दारुल उलूम वक्फ़ के शेखुल हदीस हज़रत मौलाना असलम क़ासमी का इंतकाल

दारुल उलूम वक्फ़ के शेखुल हदीस हज़रत मौलाना असलम क़ासमी का इंतकाल

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Sadique Anwar
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( इनना लिल्लाहि व इनना इलैहि राजिऊन )

सहारनपुर में इस्लामी तालीम के दूसरे सबसे बड़े इदारे दारुल उलूम वक्फ के उस्ताद-ए-हदीस एवं मोहतमिम मौलाना सुफियान कासमी के चाचा मौलाना असलम कासमी का लंबी बीमारी के बाद सोमवार को इंतकाल हो गया।वह 80 वर्ष के थे।उनके इंतकाल से इस्लामिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
लंबे समय तक विश्वविख्यात इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम के मोहतमिम रहे स्व. कारी मोहम्मद तैय्यब के बेटे और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मौलाना सालिम कासमी के छोटे भाई मौलाना असलम कासमी पिछले पांच वर्षों से रीढ़ की हड्डी और सांस की बीमारी से परेशान थे। जिनका दिल्ली के एक हॉस्पिटल में उपचार चल रहा था। सोमवार की सुबह करीब 11.30 बजे उनका इंतकाल हो गया। उन्होंने अपने आवास पर ही अंतिम सांस ली। उनके इंतकाल की खबर मिलते ही इस्लामिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। देखते ही देखते दारुल उलूम, दारुल उलूम वक्फ समेत दूसरे दीनी इदारों के छात्र भारी संख्या में उनके आवास पर पहुंच गए। इसके अलावा दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी बनारसी, नायब मोहतमिम मौलाना अब्दुल खालिक मद्रासी, शेखुल हदीस मौलाना अहमद खिजर शाह मसूदी, मौलाना नसीम अख्तर शाह कैसर समेत बड़े उलमा उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे। मौलाना असलम कासमी ने दारुल उलूम से शिक्षा प्राप्त की। जिसके बाद वह वहीं पर नौकरी करने लगे। उन्हें नाजिम-ए-बरकियात (बिजली विभाग के प्रभारी) बनाया गया। वर्ष 1982 के बाद वह दारुल उलूम वक्फ में चले गए। जहां वह उस्ताद-ए-हदीस बनाए गए। बेहद सादा मिजाज और हर काम को गंभीरता से लेने वाले मौलाना असलम कासमी को सदर मुदर्रिस और शिक्षा विभाग के प्रभारी की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी। इस दौरान उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं। जबकि वह शायरी का शौक भी रखते थे। जो घर तक ही सीमित था। उनकी काबिलियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1980 में दारुल उलूम के शताब्दी समारोह का उन्हें प्रभारी बनाया गया था। जिसमें करीब 20 लाख लोगों ने शिरकत की थी। रात्रि करीब 8 बजे दारुल उलूम की आहत-ए-मोलसरी में उनकी नमाज-ए-जनाजा हुई। जिसके उपरांत उन्हें कासमी कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया। उनकी अंतिम यात्रा में मदरसा छात्रों समेत हजारों लोग शामिल रहे।