लघु-कथा- “धर्म का अधर्म” :: आजादी से पहले का एक गाँव!

लघु-कथा- “धर्म का अधर्म” :: आजादी से पहले का एक गाँव!

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Suryansh Mulnivashi
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लघु-कथा- “धर्म का अधर्म”
(आजादी से पहले का एक गाँव)
पंडित जी सुबह सुबह मंदिर को निकले लेकिन थोड़ी ही देर में वापस घर की ओर तेज क़दमों से आते दिखे तो नुक्कड़ पर पान की दूकान पर खड़े रणबीर सिंह ने पूछा…
क्या हुआ शास्त्री जी ? सब कुशल तो है ?
राम राम राम कलयुग घूर कलयुग प्रलय आने को है !!
रणबीर सिंह आगे कुछ पूछता इससे पहले ही शास्त्री जी तेजी से घर की ओर मुड़ गये.
रणबीर सिंह भी पीछे पीछे उनके घर की ओर चल दिया वहां पहुंचा तो देखा शास्त्री जी इतनी ठण्ड में कपडे उतार कर नहाने जा रहे हैं. पंडिताइन डरी हुई मुद्रा में बगल में खड़ी हैं.
रणबीर सिंह ने पंडिताइन के पैर छूये और पूछा बात क्या है चाची जी ?
अभी अभी मंदिर गए फिर अचानक वापस आ गए और इतनी सर्दी में देखो स्नान करन लगे हैं. बीमार पड़ गए तो औरो मुसीबत, राम जाने का हुआ कछु बताया भी नहीं !!
शास्त्री जी स्नान कर चुके, नहा कर पहले पूजा घर गए, सवा दो घंटे की पूजा से निपट कर बाहर निकले तो देखा आँगन में भीड़ है. तिवारी, दुबे, पांडे, शुक्ला, चतुर्वेदी, गुप्ता, मिश्रा, शर्मा सभी अड़ोसी पडोसी शुभ चिंतक आँगन में झुण्ड बनाये खड़े हैं !!
रणबीर सिंह एक बार फिर से शास्त्री जी से पूछता है क्या हुआ शास्त्री जी ? सब लोग चिंतित हैं बताइये न ?
शास्त्री जी शुभचिंतकों की भीड़ देखकर आवेश में आ गे, मनुस्मृति से एक श्लोक जोर से पढ़ा फिर उसका अर्थ बताते हुए बोले जिस राज में नीची जाती का आदमी ब्राह्मण की अवहेलना करे ऐसे राज को ईश्वर का प्रकोप झेलना ही पड़ता है, राज में अकाल इसीलिए पड़ा है !
अरे सुबह सुबह मंदिर को निकला रास्ते में दुखिया चमार का मुंह देख लिया इतना ही नहीं उ ससुरा का हिम्मत देखो हमें देखकर भी वहां से हटा नहीं. हम फिर भी साहस किये और आगे बढे तब झट से उ साला हमार गोड़ धर लिया बोला
मालिक चार दिन से हमार बेटवा कुछ नहीं खाया है थोडा
अनाज दिलवाई दो मालिक.
अरे हमने कौनों ठेका ले रखा है तुम लोगों का, पिछले जन्म का पाप है तू नहीं भुगतेगा तो का हम भुगतेंगे, चल हट पीछे !!
राम क्षमा करे उ साला आज हमार धर्म भ्रष्ट कर दिया !
इतना सुनते ही भीड़ से शुक्ला जी बोल पड़े अरे अब राजपूतों में वो शौर्य कहाँ बचा ? अंग्रेजों के राज में क्षत्रियों ने चूड़ियाँ पहन ली हैं, नहीं तो इनकी ऐसी क्या मजाल जो सुबह या दिन में भूले भटके भी कभी इनका चेहरा ब्राह्मण को देखना पड़ जाये !
इतना सुनना था की रणबीर सिंह आग बबूला हो गया और बोला नहीं शुक्ला जी राजपूतों ने अभी चूड़ियाँ नहीं पहनी हैं. और बड़ी तेजी से शास्त्री जी के घर से निकल गया !!
अगले दिन सुबह सुबह शास्त्री जी के घर का दरवाजा जोर जोर से बजने लगा पंडिताइन घबरा गई शास्त्री जी बोले रुको, मैं देखता हूँ !!
दरवाजा खोला तो सामने रणबीर के पिता सूर्यदर्शन सिंह जी थे, बोले पंडित जी हमारे लड़के को बचा लो उसे दरोगा पकड़ कर ले गया है, हम थाने गए तो पता चला उसे कोतवाली भेज दिया है, रात भर बहुत मारा है मेरे बेटवा को अब आप ही सहारा हो बचाई लो !!
शास्त्री जी अवाक् रह गए पूछा किस जुर्म में ले गई पुलिस ?
सूर्यदर्शन सिंह बोले कल रणबीर सिंह दू चार गो आवारा दोस्तवा के लेके चमारटोला में घुस गया वहां दुखिया नाम के एक चमार को इतना पीटा की उ ससुरा नरकवासी हो गया. पुलिस हत्या के साथ साथ बलात्कार का आरोप भी लगा रही है, अब आप ही कुछ करो !!
देखो सूर्यदर्शन सिंह जी जहाँ तक कानून की बात है तो शासन अंग्रेजों का है कानून भी उन्हीं का बनाया हुआ है. भारतीय दंड संहिता हमारी मनुसंहिता तो है नहीं, वहां तो सब बराबर हैं. तुम्हारे लड़के की जगह मेरा लड़का होता उसे भी वही सजा मिलती !
सूर्यदर्शन सिंह जी और शास्त्री जी की वार्तालाप चल ही रही थी की शुक्ला जी भी आ गए. पूरे प्रकरण को समझने के बाद शुक्ला जी ने सुर्यदर्शन सिंह जी से कहा देखो सुर्यदर्शन सिंह जी अब तुम्हारे लड़के ने तो गलती कर ही दी है, मैंने तुम्हे पहले ही चेताया था की रणबीर सिंह की संगती ठीक नहीं है उसका उठना बैठना यादव और पटेलों के लड़कों के साथ था, अब बुरे लोगों के साथ रहोगे तो बुरे संस्कार ही सीखोगे, आचरण भी बुरा ही होगा, खैर छोडो अब मेरी बात ध्यान से सुनो केस बन गया है तो कोई कुछ नहीं कर सकता. चार छः महीने जेल में पड़े रहने दो फिर दो चार बीघा बेच कर कोई अच्छा वकील कर लो, जमानत करवा देगा, फिर चलने देना केस, गवाह कोई मिलेगा नहीं, बस एकाध साल में केस ख़त्म तुम्हारा लड़का बरी…
तभी शास्त्री जी ने तपाक से कहा अरे शुक्ला जी आप भी तो वकील हो आपके होते इन्हें कहीं और जाने की जरुरत है क्या ?
इतना सुनते ही शुक्ला जी ने शास्त्री जी की ओर देखा ओर दोनों के होंठो पर एक हल्की सी शातिर मुस्कान दौड पड़ी.