और शौहर की ताकत के मुताबिक हो इस बात की शहादर हज़रत उमर रज़ि0 की हदीस हैं जो ऊपर गुज़री| इसके अलावा लोहे के छल्ले या कुरान की सूरतो को भी मेहर मे तय किया जा सकता हैं जैसा के एक और हदीस ऊपर गुज़र चुकी हैं| इसके अलावा सहाबी और सहाबिया रसूल की ज़िन्दा मिसाले हदीस मे मौजूद हैं|
नीचे एक और हदीस पर गौर करे:
हज़रत अनस रज़ि0 से रिवायत हैं के हज़रत अबू तलहा रज़ि0 ने हज़रत उम्मे सलीम रज़ि0 को निकाह दिया तो हज़रत उम्मे सलीम रज़ि0 ने फ़रमाया के – कसम हैं अल्लाह की के तू इस काबिल ने के रद कर दिया जये मगर तू काफ़िर हैं और मैं मुसलमान तो मेरे लिये ये जायज़ और हलाल नही के तुझसे निकाह करूं| हां अगर तू मुसलमान और मेहर को ही तू इस्लाम लाना समझ ले| फ़िर अबू तलहा रज़ि0 मुसलमान हो गये और मेहर वही रहा(उनका इस्लाम लाना)| (सुनन निसाई)
वलीमा कैसे करें:
वलीमा दरहकीकत शौहर की तरफ़ से इज़हारे खुशी हैं और लोगो को इस बात से रूबरू कराना हैं के उसने निकाह कर लिया हैं और उसके साथ रहने वाली औरत उसकी बीवी हैं न के गैर महरम जिसको अगर कोई उसके साथ देखे तो मर्द के किरदार पर शक न करें|
ऊपर एक हदीस गुज़र चुकी हैं जिसमे अल्लाह के रसूल ने हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ को कम से कम एक बकरी पर वलीमा करने का हुक्म दिया। इसके अलावा नीचे कुछ और हदीस मौजूद हैं जो वलीमे के ताल्लुक से हैं:
हज़रत अनस रज़ि0 से रिवायत हैं के निकाह किया नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने हज़रत सफ़िया रज़ि0 से और मुकरर्र की उनकी मेहर उनकी रिहाई| अगले दिन सुबाह आपने फ़रमाया – जिसके पास जो कुछ हैं वो लाओ और एक दस्तरखान बिछा दिया चमड़े का और कोई लाने लगा अकत(दही सुखा कर बनाते हुये) और कोई खजूर और कोई घी| इन सब को तोड-ताड कर खूब मिलाया और ये वलीमा हुआ नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम का| (सहीह मुस्लिम)
हज़रत सफ़िया बिन्ते शैबा रज़ि0 ने फ़रमाया नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने अपनी एक बीवी का वलीमा दो मद (तकरीबन पौने दो सेर) जौ से किया था| (सहीह बुखारी)
दुनिया के किसी मज़हब मे ऐसी मिसाल नही मिलती जो लोगो को निकाह के नाम पर इतनी सहूलत फ़राहम करे| बावजूद इसके लोग आज वलीमे के नाम पर भी कम्पीटीशन करते हैं और ये गुमान करते हैं के उनका वलीमा दूसरो से अच्छा हैं और तो और वलीमे की इस अज़ीम सुन्नत के नाम पर दावती खाने पर भी लोग तफ़रका करते हैं और अकसर वलीमा मे गुरबा और मिसकीन को दावत नही देते|
ऐसे लोगो के लिये नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम का फ़रमान हैं:
हज़रत अबू हुरैरा रज़ि0 से रिवायत हैं के इस वलीमे का खाना बदतरीन खाना हैं जिसमे दौलतमंदो को बुलाया जाये और गरीबो को न बुलाया जाये और जिस ने वलीमे की दावत कबूल न की इसने अल्लाह और इसके रसूल सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की नाफ़रमानी की| (इब्ने माजा)निकाह कैसे करें:
इस हकीकत से इन्कार नही किया जा सकता के इन्सान अपनी फ़ितरत और दीन से दूरी के सबब इस हद तक इस्लाम से दूर हो चुका हैं और बुराई को इस तरह अपना रहा हैं के जैसे बुराई बुराई न होकर फ़रमान नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम हैं और दीन का एक अहम रुक्न हैं जिसके बिना कोई काम मुकम्मल नही हैं| इन्ही बुराईयो मे बुराई की एक ज़िन्दा मिसाल मौजूदा मआशरे मे होने वाली शादीया हैं जो नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम के तरीके से हटकर होती हैं| निकाह के मौके पर फ़हश गानो का या फ़िल्मी गानो का बजाना, आतिशाबाज़ी का शोर-शराबा, औरतो-मर्दो का एक साथ जमा होकर नाचना, बेपर्दगी का माहोल ये तमाम बदतरीन काम आज निकाह के मौके पर निकाह का एक अहम रुक्न समझ कर किये जाते हैं और इस दिलेरी और खुलूस व मोहब्बत के साथ होते हैं जैसे खुद नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने ये सब करने का हुक्म दिया हो नाऊज़ोबिल्लाह! गौर फ़िक्र की बात ये हैं के क्या नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम के ज़माने मे भी इसी तरह निकाह होते थे|
नीचे हदीस पर गौर फ़रमाये:
हज़रत खालिद बिन ज़कवान से रिवायत हैं के – हज़रत रबिया बिन्ते मऊज़ रज़ि0 ने फ़रमाया – नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम तशरीफ़ लाये और जब मैं दुल्हन बना कर बैठाई गयी| नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम तशरीफ़ लाये और मेरे बिस्तर पर बैठे इसी तरह जैसे तुम इस वक्त मेरे पास बैठे हो| फ़्र हमारे यहा की कुछ लड़किया दफ़ बजाने लगी अय्र मेरे बाप और चचा जो जंगे बद्र मे शहीद हुए थे इनका मरसयाह पढ़ने लगी| इतने मे इनमे से एक लड़की ने पढ़ा – “और हम मे एक नबी हैं जो इन बातो की खबर रखता हैं जो कुछ कल होने वाला हैं”| नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया – ये छोड़ दो| इसके सिवा जो कुछ तुम पढ़ रही थी वो पढ़ो| (बुखारी)
हज़रत मुहम्मद बिन हातिब रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया – हलाल और हराम मे फ़र्क निकाह के मौके पर दफ़ बजाने और आवाज़ का हैं| (इब्ने माजा)
इन हदीस की रोशनी मे ये साबित हैं के निकाह के मौके पर अच्छे अशआर पढ़ना और दफ़ बजाना दुरुस्त हैं जो की मौजूदा गाने बजाने से कोसो दूर की बात हैं| क्योकी आजकल गाना बजाने मे सिवाये के शोर शराबे और फ़हश भरे फ़िल्मी गानो के अलावा कुछ नही होता हैं जबकि दफ़ बजाने से इसकी आवाज़ सिवाये महफ़िल के और बाहर नही जाती जिससे किसी को कोई परेशानी नही होती और जो के सुन्नत नबी के मुताबिक भी हैं| गानो गा बजाना जैसा के आज निकाह के मौके पर होता हैं ये सुन्नत की रूह से सरासर हराम हैं(आगे हदीस देखे)| इसके अलावा नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने नेचर निकाह खुद किये और दिगर दूसरे सहाबी ने भी कई-कई निकाह किये लेकिन सिवाये इस दफ़ बजाने की हदीस के (जैसे ऊपर गुज़री) और कही से ये साबित नही के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम के खुद के निकाह के मौके पर किसी किस्म का गाना बजाना या दफ़ ही बजाई गयी हो| जो लोग दफ़ की मिसाल ढोलक से या मौजूदा दौर के फ़िल्मी गानो से देते हैं और इसे दुरुस्त करार देते हैं वो सुन्नत नबी की मुखालिफ़त करते हैं क्योकि नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने अगर दफ़ बजाने से मना नही किया तो ये भी कही नही फ़रमाया के निकाह मे मौजूद मर्द या औरत दफ़ को बजा कर इज़हारे खुशी करे| क्योकि ऐसा करने से सिवाये महफ़िल मे शोर शराबा होगा जैसा का आजकल होता हैं|
हज़रत मुजाहिद रह0 से रिवायत हैं के इन्होने फ़रमाया – हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि0 के साथ थे के इन्हे ढोल की आवाज सुनाई दी| इन्होने फ़ोरन कानो मे उंगलिया दे ली और रास्ते से हट गये ताकि आवाज़ से दूर हो जाये| इन्होने तीन बार ऐसा किया फ़िर फ़रमाया – नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने भी इसी तरह किया था| (इब्ने माजा ये हदीस ज़ैइफ़ हैं ताहम हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि0 का ये अमल और इनका ये कहना के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ऐसा करते थे जनाब नाफ़े के हवाले से सही और हसन सनद के साथ मुसनद अहमद, अबू दाऊद, इब्ने हबान, तिबरानी सगीरा और बैहीकी मे मरवी हैं जिसे दिगर मुहककिकीन ने भी सही और हसन करार दिया हैं लेकिन इन रिवायतो मे ढोल के बजाये बांसुरी की आवाज़ का ज़िक्र हैं| बहरहाल बांसुरी की ये सनद दूसरे मुहददिसो की तहकीक की बिना पर साज़ (बांसुरी) की आवाज़ को खुशी के मौके पर बजाने की कोई दलील नही मिलती जैसा के आजकल के दौर मे फ़िल्मी गानो को बजा कर लोग करते हैं)
मौजूदा निकाह मे सिवाये फ़िल्मी गानो के कुछ और नही सुनाया और बजाया जाता जिसकी आवाज़ इस हद तक तेज़ कर दी जाती हैं के 200-300 मीटर के दायरे मे रहने वाला भी सुन लेता हैं या सुनने के लिये मजबूर हो जाता हैं| इस लिहाज़ से खुद भी गुनाह करते हैं और दूसरो को गुनाह करने पर मजबूर करते हैं| इसके अलावा अकसर निकाह के मौके पर लोग हिजड़ो को भी बुला कर नाच-गाना और तफ़रीह करते हैं जो की सिवाये गुनाह के और कुछ नही|
निकाह के लिये मेहर:
मेहर दरहकीकत एक किस्म का तोहफ़ा हैं जो औरत को शौहर की तरफ़ से निकाह मे दिया जाता हैं और इस मेहर का हुक्म अल्लाह के जानिब से तमाम मोमिन को जो निकाह करते हैं उन पर लाज़िम किया हैं| मेहर देना शौहर पर लाज़िम हैं के वो निकाह के वक्त अपनी होने वाली बीवी को अपनी हैसियत के मुताबिक दे न के अपनी हैसियत से ज़्यादा मेहर तय कर ले और निकाह के बाद उसे अदा भी न कर पाये| बाज़ लोग बीवीयो के मेहर मे नाइंसाफ़ी से काम लेते हैं जैसे मेहर को माफ़ करवा लेना या पूरा न देना| आमतौर पर ये भी आजकल एक उज्र हैं जिसकी बिनाह पर निकाह मे ताखिर होती हैं जैसे के लड़की वाले अपनी लड़की का मेहर शौहर की हैसियत से ज़्यादा तय कर लेते हैं और शौहर के लिये उसको अदा कर पाना कभी-कभी नामुमकिन हो जाता हैं।
जबकि अल्लाह और उसके रसूल ने मेहर के लिये जो हुक्म दिया वो इस तरह हैं:
“और औरतो का उनका मेहर राज़ी खुशी दे दो फ़िर अगर वो खुद अपनी खुशी से कुछ मेहर छोड़ दे तो शौक से खाओ पियो|” क़ुरआन (सूरह निसा सूरह 4, आयत 4)
“और उनका मेहर हुस्ने सुलूक से दे दो|” क़ुरआन (सूरह निसा सूरह 4, आयत 25)
“और मेहर के मुकरर्र होने के बाद अगर आपस मे (कम व बेश पर) राज़ी हो जाओ तो उसमे तुम पर कुछ गुनाह नही हैं|” क़ुरआन (सूरह निसा सूरह 4, आयत 24)
क़ुरआन की इन आयतो से वाज़े हैं के शौहर पर लाज़िम हैं के औरतो का मेहर उनको बिना किसी बहाने के फ़ोरन अदा कर दिया जाये अलबत्ता वो अगर खुद अपनी मर्ज़ी से कुछ छोड़ दे तो उसमे कोई हर्ज़ नही|
“और अगर तुम ने अपनी बीवीयो को हाथ तक न लगाया हो और न मेहर तय किया हो और उससे कब्ल ही तुम उनको तलाक दे दो तुम पर कुछ इल्ज़ाम नही हैं हां उन औरतो को कुछ न कुछ फ़ायदा दो| मालदार पर अपनी हैसियत के मुताबिक और गरीब पर अपनी हैसियत के मुताबिक अच्छा फ़ायदा दे| नेकी करने वालो पर ये लाज़िम हैं|” क़ुरआन (सूरह अल बकरा सूरह 2, आयत 236)
क़ुरआन की इस आयत से साबित हैं के मेहर देना मर्द का औरत के लिए एक हुस्नसुलुकी का मामला हैं चाहे मर्द ने अपनी बीवी को हाथ लगाया हो या न हो और तलाक दे दी हो| न के हाथ लगाये बिना तलाक के साथ साथ उसे रुसवा क घर से निकाल दे| लिहाज़ा क़ुरआन की रुह से साबित हैं के मेहर देना हर मर्द के लिये लाज़िम हैं जो की मालदार और गरीब की हैसियत के मुताबिक हैं|
हज़रत अबू सलमा रज़ि0 कहते हैं मैने हज़रत आयशा रज़ि0 से पूछा नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की बीवीयो का क्या मेहर था? इन्होने कहा बाराह औकिया चांदी के 500 दरहम होते हैं ये नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की बीवीयो का मेहर था| (मुस्लिम)
हज़रत अनस रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने हज़रत सफ़िया रज़ि0 को आज़ाद किया| पस इनसे निकाह किया और इनकी आज़ादी ही इनका मेहर मुकरर्र किया| (मुस्लिम)
हज़रत अबू अजफ़ा सलमी रज़ि0 कहते हैं मैने हज़रत उमर रज़ि0 से सुना वो खुत्बा दे रहे थे| तो इन्होने अल्लाह की हम्दो सना ब्यान की फ़िर फ़रमाया खबरदार तुम लोग औरतो के मेहर मे ज़्यादती न करो, अगर ये काम दुनिया मे बुज़ुर्गी और अल्लाह के नज़दीक परहेज़गारी का होता तो इसके मुस्तहक तुम से बढ़कर नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम थे हांलाकि बाराह औकिया से ज़्यादा न तो आप सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने अपनी बीवीयो का मेहर मुकरर्र किया और न ही बेटिया मे से किसी का किया गया| खबरदार बाज़ लोग अपनी बीवीयो के मेहर मे ज़्यादती करते हैं| इसके दिल मे औरत की तरफ़ से अदावत बाकी रहती हैं| ह्त्ता के वो कहता हैं मैने तेरी वजह से सख्त तकलीफ़ उठाई| (अबू दाऊद, सुनन दार्मी)
हज़रत अनस रज़ि0 से रिवायत हैं के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने अब्दुर्रहमान बिन औफ़ रज़ि0 पर ज़ाफ़रान के निशानात देखे तो नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने पूछा ये क्या हैं? इन्होने कहा ऐ अल्लाह के रसूल सल्लललाहो अलेहे वसल्लम मैने एक औरत से निकाह कर लिया हैं| आप सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने दरयाफ़्त फ़रमाया – मेहर कितना दिया? कहा के गुठली के वज़न के बराबर सोना| आप सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने फ़रमाया – वलीमा करो अगरचे एक बकरी हि हो| (सही मुस्लिम, अबू दाऊद)

नोट: इमाम अबू दाऊद रह0 फ़रमाते हैं – एक गुठली पांच दरहम के बराबर होती हैं, नश बीस दरहम के बराबर होती हैं, औकिया चालिस दरहम के बराबर होती हैं|

मौजूदा उल्माओ के मुताबिक एक दरहम का वज़न 2.975 ग्राम चांदी के बराबर और पिछले उल्माओ के मुताबिक 3.06 ग्राम चांदी के बराबर होता हैं|
हदीस नबवी के मुताबिक नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की बीवीयो और बेटीयो का मेहर साढे बारह औकिया से ज़्यादा न था जो के 500 दरहम चांदी के बराबर था और ये 500 दरहम मौजूदा वक्त के 1530 ग्राम चांदी के बराबर हैं| इस हिसाब से अगर चांदी के कीमत देखी जाये तो ये तकरीबन 90,000 हज़ार रुपये के बराबर हैं| लेकिन अगर चांदी की कीमत को 10 साल पीछे जाकर देखा जाये तो पता चलता हैं के 1530 ग्राम चांदी की कीमत 45,000 हज़ार रुपये के बराबर हैं| इसी तरह जितना पीछे के वक्त मे जायेगे तो पता चलता हैं के चांदी की कीमत घटती जाती हैं| यहा तक के अगर नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम के ज़माने तक तहकीक की जाये तो पता चलता हैं के दरहम उस ज़माने का अरब मुमालिक मे चलने वाला 1 रुपया हैं जैसा के हमारे मुल्क मे 1 रुपया हैं| इस हिसाब से ज़रा गौर करे के नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने 500 रुपये के लगभग ही अपनी बीवीयो और बेटियो का मेहर मुकरर्र किया था| मेहर कम से कम और शौहर की ताकत के मुताबिक हो इस बात की शहादर हज़रत उमर रज़ि0 की हदीस हैं जो ऊपर गुज़री| इसके अलावा लोहे के छल्ले या कुरान की सूरतो को भी मेहर मे तय किया जा सकता हैं जैसा के एक और हदीस ऊपर गुज़र चुकी हैं| इसके अलावा सहाबी और सहाबिया रसूल की ज़िन्दा मिसाले हदीस मे मौजूद हैं|

नीचे एक और हदीस पर गौर करे:
हज़रत अनस रज़ि0 से रिवायत हैं के हज़रत अबू तलहा रज़ि0 ने हज़रत उम्मे सलीम रज़ि0 को निकाह दिया तो हज़रत उम्मे सलीम रज़ि0 ने फ़रमाया के – कसम हैं अल्लाह की के तू इस काबिल ने के रद कर दिया जये मगर तू काफ़िर हैं और मैं मुसलमान तो मेरे लिये ये जायज़ और हलाल नही के तुझसे निकाह करूं| हां अगर तू मुसलमान और मेहर को ही तू इस्लाम लाना समझ ले| फ़िर अबू तलहा रज़ि0 मुसलमान हो गये और मेहर वही रहा(उनका इस्लाम लाना)| (सुनन निसाई)

वलीमा कैसे करें:
वलीमा दरहकीकत शौहर की तरफ़ से इज़हारे खुशी हैं और लोगो को इस बात से रूबरू कराना हैं के उसने निकाह कर लिया हैं और उसके साथ रहने वाली औरत उसकी बीवी हैं न के गैर महरम जिसको अगर कोई उसके साथ देखे तो मर्द के किरदार पर शक न करें|

ऊपर एक हदीस गुज़र चुकी हैं जिसमे अल्लाह के रसूल ने हज़रत अब्दुर्रहमान बिन औफ़ को कम से कम एक बकरी पर वलीमा करने का हुक्म दिया। इसके अलावा नीचे कुछ और हदीस मौजूद हैं जो वलीमे के ताल्लुक से हैं:

हज़रत अनस रज़ि0 से रिवायत हैं के निकाह किया नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने हज़रत सफ़िया रज़ि0 से और मुकरर्र की उनकी मेहर उनकी रिहाई| अगले दिन सुबाह आपने फ़रमाया – जिसके पास जो कुछ हैं वो लाओ और एक दस्तरखान बिछा दिया चमड़े का और कोई लाने लगा अकत(दही सुखा कर बनाते हुये) और कोई खजूर और कोई घी| इन सब को तोड-ताड कर खूब मिलाया और ये वलीमा हुआ नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम का| (सहीह मुस्लिम)
हज़रत सफ़िया बिन्ते शैबा रज़ि0 ने फ़रमाया नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम ने अपनी एक बीवी का वलीमा दो मद (तकरीबन पौने दो सेर) जौ से किया था| (सहीह बुखारी)

दुनिया के किसी मज़हब मे ऐसी मिसाल नही मिलती जो लोगो को निकाह के नाम पर इतनी सहूलत फ़राहम करे| बावजूद इसके लोग आज वलीमे के नाम पर भी कम्पीटीशन करते हैं और ये गुमान करते हैं के उनका वलीमा दूसरो से अच्छा हैं और तो और वलीमे की इस अज़ीम सुन्नत के नाम पर दावती खाने पर भी लोग तफ़रका करते हैं और अकसर वलीमा मे गुरबा और मिसकीन को दावत नही देते|
ऐसे लोगो के लिये नबी सल्लललाहो अलेहे वसल्लम का फ़रमान हैं:
हज़रत अबू हुरैरा रज़ि0 से रिवायत हैं के इस वलीमे का खाना बदतरीन खाना हैं जिसमे दौलतमंदो को बुलाया जाये और गरीबो को न बुलाया जाये और जिस ने वलीमे की दावत कबूल न की इसने अल्लाह और इसके रसूल सल्लललाहो अलेहे वसल्लम की नाफ़रमानी की| (इब्ने माजा)