दूसरा रफ़ी हो ही नहीं सकता!

दूसरा रफ़ी हो ही नहीं सकता!

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Izhar Sayyed Arif – Lucknow (U.P) India
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नया दौर, कानून, गुमराह, वक़्त, हमराज़, दास्तान, आदमी और इंसान, इन्साफ का तराजू, तवायफ़, आज की आवाज़, धुंध, कल की आवाज़ और निकाह जैसे शानदार फ़िल्में बनाने वाले बी आर चोपड़ा को तो आप जानते होंगे . बहुत ही अच्छे फ़िल्मकार और एक बेहतर इंसान थे मगर जब आदमी सुख में डूबा हो तो स्वभाव में ज़िद तो आ ही जाती है . रफ़ी के सात नया दौर में उड़ें जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी, मांग के साथ तुम्हारा, साथी हाथ बढ़ाना, ये देश है वीर-जवानो का, आना है आ रह में कुछ देर नहीं है जैसे सुपर हिट गाने रफ़ी के साथ देने के बाद उन्होंने एक बार रफ़ी से कहा अब से तुम सिर्फ मेरे लिए गाओगे . रफ़ी साहब ने मुस्कराकर माफ़ी मांग ली और दूसरे लोगों का हवाला दिया जो रफ़ी को अपना मानते थे . चोपड़ा साहब नाराज़ हो गए और उन्होंने कहा मैं एक दूसरा रफ़ी तैयार करूँगा. ये बात सुनकर चोपड़ा साहब के परमानेंट संगीतकार “रवि” ( रवि शर्मा) को बहुत धक्का लगा क्योंकि वो रफ़ी के ज़बरदस्त फैन थे और उन्हें स्थापित संगीतकार बनाने में रफ़ी साहब की मेरहरबानियाँ भी बहुत थी. खैर नए गायक लिए गए महेंद्र कपूर जो खुद भी रफ़ी साहब के शिष्य और उनके बहुत बड़े फैन थे यहाँ तक के पहले रहते भी रफ़ी साहब के साथ ही थे. महेंद्र कपूर ने रवि को हमराज़, गुमराह जैसी फिल्मो के लिए बहुत शानदार गाने दिए मगर एक बार गाड़ी फस गयी फिल्म “वक़्त” के टाइटल सांग में. महेन्दर कपूर, रवि के मनमाफिक रिजल्ट दे ही नही पा रहे थे. ये बात उन्होंने बी आर चोपड़ा के छोटे भाई जो फिल्म को असिस्ट कर रहे थे यश चोपड़ा को को बताई तो यश ने कहा के भाई तो मान जायेंगे मगर रफ़ी साहब नहीं मानेंगे . रफ़ी साहब को मानाने का ज़िम्मा मिला खुद रवि को और उन्होंने रफ़ी को तैयार कर लिया और जो गाना कंपोज़ किया उसने वक़्त के सरे गानो के रिकॉर्ड तोड़ दिए. गाना था ” वक़्त से दिन और रात, वक़्त से कल और आज, वक़्त की हर शय गुलाम, वक़्त का हर शय पे राज”. खैर फिल्म दास्ताँ ( दिलीप कुमार, शर्मीला ) के आते आते बी आर चोपड़ा ने आखिर मान ही लिया के दूसरा रफ़ी हो ही नहीं सकता . उस फिल्म के गाने ” न तू ज़मी के लिए, है न आस्मां के लिए, तेरा वजूद है सिर्फ दास्ताँ के लिए .” .

दूसरी तरफ नए नए उभरते गायक ” किशोर कुमार” के पास जिन दिनों काम नहीं था तो वो काम मांगने बी आर चोपड़ा के पास गए . चोपड़ा साहब ने काम तो देने का वादा कर लिया मगर शर्तें बहुत ढेर सी लगा दी जिनसे किशोर कुमार खुश नहीं थे. उन्होंने शर्तें स्वीकार तो कर ली मगर कहा के चोपड़ा साहब मेरा भी दिन आएगा. बात सच साबित हुई और कालांतर में जब किशोर सफलता की सीढियाँ चढ़ते जा रहे थे तब एक बार बी आर चोपड़ा को उनकी ज़रुरत पड़ी . किशोर उस बात को भूले नहीं थे उन्होंने भारी फीस के साथ शर्तें भी रख दी . बी आर चोपड़ा को शर्तें माननी पड़ी . शर्तें क्या थी (!) चोपड़ा साहब जब भी सेट उनके सामने आएंगे ” धोती” पहनकर आएंगे” (२) उनके सामने छोड़ा जब भी आएंगे तो पान इस तरह चबाते हुए आएंगे जिसकी पीक के दोनों तरफ से बाहर बह रही हो. चोपड़ा साहब को ये शर्तें स्वीकार करनी पड़ी हालाँकि पान की पीक बहने का शानदार पिक्चराइज़ेशन उन्होंने अपनी फिल्म ” निकाह” में राजबब्बर के ऊपर फिल्माया जिसे लोग आज भी याद करते है .
‘बीते हुए लम्हों की क़सक साथ तो होगी, ख़ाबों ही में हो चाहे मुलाक़ात तो होगी,,,,,