आख़िर मर्दों को ऐसी महिलाएं क्यों पसंद आती हैं!

आख़िर मर्दों को ऐसी महिलाएं क्यों पसंद आती हैं!

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औरतों के मुक़ाबले मर्द हमेशा मज़बूत और ताक़तवर रहे हैं. शायद यही वजह है कि समाज की बागडोर भी मर्दों के हाथ में रहती आई है.
लेकिन ज़रा सोचिए किसी रोज़ मर्दों की तरह औरतें, मर्दों की तरह मज़बूत शरीर वाली हो जाएं, तो क्या होगा?
इसका समाज पर क्या असर पड़ेगा. हालांकि ऐसा होना दूर की कौड़ी है लेकिन फिर ऐसे समाज की कल्पना तो की ही जा सकती है.

जानकारों का कहना है कि समाज में औरतों का रोल यूं भी पहले के मुक़ाबले बहुत बदला है. पहले औरतों का काम सिर्फ़ मर्दों की दिलजोई करना, उनके बच्चे पैदा करना और घर की तमाम ज़िम्मेदारियां निभाने तक महरूम था.
लेकिन अब महिलाएं भी मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हर मोर्चे पर मुक़ाबला कर रही हैं. आर्थिक तौर पर उनकी स्थिति मज़बूत हुई है. बहुत से मामलों में उन्हें बराबरी का दर्ज़ा हासिल हो गया है.
लेकिन, जहां तक जिस्मानी तौर पर मर्दों की तरह मज़बूत होने का ताल्लुक़ है, तो इसके कई बुरे पहलू प्रभाव हो सकते हैं. अगर महिलाएं, मर्दों की तरह मज़बूत कद-काठी की हो गईं तो इसका सीधा असर उनके जिस्मानी और जज़्बाती दोनों पहलुओं पर पड़ेगा.

क़ुदरत में ज़्यादातर जीवों में नर के मुक़ाबले मादा ज़्यादा बड़ी होती है. इसकी वजह ये होती है कि उन्हें हज़ारों अंडे या बड़ी तादाद में बच्चे अपने अंदर सहेजने और विकसित करने होते हैं.
लेकिन इंसान के संबंध में ये निज़ाम थोड़ा मुख़्तलिफ़ है. लड़कियों का शरीर बच्चे करने की सलाहियत पैदा होने तक विकसित होता है, फिर रुक जाता है. उसके बाद उनके शरीर की मांसपेशियां और हड्डियां मज़बूत होने के बजाए शरीर पर चर्बी जमा होने लगती है.
महिलाएं
जबकि मर्दों का शरीर औरतों के मुक़ाबले ज़्यादा देर तक विकसित होता है. उनकी हड्डी और मांसपेशियां मज़बूत होती रहती हैं. वो आकार और मज़बूती दोनों में औरत से ज़्यादा ताक़तवर बन जाते है.
अगर औरतों को इस क्षेत्र में मर्दों को मात देनी है तो उन्हें ख़ुद की मांसपेशियां मज़बूत करनी होंगी. इसके लिए उन्हें ज़्यादा मज़बूत हड्डियों की ज़रूरत है. साथ ही उनके हार्मोन में भी बदलाव आएगा. ये बदलाव औरतों के बच्चे पैदा करने की ख़ूबी पर असर डालेगा.
जिसके चलते समाज का ताना-बाना बिगड़ सकता है. वैसे भी हमारे समाज में घरदारी की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से औरत की होती है.

अगर औरतें भी मर्दों की तरह ताक़तवर हो गईं तो हो सकता है कि वो अपनी इस ज़िम्मेदारी से हाथ खींच लें. घर चलाने का बोझ मर्दों के कंधे पर आ जाएगा.
एक स्टडी में पाया गया है कि जिन मर्दों के शरीर का ऊपरी भाग मज़बूत होता है वो अपने लिए पॉलिटिकल पॉलिसी का फ़ायदा बेहतर तरीक़े से उठाते हैं. इसके अलावा मज़बूत और विशालकाय शरीर वाले मर्द हर वक़्त मुक़ाबले में बाज़ी मारने की जुगत में रहते हैं.
मर्दों को चूंकि अपनी ताक़त का अहसास होता है इसलिए वो बहुत हिंसक नहीं होते.
क़ुदरत ने औरत को बहुत सुंदर रूप में ज़मीन पर उतारा है. अगर वो शारीरिक तौर पर ज़्यादा मज़बूत हो जाएंगी तो उनकी सुंदरता ख़त्म हो जाएगी.
संभव है कि अपनी ताक़त मनवाने के लिए उनमें सहनशीलता की कमी हो जाए. हो सकता है कि वो ज़्यादा ग़ुस्सैल हो जाएं. दूसरों पर अपना रोब जमाने लगें.

अक्सर मर्दों को ऐसी महिलाएं पसंद आती हैं जो ख़ामोशी से उनकी मातहती क़ुबूल कर लें. चूंकि औरतें मर्दों के मिज़ाज को समझती हैं, लिहाज़ा वो भी अपनी अदाओं से उन्हें रिझाने के पैंतरे चलती हैं.
अगर महिलाएं मर्दों की तरह मज़बूत हो जाएंगी तो हो सकता है वो ये सब ना करें. बहुत हद तक समाज में ऐसा हो भी रहा है.
जिन महिलाओं के पास अच्छी तालीम और पैसा होता है वो ख़ुद को मर्दों के मुक़ाबिल ही मानती हैं. किसी के दबाव में नहीं रहतीं.
पिछले 50 सालों में हर क्षेत्र में महिलाओं की आज़ादी का दायरा बढ़ा है. कई क्षेत्रों में तो उन्होंने मर्दों को पछाड़ा भी है.
तकनीक ने भी औरत और मर्द के फ़ासले को ख़त्म किया है. मैन्युफैक्चिरिंग और फ़ौज जैसे क्षेत्र, जो अभी तक सिर्फ़ मर्दों के लिए ही जाने जाते थे अब वहां भी महिलाओं ने अपने पैर जमाने शुरू कर दिए हैं.
जिन क्षेत्रों में ज़हानत की महारत दरकार है वहां महिलाएं किसी भी लिहाज़ से मर्दों से पीछे नहीं हैं. शायद इसीलिए मर्द अपनी शारीरिक मज़बूती का डंका ज़्यादा पीटते हैं, ताकि किसी ना किसी तरह औरतों पर उनका रुतबा बना रहे.

हालांकि बदलते समय के साथ मर्दों की सोच में भी काफ़ी परिवर्तन आया है. वो ये स्वीकार करने लगे हैं कि उनकी पत्नी उनसे ज़्यादा कमा सकती है. कोई महिला उनकी बॉस बन सकती है.
कोई भी कंपनी मर्दों के मुक़ाबले औरतों को ज़्यादा बेहतर मौक़े दे सकती है. लेकिन फिर भी कई पुरुष ये मानते हैं कि महिलाएं उन्हें फ़ुटबॉल या बॉक्सिंग में मात नहीं दे सकतीं. क्योंकि शारीरिक रूप से वो ज़्यादा मज़बूत हैं.
अगर औरतें मर्दों की तरह जिस्मानी तौर पर मज़बूत हो जाएंगी तो उन्हें कई तरह से इसका फ़ायदा होगा. महिलाओं के साथ होने वाले अपराध में कमी आ जाएगी. बलात्कार कम हो जाएंगे.
इसी के साथ एक सच्चाई और भी है. अभी तक देखा गया है कि महिलाएं ज़्यादा हिंसक होती हैं.
लेस्बियन की अगर बात की जाए तो 17 से 45 फ़ीसदी केस में हिंसा की बात सामने आई है, जबकि 19 फ़ीसदी मर्दों का कहना है कि वो कभी ना कभी अपनी महिला साथी की हिंसा का शिकार हुए हैं.
ऐसा शायद इसलिए भी है कि महिलाओं को अपनी शारीरिक कमज़ोरी का अहसास होता है. और हिंसा के ज़रिए वो ये जताने की कोशिश करती हैं कि वो भी किसी से कम नहीं हैं.

अगर महिलाएं मर्दों की तरह मज़बूत शरीर वाली हो जाएंगी, तो हो सकता है घरेलू हिंसा में कमी आ जाए. जहां मर्द, औरत पर ज़ोर आज़माइश करता है.
लेकिन ये भी संभव है कि फिर महिलाएं भी पुरुषों पर हाथ उठाने लगें.
कुछ जानकारों का कहना है कि इस बदलाव से मुमकिन है कि दफ़्तरों में भेदभाव में कमी आए. वहीं कुछ जानकार मानते हैं कि इस ग़ैरबराबरी का जिस्मानी मज़बूती से कोई ताल्लुक़ नहीं है.
इनके मुताबिक़ गोरे लोग अक्सर जिस्मानी तौर पर दूसरी रंगत वालों से कमज़ोर होते हैं. फिर भी सारी दुनिया में उनकी तूती बोलती है.
उन्हें हर लिहाज़ से बरतरी हासिल होती है. चूंकि एक लंबे अर्से से पूरे समाज पर मर्दों का दबदबा रहा है, लिहाज़ा उसे तोड़ना इतना आसान नहीं होगा.
अगर महिलाओं के पास मर्दों जितनी ताक़त आ जाए तो भी उन्हें अपनी जगह बनानी लड़ाई लड़नी ही होगी. हालांकि महिलाएं अपनी ज़हानत का लोहा मनवा रही हैं. इसीलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें कमान संभालने का मौक़ा भी मिल रहा है.
जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल का नाम इसमें सबसे ऊपर है. इसलिए ये कहना सही नहीं होगा कि महिलाओं को अपना अस्तित्व मनवाने के लिए मर्दों जैसी ताक़त की ज़रूरत है.
वो जैसी हैं उसी रूप में बहुत हसीन और ज़हीन हैं. औरतें अपने इसी रूप में रहकर दुनिया को और ज़्यादा खिलता, महकता गुलशन बना सकती हैं

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राहेल नुवर – बीबीसी फ़्यूचर