यूरोप की क्या मजबूरी है जो वह अमरीका के इशारे पर काम करता है?

यूरोप की क्या मजबूरी है जो वह अमरीका के इशारे पर काम करता है?

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दूसरा विश्व युद्ध समाप्त हुआ तो अमरीका और यूरोपीय संघ के बीच नज़दीकी बढ़ गई। इसका कारण वह ख़तरे थे जो आज भी मौजूद हैं, इस संदर्भ में रूस के ख़तरे माना जाता है। दोनों पक्षों की मूल स्ट्रैटेजी एक ही है लेकिन अंतर अलग असग संकटतं और ख़तरों से निपटने के तरीक़े में है।

यूरोप यह मानता है कि सांस्कृतिक हथकंडों की मदद से लक्ष्य साधना अधिक उचित होता है जबकि अमरीका ताक़त के इस्तेमाल की रणनीति रखता है। आतंकवाद का मुद्दा हो, ईरान के परमाणए समझौते का मुद्दा हो या रूस का मामला, इन सभी मामलों में यूरोप की कोशिश होती है कि अगर कोई सैनिक कार्यवाही करनी है तो सुरक्षा परिषद के दायरे में की जाए लेकिन अमरीका इससे हटकर अलग अंदाज़ में काम करने में नहीं हिचकिचाता।

अगर सीरिया संकट की बात की जाए तो इस मामले में भी यूरोप की सोच अमरीका से कुछ अलग है। यूरोप को यह पसंद है कि अब रूस और ईरान के सहयोग से सीरिया संकट को हल कर लिया जाना चाहिए। यूरोप रूस और ईरान को अच्छे ऊर्जा स्रोत के रूप में देखता है। दूसरी ओर अमरीका है जिसने इन दोनों ही देशों पर अनेक तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं।

इन मतांतरों के कारण कुछ हितों के बारे में अमरीका और यूरोप के बीच टकराव भी है। अमरीका ने ट्रम्प शासन में जो अमेरिका फ़र्स्ट की नीति अपना ली है उससे यूरोपीय देशों के साथ अमरीका का विवाद गंभीर हो रहा है। विशेषकर इस लिए थी कि वर्ष 2008 के आर्थिक संकट के बाद से अब तक यूरोप को अनुकूल आर्थिक परिस्थितियां नहीं मिल सकी हैं।

नैटो यूरोप और अमरीका के बीच सुरक्षा पुल

दूसरे विश्व युद्ध में और उसके बाद के दौर में यूरोप ने ख़ुद को अमरीका की गोद में पहुंचा दिया। नतीजा यह हुआ कि अमरीका इस पूरे इलाक़े पर छा गया। यूरोप के लिए सोवियत संघ का मुक़ाबला कर पाना संभव नहीं था इस लिए उसने अमरीका की मदद से सोवियत संघ का मुक़ाबला किया। नैटो की यह कोशिश रही कि सदस्य देशों के बीच कोई विवाद बढ़ने न पाए तथा अमरीका सभी घटक देशों की सुरक्षा का ख्याल रखे। सोवियत संघ के बिखर जाने के बाद नैटो पर नई ज़िम्मेदारी आ गई। नैटो ने अमरीका की इच्छा के अनुसार ज़िम्मेदारियों को सदस्य देशों के बीच बांट दिया।

नैटो के बारे में यूरोप में तीन तरह के विचार

एक विचार यह है कि यूरोप की अपनी अलग सैनिक शक्ति होनी चाहिए। इस विचार के पक्षधर फ़्रांस जैसे कुछ देश हैं। यह देश चाहते हैं कि नैटो में यूरोपीय देशों की भूमिका बढ़े। अमरीका भी यह चाहता है लेकिन उसकी कोशिश है कि नैटो के भीतर यूरोप की स्थिति अमरीका जितनी मज़बूत न हो जाए। वहीं ब्रिटेन जैसे कुछ यूरोपीय देशों का मानना है कि अमरीका नैटो में यूरोप की वर्तमान भागीदारी को कम आंकना बंद करे। जर्मनी जैसे यूरोपीय देश सभी पक्षों को ख़ुश रखने की कोशिश में हैं।

दूसरी ओर अमरीका की कोशिश यह है कि नैटो का दायर विश्व स्तर पर अधिक विस्तृत हो जबकि यूरोप चाहता है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के संकटों के बारे में कोई भी हस्तक्षेप सुरक्षा परिषद के मार्ग से किया जाना चाहिए।

इसी लिए जर्मनी ने अफ़ग़ानिस्तान में सैनिक भेजने के ट्रम्प सरकार के आदेश की अनदेखी कर दी इसी तरह जर्मन सेना कोसोवो में भी किए गए आप्रेशन में शामिल नहीं हुई।

यूरोप का यह मानना है कि मामलों को मिल जुल कर हल किया जाए और संयुक्त राष्ट्र संघ तथा सुरक्षा परिषद की प्रासांगिकता को बचाए रखा जाए। संकटों के बारे में यूरोप और अमरीका की सोच में अंतर है तो निश्चित है कि इन संकटों से निपटने के तरीक़े के बारे में भी मतभेद ज़रूर होगा।

इस तरह यूरोप और अमरीका के संबंधों में नैटो की भूमिका निर्णायक है। ट्रम्प ने ज़ोर दिया कि नैटो के बजट में यूरोप अपना योगदान बढ़ाए क्योंकि यूरोप की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अमरीका क्यों उठाए?

अमरीका और यूरोप के बीच टकराव और दूरी के लक्षण साफ़ दिखाई देने लगे हैं लेकिन एसा नहीं लगता कि नैटो के दायरे में दोनों पक्षों का सहयोग ख़त्म हो जाएगा बल्कि यह सहयोग बढ़ेगा विशेष रूप से वर्तमान परिस्थितियों में जब यूरोप नैटो से अलग हटकर अपनी आत्म रक्षा के लिए कोई ठोस बंदोबंस्त करने की योजना नहीं रखता।

यदि अमरीका यूरोप को अकेला छोड़ देता है तो उसके पास लाजिस्टिक और सामरिक गतिविधियों और हस्तक्षेप की ताक़त कम हो जाएगी।

संक्षेप में यह कहना चाहिए कि हमें यूरोप और अमरीका के बीच तनाव और टकराव तो दिखाई दे रहा है लेकिन फिर भी यूरोप ख़ुद को अमरीका का घटक बनाए रखने को ही प्राथमिकता देगा। इस लिए कि दोनों पक्षों के लक्ष्य एक हैं बस मामलों से निपटने का तरीक़ा अलग अलग है।

दीर्घकालीन नीतियों में दोनों ही पक्ष एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

साभार अलवक़्त