मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत_पार्ट 7_ जायसी का रहस्यवाद

मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत_पार्ट 7_ जायसी का रहस्यवाद

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जायसी का रहस्यवाद///\\\

सूफियों के अद्वैतवाद का जो विचार पूर्वप्रकरण में हुआ था उससे यह स्पष्ट हो गया कि किस प्रकार आर्य जाति (भारतीय और यूनानी) के तत्त्वचिंतकों द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्त को सामी पैगम्बरी मतों में रहस्यभावना के भीतर स्थान मिला। उक्त मतों (यहूदी, ईसाई, इसलाम) के बीच तत्त्वचिंतन की पद्धति या ज्ञानकाण्ड का स्थान न होने के कारण-मनुष्य की स्वाभाविक बुद्धि या अक्ल का दखल न होने के कारण- अद्वैतवाद का ग्रहण रहस्यवाद के रूप में ही हो सकता था। इस रूप में पड़कर वह धार्मिक विश्वास में बाधक नहीं समझा गया। भारतवर्ष में तो यह ज्ञानक्षेत्र से निकला और अधिकतर ज्ञानक्षेत्र में ही रहा; पर अरब, फारस आदि में जाकर यह भावक्षेत्र के बीच मनोहर रहस्यभावना के रूप में फैला।

योरप में भी प्राचीन यूनानी दार्शनिकों द्वारा प्रतिष्ठित अद्वैतवाद ईसाई मजहब के भीतर रहस्यभावना के ही रूप में लिया गया। रहस्योन्मुख सूफियों और पुराने कैथलिक ईसाई भक्तों की साधना समान रूप से माधुर्य भाव की और प्रवृत्त रही। जिस प्रकार सूफी ईश्वर की भावना प्रियतम के रूप में करते थे उसी प्रकार स्पेन, इटली आदि योरोपीय प्रदेशों के भक्त भी। जिस प्रकार सूफी ‘हाल’ की दशा में उस माशूक से भीतर-ही-भीतर मिला करते थे उसी प्रकार पुराने ईसाई भक्त साधक भी दुलहनें बनकर उस दूल्हे से मिलने के लिए अपने अन्तर्देश में कई खण्डों के रंगमहल तैयार किया करते थे। ईश्वर की पति रूप में उपासना करनेवाली सैफो, सेंट टेरेसा आदि कई भक्तिनें भी योरप में हुई हैं।

अद्वैतवाद के दो पक्ष हैं -आत्मा और परमात्मा की एकता तथा ब्रह्म और जगत् की एकता। दोनों मिलकर सर्ववाद की प्रतिष्ठा करते हैं -सर्वं खल्विदं ब्रह्म। यद्यपि साधना के क्षेत्र में सूफियों और पुराने ईसाई भक्तों, दोनों की दृष्टि प्रथम पक्ष पर ही दिखाई देती है। पर भावक्षेत्र में जाकर सूफी प्रकृति की नाना विभूतियों से भी उसकी छवि का अनुभव करते आए हैं।

ईसाई की 19वीं शताब्दी में रहस्यात्मक कविता का जो पुनरुत्थान योरप के कई प्रदेशों में हुआ उसमें सर्ववाद (पैनथेइज्म) का-ब्रह्म और जगत् की एकता का भी बहुत कुछ आभास रहा। वहाँ इसकी ओर प्रवृत्ति-स्वातन्त्रय और लोकसत्तात्मक भावों के प्रचार के साथ-ही-साथ दिखाई पड़ने लगी। स्वातन्त्रय के बड़े भारी उपासक अँगरेज, कवि शेली में इस प्रकार के सर्ववाद की झलक पाई जाती है। आयर्लैंड में स्वतन्त्रता की भीषण पुकार के बीच ईट्स की रहस्यमयी कविवाणी भी सुनाई देती रही है। ठीक समय पर पहुँचकर हमारे यहाँ के कवीन्द्र रवीन्द्र भी वहाँ के सुर में सुर मिला आए थे। पश्चिम के समालोचकों की समझ में वहाँ के इस काव्यगत सर्ववाद का सम्‍बन्‍ध लोकसत्तात्मक भावों के साथ है। इन भावों के प्रचार के साथ ही स्थूल गोचर पदार्थों के स्थान पर सूक्ष्म अगोचर भावना (ऐब्स्ट्रैक्शन्स) की प्रवृत्ति हुई और वही काव्यक्षेत्र में जाकर भड़कीली और अस्फुट भावनाओं तथा चित्रों के विधान के रूप में प्रकट हुई। 1

अद्वैतवाद मूल में एक दार्शनिक सिद्धान्त है, कविकल्पना या भावना नहीं है। वह मनुष्य के बुद्धिप्रयास या तत्त्वचिंतन का फल है। वह ज्ञानक्षेत्र की वस्तु है। जब उसका आधार लेकर कल्पना या भावना उठ खड़ी होती है अर्थात् जब उसका संचार भावक्षेत्र में होता है तब उच्च कोटि के भावात्मक रहस्यवाद की प्रतिष्ठा होती है। रहस्यवाद दो प्रकार का होता है-भावात्मक और साधनात्मक। हमारे यहाँ का योगमार्ग साधनात्मक रहस्यवाद है। यह अनेक अप्राकृतिक और जटिल अभ्यासों द्वारा मन को अव्यक्त तथ्यों का साक्षात्कार कराने तथा साधक को अनेक अलौकिक सिद्धियाँ

1. द पैशन फार इनटेलेक्चुअल ऐब्सट्रैक्शन्स, ह्नेन ट्रांसफर्ड टु द लिटरेचर आव इमैजिनेशन, विकम्स ए पैशन फार ह्नाट इज ग्रैंडियोज ऐण्ड वेग इन सेंटिमेंट ऐंड इन इमैजरी। ….द ग्रेट लारिएट आव यूरोपियन डिमाक्रेसी, विक्टर ह्यूगो, एग्जिबिट्स ऐटविन्स द डिमाक्रैटिक लव आव ऐब्स्ट्रैक्ट आइडियाज, द डिमाक्रैटिक डिलाइट इन ह्नाट इज ग्रैंडियोज (ऐज वेल ऐज ह्नाट इज ग्रैंड) इन सेंटिमेंट, ऐंड द डिमाक्रैटिक टेंडेंसी टुवड्र्स ए पोएटिकल पैनथेइज्म।

-डाउडेंस ‘न्यू स्टडीज इन लिटरेचर’ (इंट्रोडक्शन)

प्राप्त कराने की आशा देता है। तन्त्र और रसायन भी साधनात्मक रहस्यवाद हैं, पर निम्न कोटि के। भावात्मक रहस्यवाद की भी कई श्रेणियाँ हैं जैसे, भूत प्रेत की सत्ता मानकर चलनेवाली भावना, परम सत्ता के रूप में एक ईश्वर की सत्ता मानकर चलनेवाली भावना स्थूल रहस्यवाद के अन्तर्गत होगी। अद्वैतवाद या ब्रह्मवाद को लेकर चलनेवाली भावना से सूक्ष्म और उच्च कोटि के रहस्यवाद की प्रतिष्ठा होती है। तात्पर्य यह कि रहस्यभावना किसी विश्वास के आधार पर चलती है, विश्वास करने के लिए कोई नया तथ्य या सिद्धान्त नहीं उपस्थित कर सकती। किसी नवीन ज्ञान का उदय उसके द्वारा नहीं हो सकता। जिस कोटि का ज्ञान या विश्वास होगा उसी कोटि की उससे उद्भूत रहस्यभावना होगी।

अद्वैतवाद का प्रतिपादन सबसे पहले उपनिषदों में मिलता है। उपनिषद् भारतीय ज्ञानकाण्ड के मूल हैं। प्राचीन ऋषि तत्त्वचिन्तन द्वारा ही अद्वैतवाद के सिद्धान्त पर पहुँचे थे। उनमें इस ज्ञान का उदय बुद्धि की स्वाभाविक क्रिया द्वारा हुआ था, प्रेमोन्माद या बेहोशी की दशा में सहसा एक दिव्य आभास या इलहाम के रूप में नहीं। विविध धार्मों का इतिहास लिखनेवाले कुछ पाश्चात्य लेखकों ने उपनिषदों के ज्ञान को जो रहस्यवाद की कोटि में रखा है, वह उनका भ्रम या दृष्टिसंकोच हैं। बात यह है कि उस प्राचीन काल में दार्शनिक विवेचन को व्यक्त करने की व्यवस्थित शैली नहीं निकली थी। जगत् और उसके मूल कारण का चिन्तन करते करते जिस तथ्य तक वे पहुँचते थे उसकी व्यंजना अनेक प्रकार से वे करते थे। जैसे आजकल किसी गम्भीर विचारात्मक लेख के भीतर कोई मार्मिक स्थल आ जाने पर लेखक की मनोवृत्ति भावोन्मुख हो जाती है और वह काव्य की भावात्मक शैली का अवलम्बन करता है। उसी प्रकार उन प्राचीन ऋषियों को भी विचार करते करते गम्भीर मार्मिक तथ्य पर पहुँचने पर कभी कभी भावोन्मेष हो जाता था और वे अपनी उक्ति का प्रकाश रहस्यात्मक और अनूठे ढंग से कर देते थे।

गीता के दसवें अध्‍याय में सर्ववाद का भावात्मक प्रणाली पर निरूपण है। वहाँ भगवान् ने अपनी विभूतियों का जो वर्णन किया है वह अत्यन्त रहस्यपूर्ण है। सर्ववाद को लेकर जब भक्त की मनोवृत्ति रहस्योन्मुख होगी तब वह अपने को जगत् के नाना रूपों के सहारे उस परोक्ष सत्ता की ओर ले जाता हुआ जान पड़ेगा। वह खिले हुए फूलों में, शिशु के स्मित आनन में, सुन्दर मेघमाला में, निखरे हुए चन्द्रबिम्ब में उसके सौन्दर्य का, गम्भीर मेघगर्जन में, बिजली की कड़क में, वज्रपात में, भूकम्प आदि प्राकृतिक विप्लवों में उसकी रौद्र मूर्ति का, संसार के असामान्य वीरों, परोपकारियों और त्यागियों में उसकी शक्ति, शील आदि का साक्षात्कार करता है। इस प्रकार अवतारवाद का मूल भी रहस्यभावना ही ठहरती है।

पर अवतारवाद के सिद्धान्त रूप में गृहीत हो जाने पर राम और कृष्ण के व्यक्त ईश्वर विष्णु के अवतार स्थिर हो जाने पर रहस्यदशा की एक प्रकार से समाप्ति हो गई। फिर राम और कृष्ण का ईश्वर के रूप में ग्रहण व्यक्तिगत रहस्यभावना के रूप में नहीं रह गया। वह समस्त जनसमाज के धार्मिक विश्वास का एक अंग हो गया, इस व्यक्त जगत् के बीच प्रकाशित राम कृष्ण की नरलीला भक्तों के भावोद्रेक का विषय हुई। अत: रामकृष्णोपासकों की भक्ति रहस्यवाद की कोटि में नहीं आ सकती।

यद्यपि समष्टि रूप में वैष्णवों की सगुणोपासना रहस्यवाद के अन्तर्गत नहीं कही जा सकती, पर श्रीमद्भागवत के उपरान्त कृष्णभक्ति को जो रूप प्राप्त हुआ उसमें रहस्यभावना की गुंजाइश हुई। भक्तों की दृष्टि से जब धीरे-धीरे श्रीकृष्ण का लोकसंग्रही रूप हटने लगा और वे प्रेममूर्तिमात्र रह गए तब उनकी भावना ऐकांतिक हो चली। भक्त लोग भगवान् को अधिकतर अपने सम्‍बन्‍ध से देखने लगे, जगत् के सम्‍बन्‍ध से नहीं। गोपियों का प्रेम जिस प्रकार एकांत और रूपमाधुर्यमात्र पर आश्रित था, उसी प्रकार भक्तों का भी हो चला। यहाँ तक कि कुछ स्‍त्री भक्तों में भगवान् के प्रति उसी रूप का प्रेमभाव स्थान पाने लगा जिस रूप का गोपियों का कहा गया था। उन्होंने भगवान् की भावना प्रियतम के रूप में की। बड़े बड़े मंदिरों में देवदासियों की जो प्रथा थी उससे इस ‘माधुर्यभाव’ को और भी सहारा मिला। मातापिता कुमारी लड़कियों को मंदिर में दान कर आते थे, जहाँ उनका विवाह देवता के साथ हो जाता था। अत: उनके लिए उस देवता की भक्ति पतिरूप में ही विधेय थी। इन देवदासियों में से कुछ उच्च कोटि की भक्तिनें भी निकल आती थीं। दक्षिण में अंदाल इसी प्रकार की भक्तिन थी जिसका जन्म विक्रम संवत् 773 के आस पास हुआ था। वह बहुत छोटी अवस्था में किसी साधु को एक पेड़ के नीचे मिली थी। वह साधु भगवान् का स्वप्न पाकर, इसे विवाह के वस्त्र पहनाकर श्रीरंगजी के मंदिर में छोड़ आया था।

अंदाल के पद द्रविड़ भाषा में ‘तिरुप्पावइ’ नामक पुस्तक में अब तक मिलते हैं। अंदाल एक स्थान पर कहती है-‘अब मैं पूर्ण यौवन को प्राप्त हूँ और स्वामी कृष्ण के अतिरिक्त और किसी को अपना पति नहीं बना सकती।’ पति या प्रियतम के रूप में भगवान् की भावना को वैष्णव भक्तिमार्ग में ‘माधुर्य भाव’ कहते हैं। इस भाव की उपासना में रहस्य का समावेश अनिवार्य और स्वाभाविक है। भारतीय भक्ति का सामान्य स्वरूप रहस्यात्मक न होने के कारण इस ‘माधुर्य भाव’ का अधिक प्रचार नहीं हुआ। आगे चलकर मुसलमानी जमाने में सूफियों की देखादेखी इस भाव की ओर कृष्णभक्ति शाखा के कुछ भक्त प्रवृत्त हुए। इनमें मुख्य मीराबाई हुई जो ‘लोकलाज खोकर’ अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के प्रेम में मतवाली रहा करती थीं। उन्होंने एक बार कहा था कि ‘कृष्ण को छोड़ और पुरुष है कौन? सारे जीव स्‍त्रीरूप हैं।’

सूफियों का असर कुछ और कृष्णभक्तों पर भी पूरा-पूरा पाया जाता है। चैतन्य महाप्रभु में सूफियों की प्रवृत्तियाँ साफ झलकती हैं। जैसे सूफी कव्वाल गाते-गाते हाल की दशा में हो जाते हैं वैसे ही महाप्रभुजी की मण्डली भी नाचते-नाचते मूर्च्छित हो जाती थी। यह मूर्च्‍छा रहस्यवादी सूफियों की रूढ़ि है। इसी प्रकार मद, प्याला, उन्माद तथा प्रियतम ईश्वर के विरह की दुरारूढ़ व्यंजना भी सूफियों की बँधी हुई परम्परा है। इस परम्परा का अनुसरण भी कुछ पिछले कृष्णभक्तों ने किया। नागरीदासजी इश्क का प्याला पीकर बराबर झूमा करते थे। कृष्ण की मधुर मूर्ति ने कुछ आजाद सूफी फकीरों को भी आकर्षित किया। नजीर अकबरावादी ने खड़ी बोली के अपने बहुत से पद्यों में श्रीकृष्ण का स्मरण प्रेमालम्बन के रूप में किया है।

निर्गुण शाखा के कबीर, दादू आदि सन्तों की परम्परा में ज्ञान का जो थोड़ा बहुत अवयव है वह भारतीय वेदान्त का है-पर प्रेमतत्त्व बिलकुल सूफियों का है। इनमें से दादू, दरियासाहब आदि तो खालिस सूफी ही जान पड़ते हैं। कबीर में ‘माधुर्य भाव’ जगह जगह पाया जाता है। वे कहते हैं –

हरि मोर पिय मैं राम की बहुरिया।

‘राम की बहुरिया’ कभी तो प्रिय से मिलने की उत्कंठा और मार्ग की कठिनता प्रकट करती है जैसे-

मिलना कठिन है, कैसे मिलौंगी पिय जाय?

समुझि सोचि पग धारौं जतन से, बार बार डगि जाय।

ऊँची गैल, राह रपटीली, पाँव नहीं ठहराय।

और कभी विरहदु:ख निवेदन करती है।

पहले कहा जा चुका है कि भारतवर्ष में साधनात्मक रहस्यवाद ही हठयोग, तन्‍त्र और रसायन के रूप में प्रचलित था। जिस समय सूफी यहाँ आए उस समय उन्हें रहस्य की प्रवृत्ति हठयोगियों, रसायनियों और तान्त्रिकों में ही दिखाई पड़ी। हठयोग की तो अधिकांश बातों का समावेश उन्होंने अपनी साधनापद्धति में कर लिया। पीछे कबीर ने भारतीय ब्रह्मवाद और सूफियों की प्रेमभावना को मिलाकर जो ‘निर्गुण संत मत’ खड़ा किया, उसमें भी ‘इला, पिंगला, सुषम्ना नाड़ी’ तथा भीतरी चक्रों की पूरी चर्चा रही। हठयोगियों वा नाथपंथियों को दो मुख्य बातें सूफियों और निर्गुण मत वाले सन्तों को अपने अनुकूल दिखाई पड़ी। -(1) रहस्य की प्रवृत्ति, (2) ईश्वर को केवल मन के भीतर समझना और ढूँढ़ना।

कहने की आवश्यकता नहीं कि ये दोनों बातें भारतीय भक्तिमार्ग से पूरा मेल खानेवाली नहीं थीं। अवतारवाद के सिद्धान्त रूप से प्रतिष्ठित हो जाने के कारण भारतीय परम्परा का भक्त अपने उपास्य को बाहर लोक के बीच प्रतिष्ठित करके देखता है, अपने हृदय के एकान्त कोने में ही नहीं। पर फारस में भावात्मक अद्वैती रहस्यवाद खूब फैला। वहाँ की शायरी पर इसका रंग बहुत गहरा चढ़ा। खलीफा लोगों के कठोर धर्मशासन के बीच भी सूफियों की प्रेममयी वाणी ने जनता को भावमग्न कर दिया।

इसलाम के प्रारंभिक काल में ही भारत का सिन्ध प्रदेश ऐसे सूफियों का अड्डा रहा जो यहाँ वेदांतियों और साधेकों के सत्संग से अपने मार्ग की पुष्टि करते रहे। अत: मुसलमानों का साम्राज्य स्थापित हो जाने पर हिन्दुओं और मुसलमानों के समागम से दोनों के लिए जो एक ‘सामान्य भक्तिमार्ग’ आविर्भूत हुआ वह अद्वैती रहस्यवाद को लेकर, जिसमें वेदांत और सूफी मत दोनों का मेल था। पहले पहल नामदेव ने, फिर रामानन्द के शिष्य कबीर ने जनता के बीच इस ‘सामान्य भक्तिमार्ग’ की अटपटी वाणी सुनाई। नानक, दादू आदि कई साधक इस नए मार्ग के अनुयायी हुए, और ‘निर्गुण संत मत’ चल पड़ा। पर इधर यह निर्गुण भक्तिमार्ग निकला उधर भारत के प्राचीन ‘सगुण मार्ग’ ने भी, जो पहले से चला आ रहा था, जोर पकड़ा और राम कृष्ण की भक्ति का òोत बड़े वेग से हिन्दू जनता के बीच बहा। दोनों की प्रवृत्ति में बड़ा अन्तर यह दिखाई पड़ा कि एक तो लोकपक्ष से उदासीन होकर केवल व्यक्तिगत साधना का उपदेश देता रहा पर दूसरा अपने प्राचीन स्वरूप के अनुसार लोकपक्ष को लिए रहा। ‘निर्गुन बानी’ वाले संतों के लोकविरोधी स्वरूप की गोस्वामी तुलसीदासजी ने अच्छी तरह पहचाना था।

जैसा कि अभी कहा जा चुका है, रहस्यवाद का स्फुरण सूफियों में पूरा पूरा हुआ। कबीरदास में जो रहस्यवाद पाया जाता है वह अधिकतर सूफियों के प्रभाव के कारण। पर कबीरदास पर इस्लाम मे कट्टर एकेश्वरवाद और वेदांत के मायावाद का रूखा संस्कार भी पूरा पूरा था। उनमें वाक्चातुर्य था, प्रतिभा थी, पर प्रकृति के प्रसार में भगवान् की कला का दर्शन करनेवाली भावुकता न थी। इससे रहस्यमयी परोक्ष सत्ता की ओर संकेत करने के लिए जिन दृश्यों को वे सामने करते हैं वे अधिकतर वेदांत और हठयोग की बातों के खड़े किए हुए रूपक मात्र होते हैं। अत: कबीर में जो कुछ रहस्यवाद है वह सर्वत्र एक भावुक या कवि का रहस्यवाद नहीं है। हिन्दी के कवियों में यदि कहीं रमणीय और सुन्दर अद्वितीय रहस्यवाद है तो जायसी में, जिनकी भावुकता बहुत ही ऊँची कोटि की है। वे सूफियों की भक्तिभावना के अनुसार कहीं तो परमात्मा को प्रियतम के रूप में देखकर जगत् के नाना रूपों में उस प्रियतम के रूपमाधुर्य की छाया देखते हैं और कहीं सारे प्राकृतिक रूपों और व्यापारों का ‘पुरुष’ के समागम के हेतु प्रकृति के श्रृंगार, उत्कण्ठा या विरहविकलता के रूप में अनुभव करते हैं। दूसरे प्रकार की भावना पदमावत में अधिक मिलती है।

आरम्भ में कह आए हैं कि ‘पदमावत’ के ढंग के रहस्यवादपूर्ण प्रबन्धों की परम्परा जायसी से पहले की है। मृगावती, मधुमालती आदि की रचना जायसी के पहले हो चुकी थी और उनके पीछे भी ऐसे रचनाओं की परम्परा चली। सबमें रहस्यवाद मौजूद है। अत: हिन्दी के पुराने साहित्य में ‘रहस्यवादी कविसम्प्रदाय’ यदि कोई कहा जा सकता है तो इन कहानी कहनेवाले मुसलमान कवियों को ही।

जायसी कवि थे और भारतवर्ष के कवि थे। भारतीय पद्धति के कवियों की दृष्टि फारसवालों की अपेक्षा प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों पर कहीं अधिक विस्तृत तथा उनके मर्मस्पर्शी स्वरूपों को कहीं अधिक परखनेवाली होती है। इससे उस रहम्यमयी सत्ता का आभास देने के लिए जायसी बहुत ही रमणीय और मर्मस्पर्शी दृश्यसंकेत उपस्थित करने में समर्थ हुए हैं। कबीर के चित्रों (इमैजरी) में न वह अनेकरूपता है, न वह मधुरता। देखिए, उस परोक्ष ज्योति और सौन्दर्यसत्ता की ओर कैसी लौकिक दीप्ति और सौन्दर्य के द्वारा जायसी संकेत करते है। –

बहुतै जोति जोति ओहि भई।

रवि ससि, नखत दिपहिं ओहि जोती । रतन पदारथ मानिक मोती॥
जहँ जहँ बिहँसि सुभावहिं हँसी । तहँ तहँ छिटकि जोति परगसी॥
नयन जो देखा कँवल भा, निरमल नीर सरीर।
हँसत जो देखा हंस भा, दसनजोति नग हीर॥
प्रकृति के बीच दिखाई देनेवाली सारी दीप्ति उसी से है, इस बात का आभास पद्मावती के प्रति रत्नसेन के ये वाक्य दे रहे है। –

अनु धनि! तू निसिअर निसि माहाँ । हौं दिनिअर जेहि कै तू छाहाँ॥
चाँदहिं कहाँ जोति औ करा । सुरुज के जोति चाँद निरमरा॥
अँगरेज कवि शेली की पिछली रचनाओं में इस प्रकार के रहस्यवाद की झलक बड़ी सुन्दर दृश्यावली के बीच दिखाई देती है। स्‍त्रीत्व का आध्‍यात्मिक आदर्श उपस्थित करनेवाले (ऐपीसाइकीडियन) में प्रिया की मधुर वाणी प्रकृति के क्षेत्र में कहाँ कहाँ सुनाई पड़ती है-

इन सालीटयूड्स,

हर वायस केम टु मी थ्रू द ह्निस्परिंग उड्स,

ऐंड फ्राम द फाउण्टेंस, ऐंड दि ओडर्स डीप

आव फ्लावर्स ह्निच, लाइक लिप्स मरमरिंग इन देयर स्लीप

आव द स्वीट किसेज ह्निच हैड लल्ड देम देयर,

ब्रीद्ड बट आव हर टु दि इनैमर्ड ऐअर;

ऐंड फ्राम द ब्रीजेज, ह्नेदर लो आर लाउड,

ऐंड फ्राम द रेन आव एव्री पासिंग क्लाउड,

ऐंड फ्राम द सिंगिंग आव द समर बड्र्स,

ऐंड फ्राम आल साउंड्स आल साइलेंस।

भावार्थ -निर्जन स्थानों के बीच मर्मर करते हुए काननों में, झरनों में, उन पुष्पों की परागगन्धा में जो उस दिव्य चुम्बन के सुखस्पर्श से सोए हुए कुछ बर्राते से मुग्‍ध पवन को उसका परिचय दे रहे हैं; इसी प्रकार मंद या तीव्र समीर में, प्रत्येक दौड़ते हुए मेघखण्ड की झण्ड़ी में, वसंत के विहंगमों के कलकूजन में तथा प्रत्येक ध्‍वनि में और नि:स्तब्धता में भी वाणी सुनता हूँ।

कबीरदास में यह बात नहीं है। उन्हें बाहर जगत् में भगवान् की रूपकला नहीं दिखाई देती। वे सिद्धों और योगियों के अनुकरण पर ईश्वर को केवल अन्तस् में बताते हैं –

मो को कहाँ ढूँढ़ै बंदे मैं तो तेरे पास में।
ना मैं देवल ना मैं मसजिद ; ना काबे कैलास में॥
जायसी भी उसे भीतर बताते हैं –

पिउ हिरदय महँ भेंट न होई । को रे मिलाव, कहौं केहि रोइ!

पर, जैसा कि पहले दिखा चुके हैं, वे उसके रूप की छटा प्रकृति के नाना रूपों में भी देखते हैं।

मानस के भीतर उस प्रियतम के सामीप्य से उत्पन्न कैसे अपरिमित आनन्द की, कैसे विश्वव्यापी आनन्द की, व्यंजना जायसी की इन पंक्तियों में है-

देखि मानसर रूप सोहावा । हिय हुलास पुरइनि होइ छावा॥
गा अँधियार रैनि मसिछूटी । भा भिनसार किरिन रवि फूटी॥
कँवल बिगस तत बिहँसी देही । भँवर दसन होइ कै रस लेहीं॥
देखि अर्थात् उस अखण्ड ज्योति का आभास पाकर वह मानसर (मानसरोवर और हृदय) जगमगा उठा। देखिए न, खिले कमल के रूप में उल्लास मानसर में चारों ओर फैला है। उस ज्योति के साक्षात्कार से अज्ञान छूट गया-प्रभात हुआ, पृथ्वी पर से अन्धकार हट गया। आनन्द से चेहरा (देही, बदन, मुँह) खिल उठा, बत्तीसी निकल आई1-कमल खिल उठे और उन पर भौंरे दिखाई दे रहे हैं। अन्तर्जगत् और बाह्यजगत् का कैसा अपूर्व सामंजस्य है, कैसी बिम्बप्रतिबिम्ब स्थिति है!

उस प्रियतम पुरुष के प्रेम से प्रकृति कैसी बिद्ध दिखाई देती है-

उन्ह बानन्ह अस को जो न मार ? बेधि रहा सगरौ संसारा॥
गगन नखत जो जाहि न गने । वै सब बान ओहि के हने॥
धरती बान बेधि सब राखी । साखी ठाढ़ देहिं सब साखी॥
रोवँ रोवँ मानुष तन ठाढ़े । सूतहि सूत बेध अस गाढ़े॥
बरुनि चाप अस ओपहँ, बेधो रन बन ढाँख।
सौजहि तन सब रोवाँ, पंखिहि तन सब पाँख॥
पृथ्वी और स्वर्ग, जीव और ईश्वर, दोनों एक थे, बीच में न जाने किसने इतना भेद डाल दिया है-

धरती सरग मिले हुत दोऊ। केइ निनार कै दीन्ह बिछोऊ।

जो इस पृथ्वी और स्वर्ग के वियोगत्व को समझेगा और उस वियोग में पूर्णरूप

1. एक स्थान पर जायसी ने कहा है-‘मसि बिनु दसन सोह नहिं देहीं।’ लखनऊ में मर्द लोग भी मिस्सी से दाँत काले करते हैं। पान के रंग से भी दाँतों पर स्याही चढ़ जाती है।

से सम्मिलित होगा उसी को वियोग सारी सृष्टि में इस प्रकार फैला दिखाई देगा-

सूरुज बूड़ि उठा होइ ताता । औ मजीठ टेसू बन राता॥
भा बसंत, रातीं बनसपती । औ राते सब जोगी जती॥
पुहुमि जो भीजि भएउ सब गेरू । औ राते सब पंखि पखेरू॥
राती सती, अगिनि सब काया । गगन मेघ राते तेहि छाया॥
सायं प्रभात न जाने कितने लोग मेघखण्डों को रक्तवर्ण होते देखते हैं पर किस अनुराग से वे लाल हैं इसे जायसी जैसे रहस्यदर्शी भावुक ही समझते हैं।

प्रकृति के सारे महाभूत उस ‘अमरधाम’ तक पहुँचने का बराबर प्रयत्न करते रहते हैं पर साधना पूरी हुए बिना पहुँचना असम्भव है-

धाइ जो बाजा कै मन साधा । मारा चक्र, भएउ दुइ आधा ॥
चाँद सुरुज औ नखत तराईं । तेहि डर अँतरिख फिरहिं सबाईं॥
पवन जाइ तहँ पहुँचै चहा । मारा तैस लोटि भुइँ रहा॥
अगिनि उठी, जरि बुझी निआना । धुँआ उठा, उठि बीच बिलाना॥
पानि उठा, उठि जाइ न छूआ । 1 बहुरा रोइ, आइ भुइ चूआ॥
इस अद्वैती रहस्यवाद के अतिरिक्त जायसी कहीं कहीं उस रहस्यवाद में आ फँसे हैं जो पाश्चात्यों की दृष्टि में ‘झूठा रहस्यवाद’ है। उन्होंने स्थान स्थान पर हठयोग, रसायन आदि का भी आश्रय लिया है।

सूक्तियाँ

सूक्तियों से मेरा अभिप्राय वैचित्रयपूर्ण उक्तियों से है जिनमें वाक्चातुर्य ही प्रधान होता है। कोई बात यदि नए अनूठे ढंग से कही जाय तो उससे लोगों का बहुत कुछ मनोरंजन हो जाता है, इससे कवि लोग वाग्वैदग्ध्‍य से प्राय: काम लिया करते हैं। नीतिसम्‍बन्‍धी पद्यों में चमत्कार की योजना अकसर देखने में आती है। जैसे, बिहारी के ‘कनक कनक ते सौ गुनी’ वाले दोहे में अथवा रहीम के इस प्रकार के दोहों में –

(क) बड़े पेट के भरन में, है रहीम दुख बाढ़ि।

यातें हाथी हहरि कै, दिए दाँत द्वै काढ़ि॥

(ख) ज्यों रहीम गति दीप की, कुल कुपूत गति सोइ।

बाकरे उजियारो लगै, बढ़े अँधेरो होइ॥

ऐसे कथनों में आकर्षित करनेवाली वस्तु होती है वर्णन के ढंग का चमत्कार। इस प्रकार का चमत्कार चित्त को आकर्षित करता है पर उसी रूप में जिस रूप में कोई तमाशा आकर्षित करता है। इस प्रकार के आकर्षण में ही काव्यत्व नहीं है। मन को इस प्रकार से ऊपर ही ऊपर आकर्षित करना, केवल कुतूहल उत्पन्न करना,

1. ‘उठि जाइ न छूआ’ के स्थान पर यदि ‘उठि होइ गा धूआ’ पाठ होता तो और भी अच्छा होता।

काव्य का लक्ष्य नहीं है। उसका लक्ष्य है मन को भिन्न भिन्न भावों में (केवल आश्चर्य में ही नहीं, जैसा चमत्कारवादी कहा करते हैं) लीन करना। कुछ वैलक्षण्य द्वारा आकर्षण साधन हो सकता है, साध्‍य नहीं। जो लोग कथन की चतुराई या अनूठेपन को ही काव्य समझा करते हैं उन्हें अग्निपुराण के वचन पर ध्‍यान देना चाहिए-

वाग्वैदग्ध्‍यप्रधा नेऽपि रस एवात्र जीवितम्।

भावव्यंजना, वस्तुवर्णन और तथ्यप्रकाश सबके अन्तर्गत चमत्कारपूर्ण कथन हो सकता है। ऊपर जो दोहे दिए गए हैं वे तथ्यप्रकाश के उदाहरण हैं। भावव्यंजना के अन्तर्गत जायसी की चमत्कारयोजना के कुछ उदाहरण आ चुके हैं, जैसे-

यह तन जारौं छार कै, कहौ कि ‘पवन! उड़ाव’।
मकु तेहि मारग उड़ि परै, कंत धरै जहँ पाव॥
वस्तुचित्रण के बीच भी जायसी में उक्तिवैचित्रय स्थान-स्थान पर है, जैसे-

चकई बिछुरि पुकारै, कहाँ मिलौं, हो नाह।
एक चाँद निसि सरग महँ, दिन दूसर जल माँह॥
भावव्यंजना, वस्तुवर्णन और तथ्यप्रकाश तीनों में यह बात है कि यदि चमत्कार के साथ ही किसी भाव की अनुभूति में उपयोगी सामग्री भी है तब उक्ति प्रकृत काव्य कही जा सकती है नहीं तो काव्याभास होगी। जायसी के दोनों दोहों को लेकर देखते हैं तो प्रथम में जो चमत्कार है वह अभिलाषा के उत्कर्ष की व्यंजना में सहायक है और द्वितीय में जो चमत्कार है वह आलम्बन के सौन्दर्य की अनुभूति में।

यहाँ पर चमत्कारपद्धति और रसपद्धति में जो भेद है उसे स्पष्ट करने का थोड़ा प्रयत्न करना चाहिए। किसी वस्तु के वर्णन या किसी तथ्य के कथन में बुद्धि को दौड़ाकर यदि ऐसी वस्तु या प्रसंग की योजना की जाय जिसकी ओर प्रस्तुत वस्तु या प्रसंग के सम्‍बन्‍ध में श्रोता का ध्‍यान पहले कभी न गया हो और इस कारण बिलकुल नया या विलक्षण लगे तो एक प्रकार का कुतूहल उत्पन्न होगा। यही कुतूहल उत्पन्न करना चमत्कार का उद्देश्य है। रससंचार के निमित्त जो कथन किया जाता है उसमें भी कभी कभी साधारण से कुछ और ढंग पकड़ना पड़ता है (क्या ढंग पकड़ना पड़ता है, इस पर और कभी विचार किया जायगा) पर उसमें यह उद्देश्य मुख्य नहीं होता कि जिस वस्तु या प्रसंग की योजना की जाय वह श्रोता को नया, विलक्षण या झूठा लगे बल्कि अपने मर्मस्पर्शी स्वरूप के कारण भाव की गहरी व्यंजना करे या श्रोता के हृदय में वासनारूप में स्थित किसी भाव को जाग्रत करे। इस प्रकार विचार करने से कवि की उक्ति तीन प्रकार की हो सकती है-(1) जिसमें केवल चमत्कार या वैलक्षण्य हो; (2) जिसमें केवल रस या भावुकता हो; (3) जिसमें रस और चमत्कार दोनों हों।

इनमें से प्रकृत काव्य हम केवल पिछली दो उक्तियों में ही मान सकते हैं, प्रथम में केवल काव्याभास मानेंगे। यहाँ पर हमें प्रयोजन प्रथम और द्वितीय प्रकार की उक्ति से है। ऊपर बिहारी और रहीम के जिन दोहों का उल्लेख हुआ है वे जनसमाज से स्वीकृत साधारण तथ्यों को एक अनूठे ढंग से सामने रखते हैं। अब यह देखिए कि इनमें काव्य का प्रकृत स्वरूप किसमें है, किसमें नहीं। किसी तथ्य का कथन जब काव्यपद्धति द्वारा किया जाता है तब उसकी सत्यता का निश्चय करना विवक्षित नहीं रहता, बल्कि उस तथ्य के प्रति किसी स्वाभाविक भाव के अनुभव को तीव्र करना-जैसे, ‘कनक कनक तें सौगुनी’ वाले दोहे में कवि धन के बुरे प्रभाव के कारण उसके प्रति श्रोता की तिरस्कार बुद्धि जाग्रत करना चाहता है, इसलिए धतूरे का उल्लेख करता है। इसी प्रकार ‘बड़े पेट के भरन में’ वाले दोहे में असन्तोषजन्य दीनता के प्रति जो जुगुप्सा विवक्षित है वह हाथी ऐसे बड़े जानवर का दाँत निकलना देखकर उत्पन्न हो सकती है। इन दोनों उक्तियों की तह में कुछ भाव निहित हैं अत: हम इन्हें चमत्कार प्रधान काव्य कह सकते हैं। इस प्रकार का काव्य रसप्रधान काव्य की कोटि तक तो नहीं पहुँच सकता पर काव्य कहला सकता है।

जिसमें भाव का पता देनेवाला अथवा भाव जाग्रत करनेवाला कोई शब्द या वाक्य अथवा प्रस्तुत प्रसंग के प्रति किसी प्रकार का भाव उत्पन्न कराने में समर्थ अप्रस्तुत वस्तु या व्यापार न हो, केवल दूर की सूझ या शब्दसाम्यमूलक विलक्षणता हो वह उक्ति काव्याभास होगी। जैसे, मिस्सी लगे काले दाँत को देखकर यह कहना कि ‘मनो खेलत है लरिका हबसी के’, दूर की सूझ या अनूठापन चाहे सूचित करे पर सौन्दर्य का भाव उत्पन्न करने में समर्थ नहीं है। दूर की सूझ दिखाने के लिए लोगों ने ‘भानु मनो सनि अंक लिये’ तक कह डाला है पर उनकी यह सूझ वास्तव में दूर की नहीं है-उन पोथियों तक की है जिनमें ग्रहों का रंग लिखा रहता है। ऐसी भद्दी उक्तियाँ भी सूक्ति कहलाती हैं। सूक्ति कहलाएँ, पर इनका उत्तम काव्य कहा जाना तो रोकना चाहिए।

तथ्यवर्णन में अब रहीम का ‘ज्यों रहीम गति दीप की’ वाला दूसरा दोहा लीजिए। इसमें कही हुई बात यह है कि कुपुत्र जब तक बच्चा रहता है तभी तक अच्छा लगता है, जब बढ़ता है तब दु:खदायी हो जाता है। ‘बारे’ और ‘बाढ़े’ शब्दों के श्लेष के आधार पर ही कवि ने दीपक का उल्लेख क्या है। पर इस दीपक के व्यापार की योजना कुपुत्र के प्रति विरक्ति आदि के अनुभव में कुछ जोर नहीं पहुँचाती। अत: इन दोहों में कोरा चमत्कार ही कहा जा सकता है। इसी चमत्कार के कारण हम इस उक्ति को कोरा तथ्यकथन न कहकर काव्याभास कहेंगे। काव्य का बाहरी रूपरंग इसमें पूरा है, पर प्राण नहीं है। रहीम के कुछ ही दोहे ऐसे मिलेंगे। उनके दोहे भावुकता से भरे हुए हैं। पर नीति के अधिकांश दोहे (जैसे वृंद के) काव्याभास ही के अन्तर्गत आ सकते हैं।

यहाँ पर सूक्ति के अन्तर्गत हम जायसी के उन्हीं कथनों को लेते हैं जिनमें किसी तथ्य का प्रकाश है। इन कथनों के सम्‍बन्‍ध में हम यह कह सकते हैं कि इनमें अधिकतर चमत्कार के साथ भावुकता भी है। जैसे बुढ़ापे पर ये उक्तियाँ लीजिए-

मुहमद बिरिध जो नइ चलै, काह चलै भुइँ टोइ।
जीवन रतन हेरान है, मकु धरती पर होइ॥
बिरिध जो सीख डोलावै, सीस धुनै तेहि रीस॥
बूढ़ी आऊ होहु तुम्ह, केइ यह दीन्ह असीस॥
यहाँ यौवनावस्था के प्रति मनुष्य का जो स्वाभाविक राग होता है उसकी व्यंजना चमत्कार की अपेक्षा प्रधान है।

मिट्टी पर यह उक्ति देखिए-

माटी मोल न किछु लहै, औ माटी सब मोल।
दिस्टि जो माटी सौं करै, माटी होइ अमोल॥
यों तो मिट्टी का कुछ भी मूल्य नहीं कहा जाता पर इसी मिट्टी अर्थात् मनुष्य-शरीर का बहुत कुछ मूल्य है। मिट्टी पर भी यदि दृष्टि करे अर्थात् तुच्छ से तुच्छ का भी तिरस्कार न करे तो मिट्टी (शरीर) अमूल्य हो जाय। इसमें विनय या दैन्य का भाव प्रकट होता है।

”जेहिपर जेहिकर सत्य सनेहू, सो तेहि मिलत न कछु संदेहू’ इस बात को प्रत्यक्ष करने के लिए जायसी ने बहुत दूर की दो वस्तुओं का एकत्र होना दिखाया है-

बसै मीन जल धरती, अंबा बसै अकास।
जो पिरीत पै दुवौ महँ, अंत होहिं एक पास॥
इस कथन में जायसी केवल प्रमाण द्वारा निश्चय करते हुए जान पड़ते हैं, यद्यपि प्रमाण तर्क की कोटि का नहीं है। यदि प्रमाण तर्क की कोटि का होता तो हम इस उक्ति को साधारण तथ्यकथन कहते, पर उसका न्यास काव्य की रीति पर है अत: इस उक्ति को हम काव्याभास कहेंगे।

कौवे सबेरा होने पर क्यों काँव-काँव करके चिल्लाते हैं? जायसी कहते हैं कि वे यह देखकर चिल्लाते हैं कि रात्रि की इतनी फैली हुई कालिमा तो छूट गई, वे ही ऐसे अभागे हैं जिनकी कालिमा ज्यों की त्यों बनी है-

भोर होइ जौ लागै, उठहिं रोर कै काग।
मसि छूटै सब रैनि कै, कागहिं केर अभाग॥
इस उक्ति में भी जो कुछ है वह वैलक्षण्य ही है, यद्यपि कालिमा या बुराई की ओर अरुचि की भी झलक है।

फुटकल प्रसंग

पदमावत के बीच-बीच में बहुत से ऐसे फुटकल प्रसंग भी आए हैं जैसे, दानमहिमा, द्रव्यमहिमा, विनय इत्यादि। ऐसे विषयों के वर्णन को काव्यपद्धति के भीतर करने के लिए कविजन या तो उनके प्रति अनुराग, श्रद्धा, विरक्ति आदि अपना कोई भाव व्यंग्य रखते हैं या कुछ चमत्कार की योजना करते हैं। कवि के भाव का पता विषय को प्रिय या अप्रिय, विशद या कुत्सित रूप में प्रदर्शित करने से लग सकता है। इस रूप में प्रदर्शित करते समय अत्युक्ति प्राय: करनी पड़ती है क्योंकि रूप के उत्कर्ष या अपकर्ष से ही कवि (आश्रय) की रति या विरक्ति का आभास मिलता है जैसे यदि कोई पात्र किसी स्‍त्री का बहुत सुन्दर रूप में वर्णन करता है तो उसके प्रति उसके रतिभाव का पता लगता है, वैसे ही यदि कवि दानशीलता, विनय आदि गुणों का खूब बढ़ा चढ़ाकर वर्णन करता है तो उन गुणों के प्रति उसका अनुराग प्रकट होता है। नीचे कुछ फुटकल प्रसंग दिए जाते हैं।

दान महिमा-

धनि जीवन औ ताकर हीया । ऊँच जगत महँ जाकर दीया॥
दिया जो जप तप सब उपराहीं । दिया बराबर जग किछु नाहीं॥
एक दिया ते दसगुन लहा । दिया देखि सब जग मुख चहा॥
दिया करै आगे उजियारा । जहाँ न दिया तहाँ अँधियारा॥
दिया मंदिर निसि करै अँजोरा । दिया नाहिं, घर मूसहिं चोरा॥
नम्रता की शक्ति-

एहि सेंति बहुरि जूझ नहिं करिए । खड़ग देखि पानी होइ ढरिए॥
पानिहि काह खड़ग कै धारा । लौटि पानि होइ सोइ जो मारा॥
पानी केर आगि का करई । जाइ बुझाइ जौ पानी परई॥
दु:ख की घोरता-

दुख जारै, दुख भूँजै, दुख खोवै सब लाज।
गाजहि चाहि अधिक दुख, दुखी जान जेहि बाज॥
इस दोहे से कवि के हृदय की कोमलता, प्राणिमात्र के दु:ख से सहानुभूति प्रकट होती है।

अपकार के बदले उपकार-

मंदहि भल जो करै भल सोई । अंतहि भला भले कर होई॥
शत्रु जो विष देइ चाहै मारा । दीजिय लोन जानि विषहारा॥
विष दीन्हें विसहर होइ खाई । लोन दिए होइ लोन बिलाई॥
मारे खडग खडग कर लेई । मारे लोन नाइ सिर देई॥
साहस-

साहस जहाँ सिद्धि तहँ होई।

द्रव्यमहिमा-

(क) दरब तें गरब करै जो चाहा । दरब तें धरती सरग बेसाहा॥

दरब तें हाथ आव कविलासू । दरब तें अछरी छाँड़ न पासू॥

दरब तें निरगुन होइ गुनवंता । दरब तें कुबुज होइ रुपवंता॥

दरब रहै भुइँ, दिपै लिलारा । अस मन दरब देइ को पारा॥

(ख) साँठि होइ जेहि तेहि सब बोला । निसँठ जो पुरुष पात जिमि डोला॥

साँठिहि रंक चलै झौंराई । निसँठ राव सब कह बौराई॥

साँठिहि आव गरब तन फूला । निसँठिहि बोल बुद्धि बल भूला॥

साँठिहि जागि नींद निसि जाई । निसँठहिं काह होइ औंघाई॥

साँठिहि दिस्टि जोति होइ नैना । निसँठ होइ, मुख आव न बैना॥

जायसी की जानकारी

साहित्य की दृष्टि से जायसी की रचना की जो थोड़ी बहुत समीक्षा हुई उससे यह तो प्रकट ही है कि उन्हें भारतीय काव्यपद्धति और भाषासाहित्य का अच्छा परिचय था। भिन्न भिन्न अलंकारों की योजना, काव्यसिद्ध उक्तियों का विस्तृत समावेश (जैसा कि नखशिखवर्णन में है); प्रबन्ध काव्य के भीतर निर्दिष्ट वर्ण्य विषयों का सन्निवेश (जैसे जलक्रीड़ा, समुद्रवर्णन) प्रचलित काव्यरीति के परिज्ञान के परिचायक हैं। यह परिज्ञान किस प्रकार का था, यह ठीक नहीं कहा जा सकता। वे बहुश्रुत थे, बहुत प्रकार के लोगों से उनका सत्संग था, यह तो आरम्भ में ही कहा जा चुका है। पर उनके पहले चारणों के वीरकाव्यों और कबीर आदि कुछ निर्गुणोपासक भक्तों की वाणियों के अतिरिक्त और नाम लेने लायक काव्यों का पता न होने से यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने काव्यों और रीतिग्रन्थों का क्रमपूर्वक अध्‍ययन किया था। ग्रियर्सन साहब ने लिखा है कि जायस में आकर जायसी ने पंडितों से संस्कृत काव्यरीति का अध्‍ययन किया। इस अनुमान का उन्होंने कोई आधार नहीं बताया। संस्कृत ज्ञान का अनुमान जायसी की रचना से तो नहीं होता। उनका संस्कृत शब्दभंडार बहुत परिमित है। उदाहरण के लिए ‘सूर्य’ और ‘चंद्र’ ये दो शब्द लीजिए जिनका व्यवहार जायसी ने इतना अधिक किया है कि जी ऊब जाता है। इन दोनों शब्दों के कितने अधिक पर्याय संस्कृत में हैं, यह हिन्दी जाननेवाले भी जानते हैं। पर जायसी ने सूर्य के लिए रवि, भानु और दिनअर (दिनकर) और चंद्र के लिए ससि, ससहर और मयंक (मृगांक) शब्दों का ही व्यवहार किया है। दूसरी बात यह है कि संस्कृताभ्यासी से चन्द्र को स्‍त्रीरूप में कल्पित करते न बनेगा।

यह आरम्भ में ही कह आए हैं कि पदमावत के ढंग के चरितकाव्य जायसी के पहले बन चुके थे। अत: जायसी ने काव्यशैली किसी पंडित से न सीखकर किसी कवि से सीखी। उस समय काव्य व्यवसायियों को प्राकृत और अपभ्रंश से पूर्ण परिचित होना पड़ता था। छंद और रीति आदि के परिज्ञान के लिए भाषाकविजन प्राकृत और अपभ्रंश का सहारा लेते थे। ऐसे ही किसी कवि से जायसी ने काव्यरीति सीखी होगी। पदमावत में ‘दिनअर’, ‘ससहर’, ‘अहुठ’, ‘भुवाल’, ‘बिसहर’, ‘पुहुमी’ आदि शब्दों का प्रयोग तथा प्राकृत अपभ्रंश की पुरानी प्रथा के अनुसार ‘हि’ विभक्ति का सब कारकों में व्यवहार देख यह दृढ़ अनुमान होता है कि जायसी ने किसी से भाषा-काव्य-परम्परा की जानकारी प्राप्त की थी। ‘सैरंधी’ (सैरंध्री=द्रौपदी), ‘गंगेऊ’ (गांगेय=भीष्म), ‘पारथ’ ऐसे अप्रचलित शब्दों का जो कहीं-कहीं उन्होंने व्यवहार किया है वह इसी जानकारी के बल से न कि संस्कृत के अभ्यास के बल से।

यह ठीक है कि संस्कृत कवियों के भाव कहीं-कहीं ज्यों के त्यों पाए जाते हैं, जैसे इस दोहे में –

भवँर जो पावा कँवल कहँ, मन चीता बहु केलि।
आइ परा कइ हस्ति तहँ, चूर किएउ सो बेलि॥
यह इस श्लोक का अनुवाद जान पड़ता है-

रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं
भान्वानुदेष्यति हसिष्यति पंकजश्री।
इत्थं विचिन्तयति कोशगते द्विरेफे
हा हन्त! हन्त! नलिनीं गज उज्जहार॥
इसी प्रकार

‘शैले शैले न माणिक्यं, मौक्तिकं न गजे गजे।
साधवो न हि सर्वत्र, चंदनं न वने वने॥’
चाणक्य के इस श्लोक का हिन्दी रूप भी पदमावत में मौजूद है-

थल थल नग न होहिं जेहि जोती। जल जल सीप न उपनहिं मोती॥
बन बन बिरिछ न चंदन होई। तन तन बिरह न उपनै सोई॥
इस प्रकार के भाव भी उन्हें भाषा काव्य द्वारा ही मिले।

छन्द शास्‍त्र के ज्ञान का प्रमाण जायसी की रचनाओं से नहीं मिलता। चौपाई बहुत ही सीधा छंद है, पर उसमें भी कहीं 16 मात्राएँ हैं, कहीं 15 ही। दोहों के चरण तो प्राय: गड़बड़ हैं। तुलसीदासजी के दोहों में भी कहीं-कहीं मात्राएँ घटती हैं, पर जायसी में तो बहुत कम दोहे ऐसे मिलेंगे जो ठीक उतरते हों। विषम चरण कोई 11 मात्राओं का है, कोई 16-जैसे,

(क) जो चाहा सो चीन्हेसि, करै जो चाहै कीन्ह।

(ख) काया मरम जान पै रोगी, भोगी रहै निचिंत॥

‘नखशिख’ में आए हुए उपमान प्राय: सब काव्यप्रसिद्ध ही हैं। बहुत-सी चमत्कारपूर्ण उक्तियाँ भी पुरानी हैं जिनका प्रयोग सूर आदि और समसामयिक कवियों ने भी किया है। उदाहरण के लिए यह मनोहर उक्ति लीजिए-

गहै बीन मकु रैनि बिहाई। ससि वाहन तहँ रहै ओनाई॥

सूरदासजी ने भी इस उक्ति की योजना की है-

दूर करहु बीना कर धरिबो।

मोहे मृग नाहीं रथ हाँक्यौ, नाहिं न होत चंद को ढरिबो॥

पर जायसी ने इस उक्ति को बढ़ाकर कुछ और भी सुसज्जित किया है।

यह तो हुई साहित्य की अभिज्ञता। अब थोड़ा यह भी देखना चाहिए कि और विषयों का ज्ञान उनका कैसा था। पदमावत में ज्योतिष, हठयोग, कामशास्‍त्र और रसायन की बातें भी आई हैं। हमारी समझ में ज्योतिष को छोड़कर और बातों की जानकारी उन्हें सत्संग द्वारा प्राप्त हुई थी, न कि ग्रन्थों के अध्‍ययन द्वारा। किसी कवि की रचना में किसी शास्‍त्र की साधारण बातों का कुछ उल्लेख देख चट यह कह बैठना की वह उस शास्‍त्र का बड़ा भारी पंडित था, अपनी भी हँसी करना है और उस कवि की भी। ‘कहत सबै बेंदी दिए ऑंक दसगुनो होत’ और ‘यह जग काँचो काँच सो मैं समुझ्यौ निरधार’ को आगे करके जो लोग कह बैठते हैं कि ‘वाह! वाह! कवि गणित और वेदान्त शास्‍त्र का कैसा भारी पंडित था’, उन्हें विचार से काम लेने और वाणी का संयम रखने का अभ्यास करना चाहिए। ‘अहा हा!’ और ‘वाह वाह’ वाली इस चाल की समालोचना जितनी ही जल्द बंद हो उतना ही अच्छा। सिद्धान्तों पर विचार करते समय वेदान्त की कई बातों की झलक हम पदमावत और अखरावट में दिखा आए हैं। पर उसका यह अभिप्राय नहीं है कि जायसी ‘शारीरक भाष्य’ और ‘पंचदशी’ घोखे बैठे थे। ‘पंचभूत’ शब्द का प्रयोग उन्होंने पाँच ज्ञानेन्द्रियों के अर्थ में किया है। यह बात दर्शनशास्‍त्र का अभ्यास नहीं सूचित करती।

हिन्दुओं के पौराणिक वृत्तों की जानकारी जायसी को थी, पर बहुत पक्की न थी। कुबेर का स्थान अलकापुरी है, इसका पता उन्हें था क्योंकि वह बादशाह की भेजी योगिनी से कहलाते हैं -‘गइउँ अलकपुर जहाँ कुबेरू’। ‘नारद’ को जो उन्होंने शैतान के स्थान पर रखा है, उसका कारण सूफियों की प्रवृत्तिविशेष है। सूफी शैतान को ईश्वर का विरोधी नहीं मानते बल्कि उसकी आज्ञा के अनुसार अनधिकारियों को ईश्वर तक पहुँचने से रोकनेवाला मानते हैं। ‘सरग’ शब्द जायसी आसमान के अर्थ में ही लाए हैं। हिन्दू कथाओं का यदि उन्हें अच्छा परिचय होता तो वे चन्द्रमा को स्‍त्री कभी न बनाते। उनके चंद्रमा वही हैं जिन्हें अवध की स्त्रियाँ ‘चन्दा माई! धाय आव’ कहकर बुलाती हैं। सप्तद्वीपों के तो उन्होंने कहीं नाम नहीं लिए हैं, पर सात समुद्रों के नाम उन्हें समुद्रवर्णन में गिनाने पड़े हैं। इन नामों में दो (किलकिला और मानसर) पुराणों के अनुसार नहीं हैं। पुराणों में एक ही मानसरोवर उत्तर में माना गया है पर जायसी ने उसे सिंहल के पास कहा और सात समुद्रों में गिन लिया है। पर रामायण, महाभारत आदि के प्रसिद्ध पात्रों के स्वरूप से वे अच्छी तरह परिचित थे। इन्द्र द्वारा कर्ण से अक्षय कवच ले लिए जाने तथा इसी प्रकार के और प्रसंगों का उन्होंने उल्लेख किया है।

अब उनका भौगोलिक ज्ञान लीजिए। इतिहास और भूगोल दोनों में हमारे देश के पुराने लोग कच्चे होते थे। अपने देश के ही भिन्न भिन्न प्रदेशों और स्थानों की यदि ठीक ठीक जानकारी उस समय किसी को हो तो उसे बहुत समझना चाहिए। अपने देश के बाहर की बात जानना तो कई सौ वर्षों से भारतवासी छोड़े हुए थे। सिंहलद्वीप, लंका आदि के नाम ही जायसी के समय में याद रह गए थे। अत: जायसी को यदि सिंहल की ठीक ठीक स्थिति का पता न हो तो कोई आश्चर्य नहीं। जायसी सिंहलद्वीप को चित्तौर से पूरब समझते थे, जैसा कि इस चौपाई से प्रकट होता है-

पच्छिउँ कर बर, पुरुब क बारी।
जोरी लिखी न होइ निनारी॥
लंका को वे सिंहल के दक्षिण मानते थे यह बात उस प्रसंग को ध्‍यान देकर पढ़ने से विदित हो जाती है जिसमें सिंहल से लौटते समय तूफान में बहकर रत्नसेन के जहाज नष्ट हुए थे। जायसी लिखते हैं कि जहाज आधे समुद्र में भी नहीं आए थे कि उत्तर की हवा बड़े जोर से उठी-

आधे समुद ते आए नाहीं।
उठी बाउ ऑंधी उतराहीं॥
इस तूफान के कारण जहाज भटककर लंका की ओर चल पड़े-

बोहित चले जो चितउर ताके। भए कुपंथ लंक दिसि हाँके॥

उत्तर की ओर से ऑंधी आने से जहाज दक्षिण की ओर ही जायँगे। इससे लंका सिंहल से दक्षिण की ओर हुई।

इस अज्ञान के होते हुए भी जनता के बीच प्राचीन काल की विलक्षण स्मृति का आभास पदमावत में मिलता है। भारत के प्राचीन इतिहास का विस्तृत परिचय रखनेवाले मात्र यह जानते होंगे कि प्राचीन हिन्दुओं के अर्णवपोत पूर्वीय समुद्रों में बराबर दौड़ा करते थे। पच्छिम के समुद्रों में जाने का प्रमाण तो वैसा नहीं मिलता पर पूर्वीय समुद्रों में जाने के चिन्‍ह अब तक वर्तमान हैं। सुमात्रा, जावा आदि द्वीपों में हिन्दू मंदिरों के चिन्‍ह तथा सुदूर बाली, लम्बक आदि द्वीपों में हिन्दुओं की बस्ती अब तक पाई जाती है। बंगाल की खाड़ी से लेकर प्रशान्त महासागर के बीच होते हुए चीन तक हिन्दुओं के जहाज जाते थे। ताम्रलिप्ति (आधुनिक तमलूक जो मेदिनीपुर जिले में है) और कलिंग में पूर्व समुद्र में जाने के लिए प्रसिद्ध बन्दरगाह थे। फाहियान नामक चीनी यात्री, जो द्वितीय चन्द्रगुप्त के समय भारतवर्ष में आया था, ताम्रलिप्ति ही से जहाज पर बैठकर सिंहल और जावा होता हुआ अपने देश को लौटा था। उड़ीसा के दक्षिण कलिंग देश में कोरिंगापटम (कलिंगपट्टन) नाम का एक पुराना नगर अब भी समुद्रतट पर है। बाली और लम्बक टापुओं के हिन्दू अपने को कलिंग ही से आए हुए बताते हैं। जायसी के समय में यद्यपि हिन्दुओं का भारतवर्ष के बाहर जाना बन्द हो गया था पर समुद्र के उस पुराने घाट (कलिंग) की स्मृति बनी हुईथी-

आगे पाव उडैसा, बाएँ दिए सो बाट। दहिनाबरत देइकै उतरु समुद के घाट॥

यहीं तक नहीं, पूर्वीय समुद्र की कुछ विशेष बातें भी उस समय तक लोकस्मृति में बनी हुई थीं। प्रशान्त महासागर के दक्षिण भाग में मूँगों से बने हुए टापू बहुत से हैं। कहीं कहीं मूँगों की तह जमते जमते टीले बन जाते हैं। कपूर निकालनेवाले पेड़ भी प्रशान्त महासागर के टापुओं में बहुत हैं। इन दोनों बातों पर प्राचीन समुद्रयात्रियों का ध्‍यान विशेष रूप से गया होगा। इनका स्मरण जनता के बीच बना हुआ था, इसका पता जायसी इस प्रकार देते है। –

राजा जाइ तहाँ बहि लागा । जहाँ न कोई संदेसी कागा॥
तहाँ एक परबत अह डूँगा । जहवाँ सब कपूर और मूँगा॥
जायसी ने चित्तौर से सिंहल जाने का जो मार्ग वर्णन किया है वह यद्यपि बहुत संक्षिप्त है पर उससे कवि की दक्षिण अर्थात् मध्‍य प्रदेश के स्थानों की जानकारी प्रकट होती है। चित्तौर से रत्नसेन पूर्व की ओर चले हैं। कुछ दूर चलने पर जायसी कहते है। –

‘दहिने बिदर, चँदेरी बाएँ॥

‘चँदेरी’ आजकल ग्वालियर राज्य के अन्तर्गत है और ललितपुर से पश्चिम पड़ता है। विदर गोलकुंडे के पासवाला सुदूर दक्षिण का विदर नहीं बल्कि बरार (प्राचीन विदर्भ) के अन्तर्गत एक स्थान था1। जायसी का विदर से अभिप्राय बिदर्भ या बरार से है। रत्नसेन चित्तौर से कुछ दक्षिण लिए पूर्व की ओर चला और रतलाम के पास आ निकला जहाँ से चंदेरी बाईं ओर या उत्तर और बरार दक्षिण पड़ेगा। यहाँ से शुक राजा को विजयगढ़ (जो सूबा मालवा के भीतर था और जिसका प्रधान नगर विजयगढ़ था) होते हुए और अँधियार खटोला (होशंगाबाद और सागर के बीच के प्रदेश) बाईं या उत्तर की ओर छोड़ते हुए गोंड़ों के देश गोंडवाने में पहुँचने को कहता है-

सुनु मत, काज चहसि जौ साजा। बीजानगर विजयगढ़ राजा॥
पहुँचहु जहाँ गोड़ औ कोला। तजि बाएँ अँधियार खटोला॥
विजयगढ़ इंदौर के दक्षिण नर्मदा के दोनों और फैला हुआ राज्य था। तात्पर्य यह कि रत्नसेन रतलाम के पास से चलकर इन्दौर के दक्षिण नर्मदा के किनारे होता हुआ हँड़िया या हरदा के पास निकला जहाँ से पूरब जानेवाले को होशंगाबाद (अँधियार खटोला) उत्तर या बाईं ओर पड़ेगा। हँड़िया बरार की उत्तरी सीमा पर था और बरार के दक्षिण तिलंगाना देश माना जाता था जो आजकल के बरार का ही दक्षिणी भाग है। हँड़िया के उत्तर जबलपुर पड़ेगा जिसके पास गढ़कंटक था। अत: इस स्थान पर (हँड़िया के पास) शुक का कहना बहुत ही ठीक है कि-

दक्खिन दहिने रहहिं तिलंगा। उत्तर बाएँ गढ़ काटंगा॥

1. आईने अकबरी में सूबा बरार का उत्तर दक्षिण विस्तार हँड़िया (मध्‍य प्रदेश की पश्चिमी सीमा पर नर्मदा के किनारे एक छोटा कस्बा) से बिदर तक 180 कोस लिखा है और बरार के दक्षिण तिलंगाना बताया गया है।

हँड़िया के पास से फिर आगे बढ़ने के लिए तोता इस प्रकार कहता है-

माँझ रतनपुर सिंहदुवारा। झारखंड देइ बाँव पहारा॥

यहाँ पर कवि ने केवल छन्द के बन्धन के कारण ‘सिंहदुवारा’ (छिंदवाड़ा) के पहले रतनपुर रख दिया है। हँड़िया के पास पूरब चलनेवाले को पहले छिंदवाड़ा पड़ेगा तब रतनपुर जो बिलासपुर जिले में है। रतनपुर से फिर शुक झारखंड (सरगुजा का जंगल) उत्तर छोड़ते हुए आगे बढ़ने को कहता है। यदि बराबर आगे बढ़ा जायगा तो चलनेवाला उड़ीसा में पहुँचेगा, अत: कुछ दूर बढ़ने पर उड़ीसा जानेवाला मार्ग छोड़कर शुक रत्नसेन को दक्षिण की ओर घूम पड़ने को कहता है। दक्षिण घूमने पर कलिंग देश में समुद्र का घाट मिलेगा-

आगे पाव उड़ैसा, बाएं दिए सो बाट।
दहिनावरत देइ कै, उतरु समुद के घाट॥
ऊपर के विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि जायसी ने चित्तौर से कलिंग तक जाने का मार्ग लिखा है वह यों ही ऊटपटाँग नहीं है। उत्तरोत्तर पड़नेवाले प्रदेशों का क्रम ठीक है।

जायसी को बहुत दूर दूर के स्थानों के नाम मालूम थे। बादशाह की दूती जब योगिनी बनकर चित्तौर गई है तब उसने अपने तीर्थाटन के वर्णन में बहुत से तीर्थों के नाम बताए हैं जिनमें से अधिकतर तो बहुत प्रसिद्ध हैं पर कुछ ऐसे अप्रसिद्ध स्थान भी आए हैं जिन्हें इधर के लोग कम जानते हैं, जैसे नागरकोट और बालनाथ का टीला-

गउमुख हरिद्वार फिरि कीन्हिउँ । नगरकोट कटि रसना दीन्हिउँ॥
ढूँढ़िउँ बालनाथ कर टीला । मथुरा मथिउँ न सो पिउ मीला॥
‘नागरकोट’ काँगड़े में है जहाँ लोग ज्वालादेवी के दर्शन को जाते हैं। ‘बालनाथ का टीला’ भी पंजाब में है। सिन्ध और झेलम के बीच सिंध सागर दोआब में जो नमक के पहाड़ पड़ते हैं उसी के अन्तर्गत यह एक बहुत ऊँची पहाड़ी है जिसमें बालनाथ नामक एक योगी की गुफा है। 1 साधु यहाँ बहुत जाते हैं।

इतिहास का ज्ञान भी जायसी को जनसाधारण से बहुत अधिक था। इसका एक प्रमाण तो ‘पदमावत’ का प्रबन्ध ही है। जैसा कि आरम्भ में कहा जा चुका है, पद्मिनी और हीरामन सूए की कहानी उत्तरीय भारत में, विशेषत: अवध में, बहुत दिनों से प्रसिद्ध चली आ रही है। कहानी बिल्कुल ज्यों की त्यों यही है। पर कहानी कहनेवाले राजा का नाम, बादशाह का नाम आदि कुछ भी नहीं बताते। वे यों ही कहते हैं कि ‘एक राजा था’, ‘एक बादशाह था’। समय के फेर से जैसे कहानी इतिहास हो जाती है वैसे ही इतिहास कहानी। अत: जायसी ने जो चित्तौर, रत्नसेन, अलाउद्दीन,

1. बालनाथ नाथसम्प्रदाय या गोरखपन्थ के एक योगी हो गए हैं।

गोरा, बादल आदि नाम देकर इस कहानी का वर्णन किया है उससे यह स्पष्ट है कि वे जानते थे कि घटना किस स्थान की और किस बादशाह के समय की है, पद्मिनी किसकी रानी थी, और किस राजपूत ने युद्ध में सबसे अधिक वीरता दिखाई थी। इसके अतिरिक्त अलाउद्दीन की और चढ़ाइयों का भी उन्हें पूरा पता था, जैसे देवगिरि और रणथम्भौर गढ़ पर की चढ़ाई का। देवगिरि पर चढ़ाई अलाउद्दीन ने अपने चाचा सुलतान जलालुद्दीन के समय में ही सन् 1296 ई. में की थी। रणथम्भौर पर चढ़ाई उसने बादशाह होने के चार वर्ष पीछे अर्थात् सन् 1300 में की थी पर उसे ले न सका था। दूसरे वर्ष सन् 1301 में रणथम्भौर गढ़ टूटा है और प्रसिद्ध वीर हम्मीर मारे गए हैं। ये दोनों घटनाएँ चित्तौर टूटने (सन् 1301 ई.) के पहले की हैं, अत: इनका उल्लेख ग्रन्थ में इतिहास की दृष्टि से अत्यन्त उचित हुआ है।

अलाउद्दीन के समय की और घटनाओं का भी जायसी को पूरा पता था। मंगोलों के देश का नाम उन्होंने ‘हरेव’ लिखा है। अलाउद्दीन के समय में मंगोलों के कई आक्रमण हुए थे जिनमें सबसे जबरदस्त हमला सन् 1303 ई. में हुआ था। सन् 1303 ई. में ही चित्तौर पर अलाउद्दीन ने चढ़ाई की। अब देखिए मंगोलों की इस चढ़ाई का उल्लेख जायसी ने किस प्रकार किया है। अलाउद्दीन चित्तौर गढ़ को घेरे हुए है, इसी बीच में दिल्ली से चिट्ठी आती है-

एहि विधि ढील दीन्ह तब ताईं ! दिल्ली तें अरदासैं आईं॥
पछिउँ हरेव दीन्हि जो पीठी । जो अब चढ़ा सौंह कै दीठी॥
जिन्ह भुइँ माथ गगन तेहि लागा । थाने उठे आव सब भागा॥
उहाँ साह चितउर गढ़ छावा । इहाँ देस अब होइ परावा॥
ज्योतिष का परिज्ञान जायसी का अच्छा प्रतीत होता है। रत्नसेन के सिंहलद्वीप से प्रस्थान करने के पहले उन्होंने जो यात्राविचार लिखा है वह बहुत विस्तृत भी है और ग्रन्थों के अनुकूल भी। इस प्रसंग की उनकी बहुत सी चौपाइयाँ तो सर्वसाधारण की जबान पर हैं, जैसे-

सोम सनीचर पुरुब न चालू। मंगर बुद्ध उतर दिसि कालू।

पिंड और ब्रह्मांड की एकता का प्रतिपादन करते हुए अखरावट में जायसी ने शरीर में ही जो ग्रहों की नीचे ऊपर स्थिति लिखी है वह सूर्यसिद्धान्त आदि ज्योतिष ग्रन्थों के ठीक अनकूल है। अरबी, फारसी नामों के साथ भारतीय नामों के तारतम्य का भी ज्ञान कवि को पूरा पूरा था, जो एक कठिन बात है। ‘सुहैल’ तारे का ‘सोहिल’ के नाम से पद्मावत में उन्होंने कई जगह उल्लेख किया है। यह ‘सुहैल’ अरबी शब्द है। फारसी और उर्दू की शायरी में इस तारे का नाम बराबर आता है, पर शोभावर्णन की दृष्टि से प्राय: हिलाल के साथ। यह तारा भारतीयों का अगस्त्य तारा है, इस बात का पता जायसी को था। अत: उन्होंने इसका वर्णन उस रूप में भी किया है जिस रूप में भारतीय कवि किया करते हैं। भारतीय कवि इसका वर्णन वर्षा का अन्त और शरत् का आगमन सूचित करने के लिए किया करते हैं, जैसे गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है-

उदित अगस्त पंथ जल सोषा। जिमि लोभहिं सोखै संतोषा॥

जायसी ने ठीक इसी प्रकार का वर्णन ‘सुहैल’ का किया है-

बिछरंता जब भेंटै, सो जानै जेहि नेह।
सुक्ख सुहेला उग्गवै, दु:ख झरै जिमि मेह॥
ऐसा ही एक स्थल पर और है। राजा रत्नसेन को दिल्ली से छुड़ाकर जब गोरा बादल लेकर चले हैं तब बादशाही सेना ने उनका पीछा किया है। उस समय गोरा के कहने से बादल तो रत्नसेन को लेकर चित्तौर की ओर जाता है और वृद्ध गोरा मुसलमान सेना की ओर लौटकर इस प्रकार ललकारता है-

सोहिल जैस गगन उपराहीं। मेघ घटा मोहिं देखि बिलाहीं॥

इसी प्रकार ‘अगस्त’ शब्द का उल्लेख भी वे गोरा बादल की प्रतिज्ञा में करते है। –

उए अगस्त हस्ति जब गाजा। नीर घटे पर आवहिं राजा॥

यह तो हुआ शास्‍त्रीय ज्ञान। व्यवहारज्ञान भी जायसी का बहुत चढ़ा चढ़ा था। घोड़ों और भोजनों के अनेक भेद तो इन्होंने कहे ही हैं, पुराने समय के वस्त्रों के नाम भी ‘पद्मावती रत्नसेन भेंट’ के प्रसंग में बहुत से गिनाए हैं।

जायसी मुसलमान थे, इससे कुरान के वचनों का पूरा अभ्यास उन्हें होना ही चाहिए। पद्मावत के आरम्भ में ही चौपाई के ये दो चरण-

कीन्हेंसि प्रथम जोति परगासू। कीन्हेंसि तेहि पिरीत कैलासू॥

कुरान की एक आयत के अनुसार है जिसका मतलब है-‘अगर न पैदा करता मैं तुझको, न पैदा करता मैं स्वर्ग को।’ इसके अतिरिक्त ये पंक्तियाँ भी कुरान के भाव को लिए हुए है। –

(1) सबै नास्ति वह अहथिर ऐस साज जेहि केर।

(2) ना ओहि पूत, न पिता न माता।

(3) ‘अति अपार करता कर करना’ से लेकर कई चौपाइयों तक।

(4) ‘दूसर ठाँव दई ओहि लिखे।’

अभिप्राय यह है कि खुदा ने अपने नाम के बाद पैगम्बर का ही नाम रखा, जैसा कि मुसलमानों के कलमा में है।

इस्लाम धर्म की और अनेक बातों का समावेश पद्मावत और अखरावट में हम पाते हैं। सिद्धान्तों के प्रसंग में हम कह आए हैं कि सामी पैगम्बरी मतों के अनुसार कयामत या प्रलय के दिन ही सब मनुष्यों के कर्मों का विचार होगा। मुसलमानों का विश्वास है कि भले और बुरे कर्मों के लेख की बही खुदा के सामने एक तराजू में तोली जाएगी और वह तराजू जिब्राईल फरिश्ते के हाथ में होगा। सबूत के लिए सब अंग और इन्द्रियाँ अपने द्वारा किए हुए कर्मों की साख देंगी। उस समय मुहम्मद साहब उन लोगों की ओर से प्रार्थना करेंगे जो उनपर ईमान लाए होंगे। इन बातों का उल्लेख पदमावत में स्पष्ट शब्दों में है-

गुन अवगुन विधि पूछब, होइहि लेख औ जोख।
वै बिनउब आगे होइ, करब जगत कर मोख॥
हाथ पाँव, सरवन औ ऑंखी । ए सब उहाँ भरहिं मिलि साखी॥

स्वर्ग के रास्ते में एक पुल पड़ता है जिसे ‘पुले सरात’ कहते हैं। पुल के नीचे घोर अन्धकारपूर्ण नरक है। पुण्यात्माओं के लिए वह पुल खूब लम्बी चौड़ी सड़क हो जाता है पर पापियों के लिए तलवार की धार की तरह पतला हो जाता है। पुल का उल्लेख पद्मावत में तो बिना नाम दिए और अखरावट में नाम देकर स्पष्ट रूप में हुआ है-

खाड़ै चाहि पैनि बहुताई। बार चाहि ताकर पतराई॥

पुराने पैगम्बर मूसा की किताब में आदम के स्वर्ग से निकाले जाने का कारण हौवा के कहने से एक वृक्षविशेष का फल खाना लिखा है। मुसलमानों में यह वृक्ष गेहूँ प्रसिद्ध है। अखरावट में तो इस कहानी का उल्लेख है ही, पद्मावत में भी पद्मावती की सखियाँ उसकी विदाई के समय कहती है। –

आदि अंत जो पिता हमारा। ओहु न यह दिन हिए बिचारा॥
छोह न कीन्ह निछोही ओहू। का हम्ह दोष लाग एक गोहूँ॥
एक पढ़ा लिखा मुसलमान फारसी से अपरिचित हो, यह हो ही नहीं सकता। फारसी शायरों की कई उक्तियाँ पद्मावत में ज्यों की त्यों आई हैं। अलाउद्दीन की चढ़ाई करने का वर्णन करते हुए घोड़ों की टापों से उठी धूल के आकाश में छा जाने पर जायसी कहते है। –

सत षँड धरती भइ षट खंडा। ऊपर अस्ट भए बरम्हंडा॥

यह फिरदौसी के शहनामे के इस शेर का ज्यों का त्यों अनुवाद है-

जे सुम्मे सितौराँ दरा पन्हे दश्त। जमीं शश शुदो, आस्माँ गश्त हश्त॥

अर्थात्-उस लम्बे-चौड़े मैदान में घोड़ों की टाप से जमीन सात खंड के स्थान पर छह ही खंड की रह गई और आसमान सात खंड (तबक) के स्थान पर आठ खंड का हो गया। मुसलमानों की कल्पना के अनुसार भी सात लोक नीचे हैं (तल, वितल, रसातल के समान) और सात लोक ऊपर।

राजा रत्नसेन का सन्देश सुआ इस प्रकार कहता है-

दहुँ जिउ रहै कि निसरै, काह रजायसु होइ?

यह हाफिज के इस शे’र का भाव है-

अज्म दीदारे तू दारद जान बर लब आमद:।
बाज गरदद या बर आयद चीस्त फरमाने शुमा॥
कवियों के भावों के अतिरिक्त फारसी की चलती कहावतों की भी छाया कहीं कहीं दिखाई पड़ती है; जैसे-

(क) नियरहिं दूर फूल जस काँटा। दूरहिं नियर सो जस गुर चाँटा॥

फारसी-दूराँ बाबसर नजदीक वा नजदीका बेबसर दूर। (अर्थात् दूर दृष्टिवालों को दूर भी नजदीक और बिना दृष्टि वाले को नजदीक भी दूर है।)

(ख) परिमल प्रेम न आछे छपा।

फारसी-इश्क व मुश्क रा नतवाँ नहुफ्तन।

(प्रीति और कस्तूरी छिपाए नहीं छिपती)

हिन्दुओं की ऐसी प्राचीन रीतियों का उल्लेख भी पद्मावत में मिलता है जो जायसी के समय तक न रह गई होंगी। जायसी ने उनका उल्लेख साहित्य की परम्परा के अनुसार किया है। पत्रवलि या पत्रभंगरचना प्राचीन समय में ही श्रृंगार करने में होती थी। वह किस प्रकार होती थी, इसका ठीक पता आजकल नहीं है। कुछ लोग चन्दन या रंग से गंडस्थल पर चित्र बनाने को पत्रभंग कहते हैं। प्राचीन रीति, नीति और वेशविन्यास जानने की अपनी बड़ी पुरानी उत्कंठा के कारण उनके सम्‍बन्‍ध में जो कुछ विचार हम अपने मन में जमा सके हैं उसके अनुसार पत्रभंग सोने या चाँदी के महीन वरक या पत्रों के कटे हुए टुकड़े होते थे जिन्हें कानों के पास से लेकर कपोलों तक एक पंक्ति में चिपकाते थे। आजकल हम रामलीला आदि में उसी रीति पर चमकी या सितारे चिपकाते हैं। स्त्रियाँ अब तक माथे पर इस प्रकार के बुंदे चिपकाती हैं। पत्रभंग शब्द से भी इसी बात का संकेत मिलता है। खैर जो हो, जायसी ने इस पत्रवलिरचना का उल्लेख पद्मावती के श्रृंगार के प्रसंग में (विवाह के उपरान्त प्रथम समागम के अवसर पर) किया है-

रचि पत्रवलि, माँग सेंदुरू। भरे मोति औ मानिक चूरू॥

प्राचीन काल में प्रधान राजमहिषी या पटरानी को ‘पट्टमहादेवी’ कहते थे। यह उस समय की बात है जब क्षत्रिय लोग एक दूसरे को ‘सलाम’ नहीं करते थे और ‘रानी’ शब्द के आगे ‘साहबा’ नहीं लगता था-तब हमारा अपना निज का शिष्टाचार था, फारसी तहजीब की नकल मात्र नहीं। राजा रत्नसेन को चित्तौर से गए बहुत दिन हो जाने पर जब नागमती विरह से व्याकुल होती है तब दासियाँ समझाती है। –

पाट महादेइ! हिये न हारू। समुझि जीउ चित चेत सँभारू॥

यह ‘पाट महादेइ’ शब्द ‘पट्टमहादेवी’ का अपभ्रंश है।

भारतीय ‘वीरपूजा’ का प्रसंग बड़ी मार्मिकता से बड़े सुन्दर अवसर पर जायसी लाए हैं। जिस समय बादल के साथ राजा रत्नसेन छूटकर आता है उस समय पद्मावती बादल की आरती उतारती है-

परसि पायँ राजा के रानी। पुनि आरति बादल कहँ आनी॥
पूजे बादल के भुजदंडा। तुरी के पाँव दाब करखंडा॥
प्राचीन काल में वर्षाऋतु में सब प्रकार की यात्रा बन्द रहती थी। शरद् ऋतु आते ही वणिकों की विदेशयात्रा और राजाओं की युद्धयात्रा होती थी। शरत् के वर्णन में पुराने कवि राजाओं की युद्धयात्रा का भी उल्लेख करते हैं। इसी पुरानी रीति के अनुकूल गोरा बादल प्रतिज्ञा करते समय पद्मिनी से कहते है। –

उए अगस्त हस्ति जब गाजा। नीर घटै, घर आइहि राजा॥
बरसा गए, अगस्त के दीठी। परै पलानि तुरंगन्ह पीठी॥
राजपूतों की भिन्न भिन्न जातियों के बहुत से नाम तो जायसी को मालूम थे पर इस बात का ठीक ठीक पता उन्हें न था कि किस जाति का राज्य कहाँ था। यदि इसका पता होता तो वे रत्नसेन को चौहान न लिखते। रत्नसेन को जब सूली देने के लिए ले जाते थे तब भाँट ने राजा गंधर्वसेन से उनका परिचय इस प्रकार दिया था-

जंबूदीप चित्तउर देसा । चित्रसेन बड़ तहाँ नरेसा॥
रतनसेन यह ताकर बेटा। कुल चौहान जाइ नहिं मेटा॥
यह इतिहासप्रसिद्ध बात है कि चित्तौर में बाप्पा रावल के समय से अन्त तक सिसोदियों का राज्य चला आ रहा है।

मलिक मुहम्मद जायसी