मध्यपूर्व की महत्वपूर्ण घटनाएं_ज़रूर पढ़ें!

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फिलिस्तीन का प्रतिरोधक गुट हमास विभिन्न देशों विशेषकर ईरान के साथ संबंधों के विस्तार पर बल दे रहा है।

अभी हाल ही में हमास का एक उच्च प्रतिनिधिमंडल ईरानी अधिकारियों से भेंटवार्ता के उद्देश्य से तेहरान आया था। इसी प्रकार इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र के प्रमुख मसऊद बारेज़ानी ने जो बिना सोचे- समझे जनमत संग्रह करवाया था उसकी भी हम इस कार्यक्रम में समीक्षा करेंगे और अगर समय रहा तो सऊदी अरब की आर्थिक दशा और यमन में होने परिवर्तनों पर भी एक नज़र डालेंगे।

इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन हमास के विदेश संबंधों के ज़िम्मेदार ओसामा हमदान ने इस्लामी गणतंत्र ईरान के साथ संबंधों में विस्तार पर बल दिया है। ओसामा हमदान अभी हाल में ही एक उच्च प्रतिनिधिमंडल के साथ तेहरान की यात्रा पर आये थे। उन्होंने कहा था कि इस्लामी जगत, फिलिस्तीन मुद्दा और विश्व की वर्चस्ववादी शक्तियों के मुकाबले में प्रतिरोध जैसे विभिन्न स्ट्रैटेजिक विषयों के बारे में ईरान और हमास के मध्य मज़बूत संबंध हैं। जायोनी शासन से मुकाबला हमास की परिवर्तित न होने वाली नीति व सिद्धांत है। ओसामा हमदान ने ईरान से दूर रहने और उससे संबंध विच्छेद करने के बारे में अमेरिका और जायोनी शासन के दबाव के संदर्भ में बल देकर कहा कि यह कुछ देशों की इच्छा है कि हमास इस्लामी गणतंत्र ईरान से अलग हो जाये परंतु तेहरान में हमास के प्रतिनिधिमंडल की उपस्थिति का अर्थ यह है कि हमास कभी भी अपने मुखर और हमेशा समर्थन करने से वाले घटक ईरान से अलग नहीं होगा। इसी प्रकार हमास ने इस यात्रा में एक बार फिर बल देकर कहा कि प्रतिरोध के हथियारों के बारे में किसी प्रकार की वार्ता नहीं की जायेगी। हमास आंदोलन ने बल देकर कहा कि यह आंदोलन कभी भी निरस्त्र नहीं होगा, जायोनी शासन को मान्यता प्रदान नहीं करेगा और न ही इस्लामी गणतंत्र ईरान से संबंध विच्छेद करेगा।

फिलिस्तीनी अधिकारियों ने बारमबार बल देकर कहा है कि जिस तरह से इस्लामी गणतंत्र ईरान ने फिलिस्तीनी प्रतिरोध और अत्याचार से पीड़ित फिलिस्तीनी जनता का समर्थन किया है उस तरह से अब तक किसी भी अरब या इस्लामी देश ने नहीं किया है। इस्लामी गणतंत्र ईरान ने वर्ष 1979 में इस्लामी क्रांति की सफलता के आरंभ से अब तक फिलिस्तीन की आकांक्षा के समर्थन को अपनी विदेश नीति की प्राथमिकता घोषित कर रखी है। इस आधार पर ईरान फिलिस्तीन का सदैव समर्थन करता है और इस चीज को उसने अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं में करार दिया है और संविधान में भी शामिल कर रखा है।

ईरानी संविधान की धारा 154 में समस्त इंसानों के कल्याण की कामना की गयी है। इसी प्रकार संविधान की इस धारा में अतिग्रहण से आज़ादी प्राप्त करने और न्याय पर आधारित सरकार को विश्व के समस्त लोगों का अधिकार बताया गया है। इस आधार पर इस्लामी गणतंत्र ईरान दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में पूरी तरह हस्पक्षेप से परहेज़ के साथ वर्चस्ववादियों के मुकाबले में न्यायप्रेमी संघर्ष का समर्थन करता है। इस आधार पर इस्लामी गणतंत्र ईरान हर परिस्थिति में अत्याचारग्रस्त राष्ट्रों विशेषकर फिलिस्तीनी राष्ट्र का समर्थन करता है और यह जब तक ज़रूरी होगा तब तक यह समर्थन जारी रहेगा।

यमन में सऊदी अरब और उसके घटकों के जघन्य अपराध यथावत जारी हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ की मानवता प्रेमी सहायताओं के समन्वयकर्ता कार्यालय ने एक विज्ञप्ति जारी करके यमन पर सऊदी अरब के अतिक्रमण को विनाशकारी की संज्ञा दी और बल देकर कहा है कि सऊदी अरब के अपराधों के कारण यमनी बच्चों को विश्व में सबसे बड़े खाद्य संकट का सामना है और इसी प्रकार उनमें अभूतपूर्व ढंग से महामारी फैल रही है। सऊदी अरब ने यमन के त्यागपत्र दे चुके राष्ट्रपति मंसूर हादी को दोबारा सत्ता में लाने से बहाने से 26 मार्च 2015 से यमन पर हमला आरंभ कर रखा है जो अब तक जारी है। इस हमले के लिए उसने एक गठबंधन भी बना रखा है जिसमें संयुक्त अरब इमारात सहित कुछ अरब देश शामिल हैं। इसी प्रकार इस हमले में उसे अमेरिकी समर्थन प्राप्त है और उसने यमन का ज़मीनी, हवाई और समुद्री परिवेष्टन कर रखा है। सऊदी अरब के इस अतिक्रमण में अब तक 13 हज़ार से अधिक यमनी मारे जा चुके हैं जबकि दसियों हज़ार घायल और लाखों बेघर हो चुके हैं। इसी प्रकार सऊदी अरब के पाश्विक हमलों के कारण यमन की आधार भूत संरचनाएं तबाह हो चुकी हैं। यह एसी स्थिति में है जब यमन के निर्दोष लोगों को विस्तृत पैमाने पर सऊदी अरब और उसके घटकों विशेषकर संयुक्त अरब इमारात की अमानवीय और मानव अपहरण की कार्यवाहियों का सामना है जिस पर यमन में आपत्ति जताई गयी है।

यमन के दक्षिण में स्थित अदन में संयुक्त अरब इमारात की निगरानी वाली कुछ जेल हैं। इन जेलों में यमन के जिन लोगों को गिरफ्तार व अपहरण करके रखा गया है उनके सगे-संबंधियों ने इन जेलों के सामने एकत्रित होकर प्रदर्शन किया। गिरफ्तार होने वालों के सगे- संबंधियों ने संयुक्त अरब इमारात की निगरानी वाले जेलों के सामने प्रदर्शन करके बंद लोगों की तुरंत रिहाई और जेलों में दी जाने वाले यातनाओं को बंद करने की मांग की। इससे पहले एसोशिएटेड प्रेस और ह्यूमन राइट्स वाच ने यमन के दक्षिण में संयुक्त अरब इमारात की निगरानी में गुप्त जेलों के होने की सूचना दी थी। इस आधार पर सैकड़ों लोगों को यह दावा करके इन जेलों में बंद कर दिया गया कि उनका संबंध अलकायदा से है और जिन लोगों को इन जेलों में बंद किया गया उनमें से सैकड़ों को गायब भी कर दिया गया। इसी प्रकार पूछताछ के लिए इन जेलों के कुछ कैदियों को अमेरिकियों के हवाले किया जाता है जबकि कुछ को यमन से बाहर भी स्थानांतरित कर दिया जाता है।

अमेरिकी रक्षामंत्रालय पेन्टागोन ने स्वीकार किया है कि अमेरिकी पूछताछ करने वालों ने यमन के दक्षिण में स्थित अदन की जेलों में बंद कुछ कैदियों से पूछताछ की है। प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार यमन के दक्षिणी क्षेत्रों में कम से कम 18 जेल हैं जिन्हें संयुक्त अरब इमारात या यमन के उन सैनिकों ने बनाया है और उनकी निगरानी कर रहे हैं जिनका प्रशिक्षण अमेरिकी सैनिकों ने किया है। इन जेलों में बंद कैदियों का लगातार स्थानांतरण होता रहता है और कुछ को यमन से बाहर एरिट्रिया में स्थित संयुक्त अरब इमारात की एक छावनी में स्थानांतरित किया जाता है। यमन के परिवर्तन और सऊदी अरब की अगुवाई में संयुक्त अरब इमारात द्वारा यमन में किये जा रहे अपराध इस बात के सूचक हैं कि संयुक्त अरब इमारात दक्षिणी यमन को अपने वर्चस्व में लेने की चेष्टा में है। इस आधार पर संयुक्त अरब इमारात ने दक्षिणी यमन में अपनी एक छावनी भी बना दी है जिसमें संयुक्त अरब इमारात के अलावा कुछ यमनी अर्ध सैनिक भी रहते हैं। प्रतीत यह हो रहा है कि यमन में संयुक्त अरब इमारात जो कुछ कर रहा है उसका संबंध हर चीज़ से अधिक उसके वर्चस्वाद से है। इसी कारण संयुक्त अरब इमारात ने इससे पहले यमन के सुकुत्रो द्वीप के एक बहुत बड़े भाग पर कब्जा कर लिया है। दूसरी ओर सऊदी अरब संयुक्त राष्ट्रसंघ के माध्यम से यमन के एक स्ट्रैटेजिक बंदरगाह अलहदीदा पर कब्जा जमाने की कुचेष्टा में है। वास्तव में सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात की यमन में उपस्थिति दोनों में यमनी क्षेत्रों पर अपना- अपना वर्चस्व जमाने के लिए एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा आरंभ हो गयी है। यमन में सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात के मध्य जो प्रतिस्पर्धा चल रही है उसका लाभ अमेरिका भी उठा रहा है क्योंकि वह इस प्रतिस्पर्धा का प्रयोग वृहत्तर मध्यपूर्व की अपनी योजना को व्यवहारिक बनाने के लिए कर रहा है।

पिछले सप्ताह की एक अन्य महत्वपूर्ण घटना इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र में कराया जाने वाला जनमत संग्रह है। यह जनमत संग्रह इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र के प्रमुख मसऊद बारेज़ानी के आग्रह पर हुआ था और यह जनमत संग्रह क्षेत्रीय, अंतरराष्ट्रीय और स्वयं कुर्दिस्तान के भीतर होने वाले विरोधों के बावजूद गत 25 सितंबर को हुआ था। इस बीच कुर्दिस्तान के प्रमुख मसऊद बारेजानी के त्याग पत्र की मांग ज़ोर पकड़ गयी है। कुर्दिस्तान के जमाअते इस्लामी जैसे दलों ने मसऊद बारेज़ानी के त्याग पत्र की आवश्यकता पर बल दिया है। इस संबंध में जो विज्ञप्ति जारी की गयी उसमें कुर्दिस्तान क्षेत्र के प्रमुख से संबंधित समिति को भंग करने और संविधान के अनुसार उनसे संबंधित अधिकारों को दूसरे विभागों को सौंपे जाने की मांग की गयी है। इसी प्रकार इस विज्ञप्ति में बल देकर कहा गया है कि इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र की संसद को निर्णय लेने और कानून बनाने का अधिकार होना चाहिये और उसके द्वारा बनाये गये कानून से कोई उपर नहीं है।

इसी बीच कुर्दिस्तान पेट्रियाटिक युनियन पार्टी ने कुर्दिस्तान क्षेत्र के प्रमुख के पद को समाप्त करने की मांग की है। इसी मध्य डेमोक्रेटिक कुर्दिस्तान पार्टी ने घोषणा की है कि मसऊद बारेजाने का कार्यकाल पहली नवंबर को खत्म को रहा है। साथ ही उसने घोषणा की है कि उनके कार्यकाल की अवधि में वृद्धि स्वीकार्य नहीं है। बहरहाल कुर्दिस्तान के स्थानीय प्रशासन ने जनमत संग्रह के संबंध में उसके परिणामों को स्थगित करने का सुझाव दिया है पंरतु बगदाद सरकार ने इस सुझाव को रद्द कर दिया है और उसका मानना है कि जनमत संग्रह के परिणाम को स्थगित करने का अर्थ इराक से अलग होने के अधिकार को स्वीकार करना है। इस आधार पर बगदाद सरकार जनमत संग्रह के परिणामों को निरस्त किये जाने और वार्ता द्वारा समस्त समस्याओं के समाधान पर बल देती है।

पिछले सप्ताह का एक महत्वपूर्ण परिवर्तन सऊदी अरब का आर्थिक संकट है और इस विषय की वजह से पहले से अधिक आम जनमत का ध्यान इस वास्तविकता की ओर गया है कि सऊदी अरब की अर्थ व्यवस्था दिवालिया होने की कगार पर है। इस संबंध में संचार माध्यमों ने इस बात की सूचना दी है कि सऊदी अरब को 200 अरब डालर के बजट घाटे का सामना है। राजनीतिक और आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब की नीतियों के कारण तेल की कीमतें हुई हैं और सऊदी अरब ने सीरिया और इराक के आंतरिक मामलों में जो हस्तक्षेप किया और इसी प्रकार उसने जो यमन पर पाश्विक हमला आरंभ किया है और इसी प्रकार सऊदी युवराजों व अधिकारियों के जो आर्थिक भ्रष्टाचार हैं वे सऊदी अरब की आमदनी के कम होने और बजट घाटे में कमी के महत्वपूर्ण कारण हैं।

तेल के मूल्यों को कम करने में अमेरिका की जो नीति रही है उससे प्रभावित होकर सऊदी अरब ने तेल के मूल्यों को कम कर दिया पंरतु व्यवहारिक रूप से वह स्वयं अपनी अर्थ व्यवस्था पर उसके नकारात्मक परिणामों की मार झेल रहा है। तेल के मूल्यों में कमी का प्रभाव यद्यपि तेल निर्यातक कुछ देशों की अर्थ व्यवस्था पर अस्थाई रूप से पड़ा है परंतु यह सऊदी अरब है जिसकी अर्थ व्यवस्था का आधार व स्रोत ही तेल है और तेल के बाज़ार में सबसे अधिक क्षति उसी को पहुंची है। सऊदी अरब में होने वाले आर्थिक परिवर्तिन इस बात के सूचक हैं कि आर्थिक क्षेत्र में भी आले सऊद के क्रिया-कलाप सफल नहीं रहे हैं। सऊदी अरब की जो विषम आर्थिक देशों है उसने सऊदी नरेश को सश्रम आर्थिक नीति की घोषणा पर बाध्य कर दिया। इस प्रकार की विषम आर्थिक परिस्थिति में सऊदी अरब तेल से जो अरबों डालर कमाता है वह भी इस देश के आधार भूत क्षेत्रों में खर्च नहीं किया जाता है बल्कि वह तामझाम और ग़ैर ज़रूरी चीज़ों पर खर्च किया जाता है। इस आधार पर सऊदी अरब की अर्थ व्यवस्था जिसका संचालन आले सऊद कर रहा है, दिन- प्रतिदिन विषम रूप धारण करती जा रही है और उसका परिणाम सऊदी अरब की अर्थ व्यवस्था के दिवालिया हो जाने के अतिरिक्त कुछ और नहीं होगा।