“तिरुपति मंदिर”_बौद्ध मत बज्रयान से शैव,वैष्णव, शाक्त पंथ का उदय

“तिरुपति मंदिर”_बौद्ध मत बज्रयान से शैव,वैष्णव, शाक्त पंथ का उदय

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Suryansh Mulnivashi
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बौद्ध मत बज्रयान से शैव,वैष्णव, शाक्त पंथ का उदय-10
“तिरुपति मंदिर”
788 ईस्वी में जन्मे शंकराचार्य को “अद्वैत वाद” के संस्थापक के रुप में जाना जाता है। यह सिद्धान्त “ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या” पर टिका है। इस जातक कथा में “ब्रह्मा की उत्पत्ति” होती है। उसके पहले ब्रह्मा जैसी किसी संज्ञा का कही भी किसी अभिलेख में कोई उल्लेख नही है, कोई मूर्ति नहीं है। यानी “ब्रह्मा” को पैदा करने वाले आदि शंकराचार्य है।
लेकिन तमिलनाडु राज्य में 1017 ईस्वी में जन्म 1137 ईस्वी के कार्यकाल वाले रामानुजाचार्य को “अद्वैतवाद” के विरोधी के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने उस अद्वैतवाद के विरोध स्वरूप अपना अलग “वैष्णव पंथ” यानी “द्वैतवाद” के नाम से मार्ग स्थापित किया। इसी परंपरा में विष्णु नाम की जातक कथा की उत्पत्ति होती है और इसके बाद की परंपरा में विष्णु जैसी जातक कथा की भरमार है। उसके पूर्व किसी भी स्थल पर विष्णु की कोई मूर्ति का या नाम का अभिलेख नहीं मिलता है। यानी रामानुजाचार्य ही “विष्णु” के जन्मदाता हुए।
“तिरुपति मंदिर” के रूपान्तरण में इन्ही महोदय का हाथ है। आप लोग गौर से तिरुपति मंदिर की मूर्ति को देखें। उसके मुकुट के अंदर गौतम बुद्ध जैसा घुंगराले केश देखेंगे, कान की बनावट कंधार शैली जैसी लंबी दिखेगी, बाकी नाक, मुँह को तो आप देख ही सकते है।
इस मंदिर की स्थापना 9वीं शताब्दी में दक्षिण के “संगम” काल की है। संगम काल का अर्थ तमिल में “संघ का काल” से जाना जाता है। इस काल में चौल, होयसल, पल्लव के राजाओं ने बहुतसी बज्रायनी बुद्ध की मूर्तियाँ स्थापित कि थी। लेकिन 11वीं शताब्दी में जातक कथाओं के आधार पर इस मंदिर पर रामानुजाचार्य ने अपना आधिपत्य जमा लिया। 15वीं शताब्दी तक विजय नगर वंश के शासन के दौरान इस मंदिर की ख्याति नही बन पाई थी। इस मंदिर की प्रसिद्धि मुगल काल और अंग्रेजी काल में आकर बहुत ज्यादा बढ़ गयी, जो आज भी बरकरार है।
पूर्व काल में या आज भी बौद्ध मार्ग की दीक्षा लेने पर जिस प्रकार से सर मुंडन की परंपरा होती है, वैसे ही सर मुंडन की परंपरा इस मंदिर में आज तक चली आ रही है।
नोट :- भारत में 850 ईस्वी से पूर्व अनेको महान सम्राट हुए जिनका भव्य और विशाल सुंदर किले थे। लेकिन आज एक भी किला नहीं बचा है फिर आज के तथाकथित मूर्ख लेखक कैसे कहते है कि भारत में निर्मित सभी मंदिर 5000 वर्ष पूर्व से आगे की है ?
☸अत्त दीपो भव…अपना दीपक स्वयं बने☸