मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत_पार्ट 9

मलिक मुहम्मद जायसी की पद्मावत_पार्ट 9

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वियोग पक्ष////\\\

जायसी का विरहवर्णन कहीं कहीं अत्यन्त अत्युक्तिपूर्ण होने पर भी मजाक की हद तक नहीं पहुँचने पाया है, उसमें गाम्भीर्य बना हुआ है। इनकी अत्युक्तियाँ बात की करामात नहीं जान पड़तीं, हृदय की अत्यन्त तीव्र वेदना के शब्दसंकेत प्रतीत होती हैं। उनके अन्तर्गत जिन पदार्थों का उल्लेख होता है वे हृदयस्थ ताप की अनुभूति का आभास देने वाले होते हैं; बाहर बाहर से ताप की मात्रा नापने वाले मानदण्ड मात्र नहीं। जाड़े के दिनों में भी पड़ोसियों तक पहुँच उन्हें बेचैन करने वाले, शरीर पर रखे हुए कमल के पत्तों को भूनकर पापड़ बना डालने वाले, बोतल का गुलाब जल सुखा डालने वाले ताप से कम ताप जायसी का नहीं है पर उन्होंने उसके वेदनात्मक और दृश्य अंश पर जितनी दृष्टि रखी है उतनी उसकी बाहरी नापजोख पर नहीं जो प्राय: ऊहात्मक हुआ करती है। नाप जोखवाली ऊहात्मक पद्धति का जायसी ने कुछ ही स्थानों पर वियोग किया है। जैसे, राजा की प्रेमपत्रिका के इस वर्णन में –

आखर जरहिं , न काहू छूआ। तब दुख देखि चला लेइ सूआ॥

अथवा नागमती के विरहताप की इस व्यंजना में –

जेहि पंखी के नियर होइ, कहै विरह कै बात।
सोई पंखी जाइ जरि, तरिवर होहि निपात॥
इस ऊहात्मक पद्धति का दो चार जगह व्यवहार चाहे जायसी ने किया हो पर अधिकतर विरहताप के वेदनात्मक स्वरूप की अत्यन्त विशद व्यंजना ही जायसी की विशेषता है। इन्होंने अत्युक्ति की है और खूब की है पर वह अधिकांश संवेदना के स्वरूप में है, परिमाणनिर्देश के रूप में नहीं है। संवेदना का यह स्वरूप उत्प्रेक्षा अलंकार द्वारा व्यक्त किया गया है। अत्युक्ति या अतिशयोक्ति और उत्प्रेक्षा में सिद्ध और साध्‍य का भेद होता है। उत्प्रेक्षा में अध्‍यवसाय साध्‍य (सम्भावना या संवेदना के रूप में) होता है और अत्युक्ति या अतिशयोक्ति में सिद्ध ‘धूप ऐसी है कि रखतेरखते पानी खौल जाता है’ यह वाक्य मात्रा का आधिक्य मात्र सूचित करता है। मात्र के आधिक्य का निरूपण ऊहा द्वारा कुछ चक्कर के साथ भी हो सकता है, जैसा कि बिहारी ने प्राय: किया है। पर यह पद्धति काव्य के लिए सर्वत्र उपयुक्त नहीं। लाक्षणिक प्रयोगों को लेकर कुछ कवियों ने ऊहा का जो विस्तार किया है वह अस्वाभाविक, नीरस और भद्दा हो गया है। वह ‘कुल का दीपक है’ इस बात को लेकर कोई कहे कि ‘उसके घर तेल के खर्च की बिलकुल बचत होती है’ तो इस उक्ति में कवित्व की कुछ भी सरसता न पाई जायगी। बिहारी का ‘पत्र ही तिथि पाइए’ वाला दोहा इसी प्रकार का है। अस्तु, ‘धूप ऐसी है कि रखतेरखते पानी खौल जाता है’ यह कथन ऊहा द्वारा मात्र निरूपण के रूप में हुआ। यही बात यदि इस प्रकार कही जाय कि ‘धूप क्या है, मानो चारों ओर आग बरस रही है’ तो यह संवेदना के रूप में कहा जाना होगा। पहले कथन में ताप की मात्रा का आधिक्य व्यंग्य है, दूसरे में उस ताप से उत्पन्न हृदय की वेदना। एक में वस्तु व्यंग्य है, दूसरे में संवेदना। पहला वाक्य बाह्य वृत्तान्‍त का व्यंजक है और दूसरा आभ्यन्तर अनुभूति का। मतलब यह कि जायसी ने यह कम कहा है कि विरहताप इतनी मात्रा का है, यह अधिक कहा है कि ताप हृदय में ऐसा जान पड़ता है; जैसे-

(क) जानहुँ अगिनि के उठहिं पहारा । औ सब लागहि अंग ऍंगारा॥

(ख) जरत बजागिनी करु, पिउ छाहाँ । आइ बुझाउ ऍंगारन्ह माँहा॥

लागिउँ जरै, जरै जस भारू । फिरि फिरि भूँजेसि तजिउँ न बारू॥

‘फिर फिरि भूँजेसि तजिउँ न बारू।’ भाड़ की तपती बालू के बीच पड़ा हुआ अनाज का दाना जैसे बार बार भूने जाने पर उछल उछल पड़ता है पर उस बालू से बाहर नहीं जाता उसी प्रकार इस प्रेमजन्य सन्ताप के अतिरेक से मेरा जी हट हटकर भी उस सन्ताप के सहने की बुरी लत के कारण उसी की ओर प्रवृत्त रहता है। मतलब यह कि वियुक्त प्रिय का ध्‍यान आते ही चित्त ताप से विह्नल हो जाता है फिर भी वह बार बार उसी का ध्‍यान करता रहता है। प्रेमदशा चाहे घोर यन्त्रणामय हो जाय पर हृदय उस दशा से अलग होना नहीं चाहता। यहाँ इसी विलक्षण स्थिति का चित्रण है। यहाँ हम कवि को वेदना के स्वरूप विश्लेषण में प्रवृत्त पाते हैं, ताप की मात्रा नापने में नहीं। मात्रा की नाप तो बाहर बाहर से भी हो सकती है, पर प्रेमवेदना के आभ्यन्तर स्वरूप की पहचान प्रेमवेदनापूर्ण हृदय में ही हो सकती है। जायसी का ऐसा ही हृदय था। विरहताप का वर्णन कवि ने अधिकतर सादृश्य सम्‍बन्‍ध- मूलक गौणी लक्षणा द्वारा किया है।

आधिक्य या न्यूनता सूचित करने के लिए ऊहात्मक या वस्तुव्यंजनात्मक शैली का विधान कवियों में तीन प्रकार का देखा जाता है-

(1) ऊहा की आधारभूत वस्तु असत्य अर्थात् कवि-प्रौढ़ोक्ति-सिद्ध है।

(2) ऊहा की आधारभूत वस्तु का स्वरूप तो सत्य या स्वत:सम्भवी है और किसी प्रकार की कल्पना नहीं की गई है।

(3) ऊहा की आधारभूत वस्तु का स्वरूप तो सत्य है पर उसके हेतु की कल्पना की गई है।

इनमें से प्रथम प्रकार के उदाहरण वे हैं जिन्हें बिहारी ने विरहताप के वर्णन में दिए हैं -जैसे पड़ोसियों को जाड़े की रात में भी बेचैन करने वाला, या बोतल में भरे गुलाबजल को सुखा डालनेवाला ताप। दूसरे प्रकार का उदाहरण एक स्थल पर जायसी ने बहुत अच्छा दिया है, पर वह विरहताप के वर्णन में नहीं है, काल की दीर्घता के वर्णन में है। आठ वर्ष तक अलाउद्दीन चित्तौड़गढ़ घेरे रहा। इस बात को एक बार तो कवि ने साधारण इतिवृत्त के रूप में कहा, पर उससे वह गोचर प्रत्यक्षीकरण न हो सका जिसका प्रयत्न काव्य करता है। आठ वर्ष की दीर्घता के अनुमान के लिए फिर उसने यह दृश्य आधार सामने रखा-

आइ साह अमराव जो लाए । फरे, झरे पर गढ़ नहीं पाए ॥

सच पूछिए तो वस्तु व्यंजनात्मक या ऊहात्मक पद्धति का इसी रूप में अवलम्बन सबसे अधिक उपयुक्त जान पड़ता है। इसमें अनुमान का आधार सत्य या स्वत: सम्भवी है। जायसी अनुमान या ऊहा के आधार के लिए ऐसी वस्तु सामने लाए हैं जिसका स्वरूप प्राकृतिक है और जिससे सामान्यत: सब लोग परिचित होते हैं। इसी प्रकार एक गीत में एक वियोगिन नायिका कहती है कि ‘मेरा प्रिय दरवाजे पर जो नीम का पेड़ लगा गया था वह बढ़कर अब फूल रहा है, पर प्रिय न लौटा।’ आधार के सत्य और प्राकृतिक स्वरूप के कारण इस उक्ति से कितना भोलापन बरस रहा है।

विरहताप की मात्रा का आधिक्य सूचित करने के लिए जहाँ कहीं जायसी ने ऊहात्मक या वस्तुव्यंजनात्मक शैली का अवलम्बन किया है वहाँ अधिकतर तीसरे प्रकार का विधान ही देखने में आता है जिसमें ऊहा की आधारभूत वस्तु का स्वरूप तो सत्य और स्वत:सम्भवी होता है पर उसके हेतु की कुछ और ही कल्पना की जाती है। इस प्रकार का विधान भी प्रथम प्रकार के विधान से अधिक उपयुक्त होता है। इसमें हेतूत्प्रेक्षा का सहारा लिया जाता है जिसमें ‘अप्रस्तुत’ वस्तुओं का गृहीत दृश्य वास्तविक होता है, केवल उसका हेतु कल्पित होता है। हेतु परोक्ष हुआ करता है इससे उसकी अतथ्यता सामने आकर प्रतीति में बाधा डालती नहीं जान पड़ती। इस युक्ति के कवि विरहताप के प्रभाव की व्यापकता को बढ़ाता बढ़ाता सृष्टि भर में दिखा देता है। एक उदाहरण काफी होगा-

अस परजरा विरह कर गठा । मेघ साम भए धूम जो उठा ॥
दाढ़ा राहु केतु गा दाधा । सुरुज जरा, चाँद जरि आधा ॥
औ सब नखत तराईं जरहीं । टूटहिं लूक, धारति महँ परहीं ॥
जरै सो धारती ठावहिं ठाऊँ । दहकि पलास जरै तेहि दाऊँ॥
इन चौपाइयों में मेघों का श्याम होना, राहु, केतु का काला (झुलसा-सा) होना, सूर्य का तपना, चन्द्रमा की कला का खण्डित होना, पलाश के फूलों का लाल (दहकते अंगारे-सा) होना आदि सत्य हैं। वे विरहताप के कारण ऐसे हैं, केवल यह बात कल्पित है।

ताप के अतिरिक्त विरह के और और अंगों का भी विन्यास जायसी ने इसी हृदयहारिणी और व्यापकत्वविधायिनी पद्धति पर बाह्य प्रकृति को मूल आभ्यन्तर जगत् का प्रतिबिम्ब सा दिखाते हुए किया है। काम हेतूत्प्रेक्षा से लिया गया है। प्रेमयोगी रत्नसेन के विरहव्यथित हृदय का भाव हम सूर्य, चन्द्र, वन के पेड़, पक्षी, पत्थर, चट्टान सबमें देखते चलते है। –

रोवँ रोवँ वै बान जो फूटे । सूतहि सूत रुहिर मुख छूटे॥
नैनहिं चली रकत कैधा । कंथा भीजि भएउ रतनारा॥
सूरूज बूड़ि उठा होइ ताता । औ मजीठ टेसू बन राता॥
भा बसन्त , रातीं बनसपती । औ राते सब जोगी जती॥
भूमि जो भीजि भएउ सब गेरू । औ राते तहँ पंखि पखेरू॥
राती सती, अगिनि सब काया । गगन मेघ राते तेहि छाया॥
ईंगुर भा पहार जौ भीजा । पै तुम्हार नहिं रोवँ पसीजा॥
इस प्रकार नागमती के ऑंसुओं से सारी सृष्टि भीगी हुई जान पड़ती है-

कुहुकि कुहुकि जस कोइल रोई । रकत ऑंसु घुँघची बन बोई॥
जहँ जहँ ठाढ़ि होइ बनवासी । तहँ तहँ होइ घुँघची कै रासी॥
बूँद बूँद महँ जानहुँ जीऊ । गूँजा गुंजि करै, ‘पिउ पीऊ’॥
तेहि दुख भए परास निपाते । लोहू बूड़ि उठे होइ राते॥
राते बिंब भीजि तेहि लोहू । परवर पाक, फाट हिय गोहूँ॥
विरहवर्णन में भक्तवर सूरदासजी ने भी गोपियों के हृदय के रंग में बाह्य प्रकृति को रँगा है। एक स्थान पर तो गोपियों ने उन उन पदार्थों को कोसा है जो उस रंग से कोरे दिखाई पड़े हैं –

मधुबन ! तुम कत रहत हरे?
विरह वियोग स्यामसुन्दर के, ठाढ़े क्यों न जरे।
कौन काज ठाढ़े रहे बन में, काहे न उकठि परे।
नागमती का विरहवर्णन हिन्दी साहित्य में एक अद्वितीय वस्तु है। नागमती उपवनों के पेड़ों के नीचे रात भर रोती फिरती है। इस दशा में पशु, पक्षी, पेड़, पल्लव जो कुछ सामने आता है उसे वह अपना दुखड़ा सुनाती है। वह पुण्यदशा धान्य है जिसमें ये सब अपने सगे लगते हैं और यह जान पड़ने लगता है कि इन्हें दु:ख सुनाने से भी जी हल्का होगा। सब जीवों का शिरोमणि मनुष्य और मनुष्यों का अधीश्वर राजा! उसकी पटरानी, जो कभी बड़े बड़े राजाओं और सरदारों की बातों की ओर भी ध्‍यान न देती थी, वह पक्षियों से अपने हृदय की वेदना कह रही है, उनके सामने अपना हृदय खोल रही है। हृदय की इस उदार और व्यापक दशा का कवियों ने केवल प्रेमदशा के भीतर ही वर्णन किया है, यह बात ध्‍यान देने योग्य है। मारने के लिए शत्रु का पीछा करता हुआ क्रोधातुर मनुष्य पेड़ों और पक्षियों से यह पूछता हुआ कहीं नहीं कहा गया है कि ‘भाई! किधर गया?’ वाल्मीकि, कालिदास आदि से लेकर जायसी, सूर, तुलसी आदि भाषाकवियों तक सबने इस दशा का सन्निवेश विप्रलम्भ (या कहीं कहीं करुण) में ही किया है। वाल्मीकि के राम सीताहरण होने पर वन वन पूछते फिरते है –

‘हे कदम्ब! तुम्हारे फूलों से अधिक प्रीति रखने वाली मेरी प्रिया को यदि जानते हो तो बताओ। हे बिल्ववृक्ष! यदि तुमने उस पीतवस्त्रधारिणी को देखा हो तो बताओ। हे मृग! उस मृगनयनी को तुम जानते हो?’

इसी प्रकार तुलसी के राम भी वन के पशुपक्षियों से पूछते हैं –

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम देखी सीता मृगनैनी॥

कालिदास का यक्ष भी चेतनाचेतन भेद इसी प्रेमदशा के ही भीतर भूला है। इससे यह सिद्ध है कि कवि परम्परा के बीच यह एक मान्य परिपाटी है कि इस प्रकार की दशा का वर्णन प्रेमदशा के भीतर ही हो।

इस सम्‍बन्‍ध में मामूली तौर पर तो इतना ही कहना काफी समझा जाता है कि ‘उन्माद’ की व्यंजना के लिए इस प्रकार का आचरण दिखाया जाता है। ‘उन्माद’ ही सही पर एक खास ढर्रे का है। इसका आविर्भाव प्रेमताप से पिघलकर फैले हुए हृदय में ही होता है। सम्‍बन्‍ध का मूल प्रेम है, अत: प्रेमदशा के भीतर ही मनुष्य का हृदय उस सम्‍बन्‍ध का आभास पाता है जो पशु, पक्षी, द्रुम, लता आदि के साथ अनादि काल से चला आ रहा है।

नागमती उपवनों में रोती फिरती है। उसके विलाप से घोंसलों में बैठे हुए पक्षियों की नींद हराम हो गई है-

फिरि फिरि रोव, कोइ नहीं डोला । आधी रात विहंगम बोला॥
तू फिरि फिरि दाहै सब पाँखी । केहि दुख रैनि न लावसि ऑंखी॥
और कवियों ने पशुपक्षियों को सम्बोधान भर करने का उल्लेख करके बात और आगे नहीं बढ़ाई है जिससे ऊपर से देखने वालों का ध्‍यान ‘उन्माद’ की दशा ही तक रह जाता है। पर जायसी ने जिस प्रकार मनुष्य के हृदय में पशु पक्षियों से सहानुभूति प्राप्त करने की सम्भावना की है, उसी प्रकार पक्षियों के हृदय में सहानुभूति के संचार की भी। उन्होंने सामान्य हृदयतत्त्व की सृष्टिव्यापिनी भावना द्वारा मनुष्य और पशुपक्षी सबको एक जीवन सूत्र में बद्ध देखा है। राम के प्रश्न का खग, मृग और मधुकर कुछ जवाब नहीं देते। राजा पुरुरवा कोकिल, हंस इत्यादि को पुकारता ही फिरता है, पर कोई सहानुभूति प्रकट करता नहीं दिखाई पड़ता (विक्रमोर्वशीय अंक 4) पर नागमती की दशा पर एक पक्षी को दया आती है-वह उसके दु:ख का कारण पूछता है। नागमती उस पक्षी से कहती है-

चारिउ चक्र उजार भए, कोई न सँदेसा टेक।
कहौं विरह दुख आपन, बैठि सुनहू दंड एक॥
इस पर वह पक्षी सन्देशा ले जाने को तैयार हो जाता है।

पद्मावती से कहने के लिए नागमती ने जो सन्देशा कहा है, वह अत्यन्त मर्मस्पर्शी है। उसमें मान, गर्व आदि से रहित, सुखभोग की लालसा से अलग, अत्यन्त नम्र, शीतल और विशुद्ध प्रेम की झलक पाई जाती है-

पद्मावती सौ कहेहु , बिहंगम । कंत लोभाइ रही करि संगम॥
तोहि चैन सुख मिलै सरीरा । मो कहँ दिए दुन्द दुख पूरा॥
हमहुँ बिआही सँग ओहि पीऊ । आपुहिं पाइ, जानु पर जीऊ॥
मोहि भोग सौं काज न बारी । सौंह दिस्टि कै चाहनहारी॥
मनुष्य के आश्रित, मनुष्य के पाले हुए, पेड़ पौधों किस प्रकार मनुष्य के सुख से सुखी और दु:ख से दु:खी दिखाई देते हैं, यह दृश्य बड़े कौशल और बड़ी सहृदयता से जायसी ने दिखाया है। नागमती की विरहदशा में उसके बाग बगीचों में उदासी बरस रही थी। पेड़ पौधो सब मुरझाए पड़े थे। उनकी सुध कौन लेता है? पर राजा रत्नसेन के चित्तौर लौटते ही-

पलुही नागमती कै बारी । सोने फूल फूलि फुलवारी॥
जावत पंखि रहे सब दहे । सबै पंखि बोले गहगहे॥
जब पेड़ पौधे सूख रहे थे तब पक्षी भी आश्रय न पाकर ताप से झुलस रहे थे। इस प्रकार नागमती की वियोगदशा का विस्तार केवल मनुष्य जाति तक ही नहीं, पशु पक्षियों और पेड़ पौधों तक दिखाई पड़ता था। कालिदास ने पाले हुए मृग और पौधों के प्रति शकुन्तला का स्नेह दिखाकर इसी व्यापक और विशद भाव की व्यंजना की है।

विप्रलम्भ श्रृंगार ही ‘पद्मावत’ में प्रधान है। विरहदशा के वर्णन में जहाँ कवि ने भारतीय पद्धति का अनुसरण किया है, वहाँ कोई अरुचिकारक बीभत्स दृश्य नहीं आया है। कृशता, ताप, वेदना आदि के वर्णन में भी उन्होंने श्रृंगार के उपयुक्त वस्तु सामने रखी है, केवल उसके स्वरूप में कुछ अन्तर दिखा दिया है। जो पद्मिनी स्वभावत: पद्मिनी के समान विकसित रहा करती थी वह सूखकर मुरझाई हुई लगती है-

कँवल सूख, पखुरी बेहरानी । गलि गलि कै मिलि छार हेरानी॥

इस रूप में प्रदर्शित व्यक्ति के प्रति सहानुभूति और दया का पूरा अवसर रहता है। पाठक उसकी दशा व्यंजित करने वाली वस्तु की ओर कुछ देर दृष्टि गड़ाकर देख सकते हैं। मुरझाया फूल भी फूल ही है। अतीत सौन्दर्य के स्मरण से भाव और उद्दीप्त होता है। पर उसके स्थान पर यदि चीरकर हृदय का खून, नसें और हड्डियाँ आदि दिखाई जायँ तो दया होते हुए भी इन वस्तुओं की ओर दृष्टि जमाते न बनेगा।

विरहदशा के भीतर ”निरवलम्बता” की अनुभूति रह रहकर विरही को होती है। देखिए, कैसा परिचित और साधारण प्राकृतिक व्यापार सामने रखकर कवि ने इस ‘निरवलम्बता’ का गोचर प्रत्यक्षीकरण किया है-

आवा पवन बिछोह कर पात परा बेकरार।
तरिवर तजा जो चूरि कै लागै केहि के डार॥
‘लागै केहि के डार’ मुहावरा भी बहुत अच्छा आया है।

‘पद्मावत’ में यद्यपि हिन्दू जीवन के परिचायक भावों की ही प्रधानता है, पर बीच बीच में फारसी साहित्य द्वारा घोषित भावों के भी छींटे कहीं कहीं मिलते हैं। विदेशीय प्रभाव के कारण वियोगदशा के वर्णन में कही कहीं बीभत्स चित्र सामने आ जाते हैं; जैसे ‘कबाबे सींक’ वाला यह भाव-

विरह सरागन्हि भूँजै माँसू । गिरि गिरि परै रकत कै ऑंसू॥
कटि कटि माँसु सराग पिरोवा । रकत के ऑंसु माँसु सब रोवा॥
खिन एक बार माँसु अस भूँजा । खिनहिं चबाइ सिंघ अस गूँजा॥
वियोग में इस प्रकार के बीभत्स दृश्य का समावेश जायसी ने जो किया है वह तो किया ही है, संयोग के प्रसंग में भी वे एक स्थान पर ऐसा ही बीभत्स चित्र सामने लाए हैं। बादल जब अपनी नवागत वधू की ओर से दृष्टि फेर लेता है, तब वह सोचती है कि क्या मेरे कटाक्ष तो उसके हृदय को बेधकर पीठ की ओर नहीं जा निकले हैं। यदि ऐसा है तो तूँबी लगाकर मैं उसे खींच लूँ और जब वह पीड़ा से चौंककर मुझे पकड़े तो गहरे रस से उसे धो डालूँ-

मकु पिउ दिस्टि समानेउ सालू । हुलसी पीठि कढ़ावौं फालू॥
कुच तूँबी अब पीठि गड़ोवौं । गहै जो हूकि, गाढ़ रस धोवौं॥
कटाक्ष या नेत्रों को ‘अनियारे’, ‘नुकीले’ तक कह देना तो ठीक है, पर ऊहात्मक या वस्तुव्यंजनात्मक पद्धति पर इस कल्पना को और आगे बढ़ाकर शरीर पर सचमुच घाव आदि दिखाने लगना काव्य की सीमा के बाहर जाना है, जैसा कि एक कविजी ने किया है-

काजर दे नहिं , एरी सुहागिनि! ऑंगुरी तेरी कटैगी कटाछन।

यदि कटाक्ष से उँगली कटने का डर है तब तो तरकारी चीरने या फल काटने के लिए छुरी, हँसिया आदि की कोई जरूरत न होनी चाहिए। कटाक्ष मन में चुभते हैं न कि प्रत्यक्ष शरीर पर घाव करते हैं।

विरहजन्य कृशता के वर्णन में जायसी ने कविप्रथानुसार पूरी अत्युक्ति की है, पर उस अत्युक्ति में भी गम्भीरता बनी हुई है, वह खेलवाड़ या मजाक नहीं होने पाई है। बिहारी की नायिका इतनी क्षीण हो गई है कि जब साँस खींचती है तब उसके झोंके से चार कदम पीछे हट जाती है और जब साँस निकालती है तब उसके साथ चार कदम आगे बढ़ जाती है। घड़ी के पेंडुलम की सी दशा उसकी रहती है। इसी प्रकार उर्दू के एक शायर साहब ने आशिक को जूँ या खटमल का बच्चा बना डाला-

इन्तहाए लागरी से जब नजर आया न मैं।
हँस के वो कहने लगे, बिस्तर को झाड़ा चाहिए॥
पर जायसी का यह वर्णन सुन हृदय द्रवीभूत होता है, हँसी नहीं आती-

दहि कोइला भइ कन्त सनेहा । तोला माँसु रहा नहिं देहा॥
रकत न रहा बिरह तन जरा । रती रती होइ नैनन्ह ढरा॥
हाड़ भए सब किंगरी, नसै भई सब ताँति।
रोवँ रोवँ ते धुनि उठै, कहौं बिथा केहि भाँति॥
इसी नागमती के विरहवर्णन के अन्तर्गत वह प्रसिद्ध बारहमासा है जिसमें वेदना का अत्यन्त निर्मल और कोमल स्वरूप, हिन्दू दाम्पत्य जीवन का अत्यन्त मर्मस्पर्शी माधुर्य, अपने चारों ओर की प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों के साथ विशुद्ध भारतीय हृदय की साहचर्य भावना तथा विषय के अनुसार भाषा का अत्यन्त स्निग्ध, सरल मृदुल और अकृत्रिम प्रवाह देखने योग्य है। पर इन कुछ विशेषताओं की ओर ध्‍यान जाने पर भी इसके सौन्दर्य का बहुत कुछ हेतु अनिर्वचनीय रह जाता है। इस बारहमासे में वर्ष के बारह महीनों का वर्णन विप्रलम्भ श्रृंगार के उद्दीपन की दृष्टि से है जिसमें आनन्दप्रद वस्तुओं का दु:खप्रद होना दिखाया जाता है, जैसा कि मंडन कवि ने कहा है-

जेइ जेइ सुखद , दुखद अब तेइ तेइ, कवि मंडन बिछुरत जदुपत्ती।

प्रेम में सुख और दु:ख दोनों की अनुभूति की मात्रा जिस प्रकार बढ़ जाती है उसी प्रकार अनुभूति के विषयों का विस्तार भी। संयोग की अवस्था में जो प्रेम सृष्टि की सब वस्तुओं से आनन्द का संग्रह करता है वही वियोग की दशा में सब वस्तुओं में दु:ख का संग्रह करने लगता है। इसी दु:खद रूप में प्रत्येक मास की उन सामान्य प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों का वर्णन जायसी ने किया है जिनके साहचर्य का अनुभव मनुष्यमात्र-राजा से लेकर रंक तक-करते हैं। अत: इस बारहमासे में मुख्यत: दो बातें देखने की है। –

(1) प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों का दिग्दर्शन।

(2) दु:ख के नाना रूपों और कारणों की उभावना।

प्रथम के सम्‍बन्‍ध में यह जान लेना चाहिए कि प्राचीन संस्कृत कवियों का सा संश्लिष्ट विशद चित्रण उद्दीपन की दृष्टि से किए हुए ऋतुवर्णन में नहीं हुआ करता, केवल वस्तुओं और व्यापारों की अलग अलग झलक भर दिखाकर प्रेमी के हृदय की अवस्था की व्यंजना हुआ करती है। परिचित प्राकृतिक दृश्यों को साहचर्य द्वारा और कवियों की वाणी द्वारा जो मर्मस्पर्शी प्रभाव प्राप्त है, उसका अनुभव उनकी ओर संकेत करने मात्र से भी सहृदयों को हो जाता है। इस प्रकार बहुत ही सुन्दर संकेत-बहुत ही मनोहर झलक-इस बारहमासे में हम पाते हैं। कुछ उदाहरण लीजिए-

चढ़ा असाढ़, गगन घन गाजा । साजा बिरह ,दुंद दल बाजा॥
धूम, साम धौरे घन धाए । सेत धजा बगपाँति देखाए॥
खड़ग बीजु चमकै चहुँ ओरा । बुन्दबान बरिसहिं चहुँ ओरा॥
बाट असूझ अथाह गँभीरी । जिउ बाउर भा फिरै भँभीरी॥
जग जल बूड़ जहाँ लगि ताकी । मोरि नाव खेवक बिनु थाकी॥
जेठ जरै जग चलै लुवारा । उठिहिं बवंडर परहिं ऍंगारा॥
उठै आगि औ आवै ऑंधी । नैन न सूझ मरौं दुख बाँधी॥
अपनी भावुकता का बड़ा भारी परिचय जायसी ने इस बात में दिया है कि रानी नागमती विरहदशा में अपना रानीपन बिलकुल भूल जाती है और अपने को केवल साधारण स्‍त्री के रूप में देखती है। इसी सामान्य स्वाभाविक वृत्ति के बल पर उसके विरहवाक्य छोटे बड़े सबके हृदय को समान रूप में स्पर्श करते हैं। यदि कनक पर्यंक, मखमली सेज, रत्नजटित अलंकार, संगमरमर के महल, खसखाने इत्यादि की बातें होतीं तो वे जनता के एक बड़े भाग के अनुभव से कुछ दूर की होतीं। जायसी ने स्‍त्री जाति की या कम से कम हिन्दू गृहिणी मात्र की सामान्य स्थिति के भीतर विप्रलम्भ श्रृंगार के अत्यन्त समुज्ज्वल रूप का विकास दिखाया है। देखिए चौमासे में स्वामी के न रहने से घर की जो दशा होती है वह किस प्रकार गृहिणी के विरह का उद्दीपन करती है-

पुष्य नखत सिर ऊपर आवा । हौं बिनु नाह , मँदिर को छावा॥

इसी प्रकार शरीर का रूपक देकर बरसात आने पर साधारण गृहस्थों की चिन्ता और आयोजना की झलक दिखाई गई है-

तपै लागि अब जेठ असाढ़ी । मोहि पिउ बिन छाजनि भइ गाढ़ी॥
तन तिनउर भा, झूरौं खरी । भइ बरखा, दुख आगरि जरी॥
बंधा नाहिं औ कंधा न कोई । बात न आव, कहौं का रोई॥
साँठि नाँठि,जग बात को पूछा । बिनु जिउ फिरै मूँज तनु छूछा॥
भई दुहेली टेक बिहूनी । थाँभ नाहिं, उठि सकै न थूनी॥
बरसै मेह, चुवहिं नैनाहा । छपर छपर होइ रहि बिनु नाहा॥
कोरौ कहाँ , ठाट नव साजा । तुम बिनु कंत न छाजनि छाजा॥
यह आशिक माशूकों का निर्लज्ज प्रलाप नहीं है; यह हिन्दू गृहिणी की विरहवाणी है। इसका सात्त्विक मर्यादापूर्ण माधुर्य परम मनोहर है।

यद्यपि इस बारहमासे में प्राकृतिक वस्तुओं और व्यापारों की रूढ़ि के अनुसार अलग अलग झलक भर दिखाई गई है, उनका संश्लिष्ट चित्रण नहीं है, पर एक आध जगह कवि का अपना निरीक्षण भी बहुत सूक्ष्म और सुन्दर है जिसका उल्लेख वस्तुवर्णन के अन्तर्गत किया जाएगा।

अब दु:ख के नाना रूपों और कारणों की उद्भावना लीजिए। जायसी के विरहोद्गार अत्यन्त मर्मस्पर्शी हैं। जायसी को हम विप्रलम्भ श्रृंगार का प्रधान कवि कह सकते हैं। जो वेदना, जो कोमलता, जो सरलता और जो गम्भीरता इनके वचनों में है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। नागमती सब जीव जन्तुओं, पशुपक्षियों में सहानुभूति की भावना करती हुई कहती है-

पिउ सों कहेउ सँदेसड़ा, हे भौंरा ! हे काग !
सो धनि बिरहै जरि मुई, तेहि क धुवाँ हम्ह लाग॥
इस सहानुभूति की सम्भावना रानी के हृदय में होती कैसे है? यह समझकर होती है कि भौंरा और कौवा दोनों उसी विरहाग्नि के धुएँ से काले हो गए हैं जिसमें मैं जल रही हूँ। सम दु:खभोगियों में परस्पर सहानुभूति का उदय अत्यन्त स्वाभाविक है। ‘सँदेसड़ा’ शब्द में स्वार्थे ‘ड़ा’ का प्रयोग भी बहुत उपयुक्त है। ऐसा शब्द उस दशा में मुँह से निकलता है जब हृदय प्रेम, माधुर्य, अल्पता, तुच्छता, आदि में से कोई भाव लिए हुए होता है। ‘हे भौंरा! हे काग!’ से एक एक को अलग अलग सम्बोधन करना सूचित होता है। आवेग की दशा में यही उचित है। ‘हे भौंरा औ काग’ कहने में यह बात न होती।

दु:ख और आधद की दशा में एक बड़ा भारी भेद है। जब हृदय दु:ख में मग्न रहता है तब सुखद और दु:खद दोनों प्रकार की वस्तुओं से दु:ख का संग्रह करता है। पर आनन्द की दशा का पोषण केवल सामान्य या आनन्ददायक वस्तुओं से ही होता है, दु:खप्रद वस्तुओं से नहीं। विरहदशा दु:खदशा है। इसमें कष्टदायक वस्तुएँ तो और भी कष्टदायक हो ही जाती हैं, जैसे-

(क) काँपै हिया जनावै सीऊ । तो पै जाइ होइ सँग पीऊ॥

पहल पहल तन रूई झाँपै । हहरि हहरि अधिकौ हिय काँपै॥

(ख) चारिहु पवन झकोरै आगी । लंका दाहि पलंका लागी॥

उठै आगि औ आवै ऑंधी । नैन न सूझ, मरौं दु:ख बाँधी॥

सुखदायक वस्तुएँ भी दु:ख को बढ़ाती हैं, जैसे-

कातिक सरद चंद उजियारी । जग सीतल हौं बिरहै जारी॥
चौदह करा चाँद परगासा । जनहुँ जरै सब धरति अकासा॥
तन, मन, सेज जरै अगिदाहू । सब कहँ चंद भयहू मोहिं राहू॥
कहीं संयोगसुख या आनन्दोत्सव देखकर अपने पक्ष में उसके अभाव की भावना से विरह की आग और भी भड़कती है-

(क) अबहूँ निठुर आउ एहिंबारा । परब देवारी होइ सँसारा॥

सखि झूमुक गावैं अंग मोरी । हौं झुरावँ , बिछुरी मोरी जोरी ॥

(ख) करहिं बनसपति हिये हुलासू । मोकहँ भा जग दून उदासू॥

फागु करहिं सब चाँचरि जोरी । मोहिं तन लाइ दीन्हि जस होरी ॥

नागमती देखती है कि बहुतों के बिछुड़े हुए प्रिय मित्र आ रहे हैं पर मेरे प्रिय नहीं आ रहे हैं। इस वैषम्य की भावना उसे और भी व्याकुल करती है। किसी वस्तु के अभाव से दु:खी मनुष्य के हृदय की यह एक अत्यन्त स्वाभाविक वृत्ति है। पपीहे का प्रिय पयोधर आ गया, सीप के मुँह में स्वाति की बूँद पड़ गई, पर नागमती का प्रिय न आया-

चित्रा मित्र मीन कर आवा । पपिहा पीउ पुकारत पावा॥
स्वाति बूँद चातक मुख परे । समुद्र सीप मोती सब भरे॥
सरवर सँवरि हंस चलि आए । सारस कुरलहिं खँजन देखाए॥
विरह का दु:ख ऐसा नहीं कि चारों ओर जो वस्तुएँ दिखाई पड़ती हैं उनसे कुछ जी बहले। उनसे तो और भी अपनी दशा की ओर विरही का ध्‍यान जाता है, और उस दशा का दु:सह स्वरूप स्पष्ट होता है-चाहे वे उसकी दु:खदशा से भिन्न दशा में दिखाई पड़ें, चाहे कुछ सादृश्य लिए हुए। भिन्न भाव में दिखाई पड़ने वाली वस्तुओं के नमूने तो ऊपर के उदाहरणों में आ गए हैं। अब भिन्न भिन्न ऋतुओं की नाना वस्तुओं और व्यापारों को विरही लोग किस प्रकार सादृश्यभावना द्वारा अपनी दशा की व्यंजना का सुलभ साधन बनाया करते हैं, यह भी देखिए-

बरसै मघा झकोरि झकोरी । मोर दुइ नैन चुवैं जस ओरी॥
पुरवा लाग, भूमि जल पूरी । आक जवास भई तस झूरी॥
सखिन्ह रचा पिउ संग हिंडोला । हरियर भूमि, कुसुंभी चोला॥
हिय हिंडोल अस डोलै मोरा । विरह झुलाई देइ झकझोरा॥
तन जस पियर पात भा मोरा । तेहि पर विरह देह झकझोरा॥
विरहिणी की इस सादृश्य भावना का वर्णन कविपरम्परासिद्ध है। सूरदास का ‘निसि दिन बरसत नैन हमारे’ यह पद प्रसिद्ध है। और कवियों ने भी ऋतुसुलभ वस्तुओं और व्यापारों के साथ विरहिणी के तन और मन की दशा का सादृश्यवर्णन किया है। यह सादृश्यकथन अत्यन्त स्वाभाविक होता है, क्योंकि इसमें उपमान ऊहा द्वारा सोचकर निकाला हुआ नहीं होता बल्कि सामने प्रस्तुत रहता है, और प्रस्तुत रहकर उपमेय की ओर ध्‍यान ले जाता है। बैशाख में विरहिणी एक ओर सूखते तालों की दरारों को देखती है, दूसरी ओर विदीर्ण होते हुए अपने हृदय को। बरसात में वह एक ओर तो टपकती हुई ओलती देखती है, दूसरी ओर अपने ऑंसुओं कीधा । एक ओर सूखे हुए ‘आक जवास’ को देखती है, दूसरी ओर अपने शरीर को। शिशिर में एक ओर सूखकर झड़े हुए पीले पत्तों को देखती है, दूसरी ओर अपनी पीली पड़ी देह को। अत: उक्त उपमाएँ ‘दूर की सूझ’ नहीं हैं। उनमें सादृश्य बहुत सोचा विचारा हुआ नहीं है, उनका उदय विरहविह्नल अन्त:करण में बिना प्रयास हुआ है। दो उपस्थित वस्तुओं में सादृश्य की ऐसी स्वाभाविक भावना संस्कृत कवियों ने बहुत अच्छी की है। कालिदास का यह श्लोक ही लीजिए-

स पाटलायां गवि तस्थिवांसं धनुर्धर : केसरिणं ददर्श।
अधित्यकायामिव धातुमय्यां लोध्रदुमं सानुमत : प्रफुल्लम्॥
(रघु. 2-29)

इस बारहमासे में हृदय के वेग की व्यंजना अत्यन्त स्वाभाविक रीति से होने पर भी भाव अत्यन्त उत्कर्ष दशा को पहुँचे हुए दिखाए गए हैं। देखिए, अभिलाष का यहाँ कैसा उत्कर्ष है-

रात दिवस बस यह जिउ मोरे । लगौं निहोर कन्त अब तोरे॥

यह तन जारौं छार कै कहौं कि पवन उड़ाव।
मकु तेहि मारग उड़ि परै, कँत धारै जहँ पाव॥

संयोग श्रृंगार

यद्यपि ‘पद्मावत’ में वियोग श्रृंगार ही प्रधान है, पर संयोग श्रृंगार का भी पूरा वर्णन हुआ है। जिस प्रकार ‘बारहमासा’ विप्रलम्भ के उद्दीपन की दृष्टि से लिखा गया है, उसी प्रकार षड्ऋतु वर्णन संयोग श्रृंगार के उद्दीपन की दृष्टि से। राजा रत्नसेन के साथ संयोग होने पर पद्मावती को पावस की शोभा का कैसा अनुभव हो रहा है-

पदमावति चाहत ऋतु पाई । गगन सोहावन भूमि सोहाई॥
चमक बीजु, बरसै जल सोना । दादुर मोर सबद सुठि लोना॥
रंगराती पीतम सँग जागी । गरजै गगन चौंकि गर लागी॥
सीतल बूँद ऊँच चौपारा । हरियर सब देखाइ संसारा॥
नागमती को जो बूँदें विरह दशा में बाण की तरह लगती हैं, पद्मावती को संयोग दशा में वे ही बूँदें कौंधे की चमक में सोने की सी लगती हैं। मनुष्य के आनंद या दु:ख के रंग में रँगी हुई प्रकृति को ही जायसी ने देखा है, स्वतन्त्र रूप में नहीं। यह षड्ऋतुवर्णन रूढ़ि के अनुसार ही है। इसमें आनंदोत्सव और सुखसम्भोग आदि का कविप्रथानुसार वर्णन है।

विवाह के उपरान्त पद्मावती और रत्नसेन के समागम का वर्णन कवि ने विस्तार के साथ किया है। ऐसे अवसर के उपयुक्त पहले कवि ने कुछ विनोद का विधान किया है। सखियाँ पद्मावती को छिपा देती हैं और राजा उससे मिलने के लिए आतुर होता है। पर इस विधान में जायसी को सफलता नहीं हुई है। विनोद का कुछ भाव उत्पन्न होने के पहले ही रसायनियों की परिभाषाएँ आ दबाती हैं। सखियों के मुँह से ‘धातु कमाय सिखे तै जोगी’ सुनते ही राजा धातुवादियों की तरह बर्राने लगता है जिसमें पाठक या श्रोता का हृदय कुछ भी लीन नहीं होता। कवियों के बहुज्ञताप्रदर्शन की जो प्रवृत्ति कुछ दिनों से चल पड़ी, उसके कारण कवियों के प्रबन्धश्रित भावप्रवाह में कहीं कहीं बेतरह बाधा पड़ी है। प्रथम समागम के रसरंग प्रवाह के बीच ‘पारे, गंधक और हरताल’ का प्रसंग अनुकूल नहीं पड़ता। यदि प्रसंग अनुकूल हो तो उसका समावेश रसधा के बाहर नहीं लगता, जैसा कि इसी समागम के प्रसंग में ‘सोलह श्रृंगार’ और ‘बारह आभरण’ का वर्णन। यह वर्णन नायिका अर्थात् आलम्बन की रूपभावना में सहायक होता है। फिर भी वस्तुओं की गिनती से पाठक या श्रोता का जी अवश्य ऊबता है।

इस प्रकार के कुछ बाधक प्रसंगों के होते हुए भी वर्णन अत्यन्त रसपूर्ण है। पद्मावती जिस समय श्रृंगार करके राजा के पास जाती है उस समय कवि कैसा मनोहर चित्र खड़ा करता है-

साजन लेइ पठावा , आयसु जाइ न मेंट।
तन, मन, जोबन साजि कै देइ चली लेइ भेंट॥
इस दोहे में तन, मन और यौवन तीनों का अलग अलग उल्लेख बहुत ही सुन्दर है। मन का सजाना क्या है? समागम की उत्कंठा या अभिलाष। बिना इस मन की तैयारी के तन की सब तैयारी व्यर्थ हो जाती है। देखिए, प्रिय के पास गमन करते समय कविपरम्परा के अनुसार शेष सृष्टि से चुनकर सौन्दर्य का कैसा संचार कैसी सीधी- सादी भाषा में किया गया है-

पदमिनि गवन हंस गए दूरी । कुंजर लाज मेल सिर धूरी॥
बदन देख घटि चंद समाना । दसन देखि कै बीजु लजाना॥
खंजन छपे देखि कै नैना । कोकिल छपी सुनत मधु बैना॥
पहुँचहि छपी कँवल पौनारी । जाँघ छपा कदली होइ बारी॥
संयोगवर्णन में जायसी पहले तो सहसा सौन्दर्य के साक्षात्कार से हृदय के उस आनन्दसम्मोहन का वर्णन करते हैं जो मूर्च्‍छा की दशा तक पहुँचा हुआ जान पड़ता है। फिर राजा अपने दु:ख की कहानी और प्रेममार्ग में अपने ऊपर पड़े हुए संकट का वर्णन करके प्रेममार्ग की उस सामान्य प्रवृत्ति का परिचय देता है जिसके अनुसार प्रेमी अपने प्रियतम के हृदय में अपने ऊपर दया तथा करुणा का भाव जाग्रत करने का बराबर प्रयत्न किया करता है। इसी प्रवृत्ति की उत्कर्षव्यंजना के लिए फारसी या उर्दू शायरी में मुर्दे अपना हाल सुनाया करते हैं। सबसे बड़ा दु:ख होने के कारण ‘मरणदशा’ के प्रति सबसे अधिक दया या करुणा का उद्रेक स्वभावसिद्ध है। शत्रु तक का मरण सुनकर सहानुभूति का एक-आधा शब्द मुँह से निकल ही जाता है। प्रिय के मुख से सहानुभूति के वचन का मूल्य प्रेमियों के निकट बहुत अधिक होता है। ‘बेचारा बहुत अच्छा था’, प्रिय के मुख से इस प्रकार के शब्दों की सम्भावना ही पर वे अपने मर जाने की कल्पना बड़े आनन्द से किया करते हैं। जो हमें अच्छा लगता है उसे हमारी भी कोई बात अच्छी लगे, यह अभिलाषा प्रेम का एक विशेष लक्षण है। इस अभिलाषापूर्ति की आशा प्रिय हृदय को दयार्द्र करने में सबसे अधिक दिखाई पड़ती है, इसी से प्रेमी अपने दु:ख और कष्ट की बात बड़े तूल के साथ प्रिय को सुनाया करते हैं।

नायक नायिका के बीच कुछ वाक्चातुर्य और परिहास भी भारतीय प्रेमप्रवृत्ति का एक मनोहर अंग है, अत: उसका विधान यहाँ के कवियों की श्रृंगारपद्धति में चला आ रहा है। फारसी, अँगरेजी आदि के साहित्य में हम इसका विधान नहीं पाते। पर नए प्रेम से प्रभावित प्रत्येक भारतीय हृदय इस प्रवृत्ति का अनुभव करता है। देश और काल के भेद से हृदय के स्वरूप में भी भेद होता है। भारतीय प्रकृति के अनुसार संयोग पक्ष की नाना वृत्तियों का भी कुछ विधान हो जाने से जायसी का प्रेम आनन्दी जीवों द्वारा बिलकुल ‘मुहर्रमी’ कहे जाने से बाल बाल बच गया है।

पीछे तो उर्दूवालों में भी ‘खूबाँ से छेड़छाड़’ की रस्म चल पड़ी।

राजा की सारी कहानी सुनकर पद्मावती कहती है कि ”तू जोगी और मैं रानी, तेरा मेरा कैसा साथ?”

हौं रानी तुम जोगि भिखारी । जोगिहि भोगिहि कौनि चिन्हारी॥
जोगी सबै छंद अस खेला । तू भिखारि तिन्ह माँह अकेला॥
एही भाँति सिष्टि सब छरी । एही भेख रावन सिय हरी॥
संयोग श्रृंगार में कविपरम्परा ‘हावों’ का विधान करती आई है। अत: यहाँ पर यह कह देना आवश्यक है कि जायसी ने ‘हावों’ का सन्निवेश एक प्रकार से नहीं के बराबर किया है। केवल इसी प्रसंग में ‘विव्वोक हाव’ की कुछ झलक मिलती है, जैसे-

ओहट होसि, जोगि ! तोरि चेरी । आवै बास कुरकुटा केरी॥
जोगि तोरि तपसी कै काया । लागि चहै मोरे ऍंग छाया॥
‘हावों’ की सम्यक् योजना न होने से जायसी के संयोग पक्ष में वैसी सजीवता नहीं दिखाई देती।

राजा इस प्रेमगर्भ फटकार पर भी अपने कष्टपूर्ण प्रयत्नों और प्रेम की गम्भीरता की बात कहता ही चला जाता है। इस पर पद्मावती सच्चे प्रेम की व्याख्या करने लगती है-

कापर रँगे रंग नहिं होई । उपजै औटि रंग भल सोई॥
जौ मजीठ औटै बहु ऑंचा । सो रँग जनम न डोलै राँचा॥
जरि परास होइ कोइल भेसू । तब फूलै राता होइ टेसू॥
पर सच पूछिए तो यह गम्भीर व्याख्या अवसर के उपयुक्त नहीं है। इस प्रकार का निरूपण प्रशान्त मानस में ही ठीक है, मोदतरंगाकुल मानस में नहीं। पर कवि अपनी चिन्तनशील प्रकृति के अनुसार अवसर अनवसर का विचार न करके ऐसी बातों को बीच बीच में बराबर घुसाया करता है।

पहले पद्मावती में प्रिय समागम का भय दिखाकर कवि ने उसे नवोढ़ा का रूप दिया। अत: उसके मुँह से इस प्रकार का प्रौढ़ परिहास या प्रगल्भता नायिकाभेद के उस्तादों को खटकेगी। समाधान केवल यही हो सकता है कि सूए ने पद्मावती को बहुत पहले से प्रेममार्ग में दीक्षित कर रखा था। राजा रत्नसेन के सिंहल आने पर सूआ संदेशों के द्वारा पद्मावती को प्रेम में पक्की करता रहा। अत: इस प्रकार के परिपुष्ट वचन अनुपयुक्त नहीं।

सम्भोग श्रृंगार की रीति के अनुसार जायसी ने अभिसार का पूरा वर्णन किया है। पद्मावती के समागम की कुछ पंक्तियाँ अश्लील भी हो गई हैं; पर सर्वत्र जायसी ने प्रेम का भावात्मक रूप ही प्रधान रखा है। शारीरिक भोग विलास का वर्णन कवि ने यहाँ कुछ ब्योरे के साथ किया है, पर इस विलासिता के बीच बीच में भी प्रेम का भावात्मक स्वरूप प्रस्फुटित दिखाई पड़ता है। राजा जिससे मतवाला हो रहा है वह प्रेम की सुरा है जिसका जिक्र सूफी शायरों ने बहुत ज्यादा किया है-

सुनु धानि ! प्रेम सुरा के पिए । मरन जियन डर रहै न हिए॥
जेहि मद तेहि कहाँ संसारा । की सो धूमि रह, की मतवारा॥
जाकहँ होइ बार एक लाहा । रहै न ओहि बिनु , ओही चाहा॥
अरथ दरब सो देइ बहाई । की सब जाहु, न जाहु पियाई॥
पद्मावती पासा खेलने का विचार करती है। नवदम्पति का पासा खेलना बहुत पुरानी रीति है। अब भी बहुत जगह विवाह के समय वरकन्या के पासा खेलने की नकल चली आती है। पर इस प्रसंग में भी कवि ने श्लेष और अन्योक्ति आदि द्वारा उभय पक्ष का वाक्चातुर्य दिखाने का आयोजन बाँधा है जिससे पाठक का कुछ भी मनोरंजन नहीं होता। जैसा कि आगे चलकर दिखाया जाएगा। जायसी की इस प्रवृत्ति के कारण प्रबन्ध के रसपूर्ण प्रवाह में बहुत जगह बाधा पड़ी है-

बिहँसी धनि सुनिकै सब बाता । निहचय तू मोरे रंग राता॥
जब हीरामन भयउ सँदेसी । तुम्ह हुँत मँडप गइउँ, परदेसी॥
तोर रूप तस देखिउँ लोना । जनु जोगी तू मेलेसि टोना॥
भुगुति देइ कहँ मैं तोहि दीठा । कँवल नयन होइ भँवर बईठा॥
नैन पुहुप, तू अलि भा सोभी । रहा बेधि अस, उड़ा न लोभी॥
कौन मोहिनी दहुँ हुति तोही । जो तोहि बिथा सो उपनी मोही॥
तोरे प्रेम प्रेम मोहि भएऊ । राता हेम अगिनि जौं तएऊ॥
प्रेम की पूर्वापर (युगपत् नहीं) स्थिति में एक की व्यथा से दूसरे को व्यथा या करुणा उत्पन्न हुई कि एक के प्रेमप्रवाह से दूसरे में प्रेम की नींव पड़ी समझनी चाहिए। रत्नसेन और पद्मावती का प्रेम पूर्वापर है। पद्मावती के अलौकिक रूपसौन्दर्य को सुनकर पहले राजा रत्नसेन के हृदय में प्रेमव्यथा उत्पन्न होती है, पीछे पद्मावती के हृदय में उस व्यथा के प्रति सहानुभूति-

सुनि कै धानि, ‘जारी अस काया’। तन भा मयन , हिये भइ माया॥

यही ‘माया’ या सहानुभूति प्रेम की पवित्र जननी हो जाती है। सहसा साक्षात्कार के द्वारा प्रेम के युगपत् आविर्भाव में उक्त पूर्वापर क्रम नहीं होता इसलिए उसमें प्रेमी और प्रिय का भेद नहीं होता। उसमें दोनों एक दूसरे के प्रेमी और एक-दूसरे को प्रिय साथ साथ होते हैं। उसमें यार की संगदिली या बेवफाई की शिकायत-निष्ठुरता के उपालम्भ की जगह पहले तो नहीं होती, आगे चलकर हो जाय तो हो जाय। तुलसीदास द्वारा वर्णित जनकपुर के बगीचे में उत्पन्न सीता और राम का युगपत् प्रेम बराबर सम रहा। पर सूरदास द्वारा वर्णित गोपी कृष्ण का प्रेम आगे चलकर सम से विषम हो गया। इसीलिए अयोध्‍या से निर्वासित सीता राम की बेवफाई की कुछ भी शिकायत नहीं करतीं, पर गोपियाँ मारे शिकायतों के उद्धव के कान बहरे कर देती हैं। रत्नसेन और पद्मावती के प्रेम में आरम्भ में विषमता है और गोपी कृष्ण के प्रेम में अन्त में। दोनों की विषमता की स्थिति में यही अन्तर है। गोपी कृष्ण का प्रेम समता से विषमता की ओर प्रवृत्त हुआ है और रत्नसेन पद्मावती का प्रेम विषमता से समता की ओर। इस समता की प्राप्ति की व्यंजना पद्मावती कैसे भोले-भाले शब्दों में अपनी सखियों से करती है-

आजु मरम मैं जानिउँ सोई । जस पियार पिउ और न कोई॥
हिये छाहँ उपना औ सीऊ । पिउ न रिसाउ लेउ बरु जीऊ॥
करि सिंगार तापहँ का जाऊँ । ओही देखहुँ ठावहिं ठाऊँ॥
जो जिउ महँ तौ उहै पियारा । तन मन सौं नहिं होइ निनारा॥
नैन माँह है उहै समाना । देखौं तहाँ नाहिं कोउ आना॥
अब यहाँ प्रश्न उठता है कि जायसी ने विषम प्रेम से क्यों आरम्भ किया, आरम्भ ही से सम प्रेम क्यों नहीं लिया। इसका उत्तर यह है कि जायसी को इस प्रेम को लेकर भगवत्पक्ष में भी घटाना था। ईश्वर के प्रति प्रेम का उदय पहले भक्त के हृदय में होता है। ज्यों ज्यों यह प्रेम बढ़ता जाता है, त्यों त्यों भगवान् की कृपादृष्टि भी होती जाती है यहाँ तक कि पूर्ण प्रेमदशा को प्राप्त भक्त भगवान् का भी प्रिय हो जाता है। प्रेमी होकर प्रिय होने की यह पद्धति भक्तों की है। भक्ति की साधना का क्रम यही है कि पहले भगवान हमें प्रिय लगें, पीछे अपने प्रेम के प्रभाव से हम भी भगवान को प्रिय लगने लगेंगे।

ईश्वरोन्मुख प्रेम

पहले कहा जा चुका है कि जायसी का झुकाव सूफी मत की ओर था जिसमें जीवात्मा और परमात्मा में पारमार्थिक भेद न माना जाने पर भी साधकों के व्यवहार में ईश्वर की भावना प्रियतम के रूप में की जाती है। इन्होंने ग्रन्थ के अन्त में सारी कहानी को अन्योक्ति कह दिया है और बीच बीच में भी उनका प्रेमवर्णन लौकिक पक्ष से अलौकिक पक्ष की ओर संकेत करता जान पड़ता है। इसी विशेषता के कारण कहीं – कहीं इनके प्रेम की गम्भीरता और व्यापकता अनन्तता की ओर अग्रसर दिखाई पड़ती हे। ‘रति भाव’ का वर्णन हिन्दी के बहुत से कवियों ने किया है-कुछ लोगों का तो कहना है कि इसके अतिरिक्त और हमने किया ही क्या है-पर एक प्रबन्ध के भीतर शुद्ध भाव के स्वरूप का ऐसा उत्कर्ष जो पार्थिव प्रतिबन्धों से परे होकर आध्‍यात्मिक क्षेत्र में जाता दिखाई पड़े, जायसी का मुख्य लक्ष्य है। क्या संयोग, क्या वियोग, दोनों में कवि प्रेम के उस आध्‍यात्मिक स्वरूप का आभास देने लगता है, जगत के समस्त व्यापार जिसकी छाया से प्रतीत होते हैं। वियोगपक्ष में जब कवि लीन होता है तब सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र सब उसी परम विरह में जलते और चक्कर लगाते दिखाई देते हैं, प्राणियों का लौकिक वियोग जिसका आभास मात्र है-

बिरह के आगि सूर जरि काँपा । रातिउ दिवस जरै ओहि तापा॥

यद्यपि इस प्रकार के विरहवर्णन की ओर सगुणधा के भक्तों की प्रवृत्ति नहीं रही है, पर तुलसी की ‘विनयपत्रिका’ में एक जगह ऐसे विश्वव्यापी विरह की भावना पाई जाती है-

बिछुरे रवि ससि, मन ! नैनन तें पावत दुख बहुतेरो।
भ्रमत स्रमित निसि दिवस गगन महँ, तहँ रिपु राहु बड़ेरो॥
जद्यपि अति पुनीत सुरसरिता, तिहुँ पुर सुजस घनेरो॥
तजे चरन अजहूँ न मिटत नित बहिबो ताहू केरो॥
इसी शुद्ध भावक्षेत्र में अग्नि, पवन इत्यादि सब उस प्रिय (ईश्वर) के पास तक पहुँचने में व्यस्त दिखाई पड़ते हैं। सारी सृष्टि उसी ‘परम भाव’ में लीन होने को बढ़ती जान पड़ती है। परम साधना पूरी हुए बिना कोई यों ही इच्छा मात्र करके नहीं पहुँच सकता है-

धाइ जो बाजा कै मन साधा । मारा चक्र, भएउ दुइ आधा॥
पवन धाइ तहँ पहुँचै चहा । मारा तैस, लोटि भुइँ रहा॥
अगिनि उठी, जरि उठा निआना । धुऑं उठा , उठि बीच बिलाना॥
पानि उठा ,उठि जाइ न छूआ । बहुरा रोइ आइ भुइँ चूआ॥
लौकिक सौन्दर्य का वर्णन करते-करते कवि की दृष्टि किस प्रकार उस चरम सौन्दर्य की ओर जा पड़ती है, यह रूप-सौन्दर्य-वर्णन के अन्तर्गत देखिए। उस चरम सौन्दर्य की कुछ झलक मानो सृष्टि के वृक्ष, वल्ली, पशु, पक्षी, पृथ्वी, आकाश सबको मिली हुई है, सबके हृदय में मानो उसकी दृष्टि कोर गड़ी हुई है, सब उसके विरह में लीन है –

उन बानन्ह अस को जो न मारा । बेधि रहा सगरो संसारा॥
गगन नखत जो जाहिं न गने । वै सब बान ओहि के हने॥
धरती बान बेधि सब राखी । साखी ठाढ़ देहिं सब साखी॥
रोवँ रोवँ मानुष तन ठाढ़े । सूतहि सूत वेधा अस गाढ़े॥
बरुनि बान अस ओपहँ , बेधो रन, बन ढाँख।
सौजहि तन सब रोवाँ, पंखिहि तन सब पाँख॥
सृष्टि के नाना पदार्थ रूप, रस, गन्ध आदि का जो विकास करते दिखाई पड़ते हैं। -सौन्दर्य और माधुर्यधारण करते दिखाई पड़ते हैं। वह मानो उस अनन्त सौन्दर्य के समागम के अभिलाष से उसके पास तक पहुँचने की आशा से-

पुहुप सुगंध करहिं एहि आसा । मकु हिरकाइ लेइ हम्ह पासा॥

रत्नसेन को पद्मावती तक पहुँचानेवाला प्रेमपन्थ जीवात्मा को परमात्मा में ले जाकर मिलानेवाले प्रेमपन्थ का स्थूल आभास है। प्रेमपथिक रत्नसेन में सच्चे साधक भक्त का स्वरूप दिखाया गया है। पद्मिनी ही ईश्वर से मिलानेवाला ज्ञान या बुद्धि है अथवा चैतन्यस्वरूप परमात्मा है, जिसकी प्राप्ति का मार्ग बतलानेवाला सूआ सद्गुरु है। उस मार्ग में अग्रसर होने से रोकने वाली नागमती संसार का जंजाल है। तनरूपी चित्तौरगढ़ का राजा मन है। राघवचेतन शैतान है जो प्रेम का ठीक मार्ग न बताकर इधर उधर भटकाता है। माया में पड़े हुए सुलतान अलाउद्दीन को मायारूप ही समझना चाहिए। इसी प्रकार जायसी ने ‘पद्मावत’ के अन्त में अपने सारे प्रबन्ध को व्यंग्यगर्भित कह दिया है-

तन चितउर, मन राजा कीन्हा । हिय सिंहल, बुधि पदमिनि चीन्ह॥
गुरु सुआ जेहि पंथ देखावा । बिन गुरु जगत को निरगुन पावा॥
नागमती यह दुनिया धंधा । बाँचा सोइ न एहि चित बंधा॥
राघव दूत , सोइ सैतानू । माया अलादीन सुलतानू॥
अब यदि कवि के स्पष्टीकरण के अनुसार व्यंग्य अर्थ को ही प्रधान या प्रस्तुत मानें तो जहाँ जहाँ दूसरे अर्थ भी निकलते हैं, वहाँ वहाँ अन्योक्ति माननी पड़ेगी। पर ऐसे स्थल अधिकतर कथा के अंग हैं और पढ़ते समय कथा के अप्रस्तुत होने की धारणा किसी पाठक को नहीं हो सकती। अत: इन स्थलों के वाच्यार्थ को अप्रस्तुत नहीं कह सकते। इस प्रकार वाच्यार्थ के प्रस्तुत और व्यंग्यार्थ के अप्रस्तुत होने से ऐसी जगह सर्वत्र ‘समासोक्ति’ ही माननी चाहिए। ‘पद्मावत’ के सारे वाक्यों के दोहरे अर्थ नहीं हैं, सर्वत्र अन्य पक्ष के व्यवहार का आरोप नहीं है। केवल बीच बीच में कहीं कहीं दूसरे अर्थ की व्यंजना होती है। ये बीच-बीच में आए हुए स्थल, जैसा कि कहा जा चुका है, अधिकतर तो कथाप्रसंग के अंग हैं, जैसे-सिंहलगढ़ की दुर्गमता और सिंहलद्वीप के मार्ग का वर्णन, रत्नसेन का लोभ के कारण तूफान में पड़ना और लंका के राक्षस द्वारा बहकाया जाना। अत: इन स्थलों में वाच्यार्थ से अन्य अर्थ जो साधनापक्ष में व्यंग्य रखा गया है वह प्रबन्ध काव्य की दृष्टि से अप्रस्तुत ही कहा जा सकता है और ‘समासोक्ति’ ही माननी पड़ती है।

एक छोटा सा उदाहरण लीजिए। राजा रत्नसेन जब दिल्ली में कैद हो गए तब रानी पद्मावती इस प्रकार विलाप करती है-

सो दिल्ली अस निबहुर देसू । केहिं पूछहूँ , को कहै सँदेसू॥
जो कोइ जाइ तहाँ कर होई । जो आवै किछु जान न सोई॥
अगम पंथ पिय तहाँ सिधावा । जो रे गयउ सो बहुरि न आवा॥
प्रबन्ध के भीतर ये सारे वाक्य प्रस्तुत प्रसंग का वर्णन करते हैं पर इनमें परलोकयात्रा का अर्थ भी व्यंग्य है। यहाँ वाच्यार्थ को प्रस्तुत और व्यंग्यार्थ को अप्रस्तुत मानकर तथा ‘कोई किछु जान न’ और ‘बहुरि न आवा’ को दिल्ली गमन और परलोकगमन दोनों के सामान्य कार्य ठहराते हुए, दिल्ली गमन में परलोकगमन के व्यवहार का आरोप करके हम समासोक्ति ही कह सकते हैं।

जहाँ कथाप्रसंग से भिन्न वस्तुओं के द्वारा प्रस्तुत प्रसंग की व्यंजना होती है वहाँ ‘अन्योक्ति’ होगी, जैसे-

(क) सूर उदयगिरि चढ़त भुलाना । गहनै गहा, कँवल कुँभिलाना॥

यहाँ इस ‘अप्रस्तुत’ के कथन द्वारा राजा रत्नसेन के सिंलहगढ़ पर चढ़ने और पकड़े जाने की व्यंजना की गई है। दूसरा उदाहरण लीजिए-

(ख) कँवल जो बिगसा मानसर , बिनु जल गयउ सुखाइ॥

अबहुँ बेलि फिर पलुहै , जो पिय सींचै आइ॥

यहाँ जल कमल का प्रसंग प्रस्तुत नहीं है, प्रस्तुत है विरहिणी की दशा। अत: यहाँ अप्रस्तुत से प्रस्तुत की व्यंजना होने के कारण ‘अन्योक्ति’ है।

सारांश यह है कि जहाँ जहाँ प्रबन्ध-प्रस्तुत वर्णन में अध्‍यात्म पक्ष का कुछ अर्थ भी व्यंग्य हो वहाँ समासोक्ति ही माननी चाहिए। जहाँ प्रथम पक्ष में अर्थात् अभिधेयार्थ में किसी भाव की व्यंजना नहीं है (जैसे मार्ग की कठिनता और सिंहलगढ़ की दुर्गमता के वर्णन में) वहाँ तो वस्तुव्यंजना स्पष्ट ही है, क्योंकि वहाँ एक प्रस्तुत अर्थ से दूसरे वस्तुरूप अर्थ की ही व्यंजना है। पर जहाँ किसी भाव की भी व्यंजना है वहाँ यह जिज्ञासा हो सकती है कि एक पक्ष की वस्तु दूसरे पक्ष की दूसरी वस्तु को व्यंजित करती है अथवा एक पक्ष का भाव दूसरे पक्ष के दूसरे भाव को व्यंजित करता है। विचार के लिए यह पद्य लीजिए-

पिउ हिरदय महुँ भेंट न होई । को रे मिलाव, कहौं केहि रोई॥

ये पद्मावती के वचन हैं जिसमें रतिभावव्यंजक ‘विषाद’ और ‘औत्सुक्य’ की व्यंजना है। ये वचन जब भगवत्पक्ष में घटते हैं तब भी इन भावों की व्यंजना बनी रहती है। इस अवस्था में क्या हम कह सकते हैं कि प्रथम पक्ष में व्यंजित भाव दूसरे पक्ष में उसी भाव की व्यंजना करता है? नहीं; क्योंकि व्यंजना अन्य अर्थ की हुआ करती है, उसी अर्थ की नहीं। उक्त पद्य में भाव दोनों पक्षों में वे ही हैं। आलम्बन भिन्न होने से भाव अपर (अर्थात् अन्य और समान; समानता अपरता में ही होती है) नहीं हो सकता। प्रेम चाहे मनुष्य के प्रति हो चाहे ईश्वर के प्रति, दोनों पक्षों में प्रेम ही रहेगा। अत: यहाँ वस्तु से वस्तु ही व्यंग्य है और भावव्यंजना का विधान दोनों पक्षों में अलग अलग माना जाएगा।

पहले तो पद्मावती और रत्नसेन के पक्ष में वाच्यार्थ की प्रतीति के साथ ही लक्ष्यक्रम व्यंग्य द्वारा उन दो भावों (विषाद और औत्सुक्य) की प्रतीति होती है। इसके उपरान्त हम फिर प्रथम पक्ष के वाच्यार्थ से चलकर लक्ष्यक्रम व्यंग्य द्वारा दूसरे पक्ष की इस वस्तु पर पहुँचते है। ‘ईश्वर तो अन्त:करण में ही है, पर साक्षात्कार नहीं होता। किस गुरु से कहें जो उपदेश देकर मिलावे।’ इसमें अन्य आश्रय और अन्य आलम्बन का ग्रहण है अत: यह वस्तुव्यंजना हुई। इस प्रकार दूसरे पक्ष की व्यंग्य वस्तु पर पहुँचकर हम चट उसके व्यंग्य भाव (ईश्वरप्रेम) पर पहुँच जाते हैं। मतलब यह है कि एक पक्ष से दूसरे पक्ष पर हम वस्तुव्यंजना द्वारा ही आते हैं। यह वस्तुव्यंजना अधिकतर अर्थशक्त्युभव ही है, शब्दशक्त्युभव नही। अर्थात् अर्थ के सादृश्य से ही लक्ष्यक्रम व्यंग्य जायसी में मिलता है, श्लेष के सहारे पर नहीं। कहीं एकाध जगह ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिसमें शब्द के दोहरे अर्थ से कुछ काम लिया गया है, जैसे-

जो यहि खीर समुद महँ परे। जीव गँवाइ हंस होइ तरे॥

यहाँ ‘हंस’ शब्द का पक्षी भी अर्थ है और उपाधिमुक्त शुद्ध आत्मा भी।

जैसा कि कह आए हैं, भगवत्पक्ष में घटनेवाले व्यंग्यार्थगर्भ वाक्य बीच बीच में बहुत से हैं। हीरामन तोते के मुँह से पद्मिनी का रूपवर्णन सुन राजा उसके ध्‍यान में बेसुध हो गया। पर राजा केवल संसार के देखने में बेसुध था। अपने ध्‍यान की गम्भीरता में, समाधि की अवस्था में, उसे उस समय परम ज्योति के सामीप्य की आनन्दमयी अनुभूति हो रही थी जिसके भंग होने का दु:ख वह सचेत होने पर प्रगट करता है-

आवत जग बालक जस रोवा । उठा रोइ ‘हा ज्ञान सो खोवा’॥
हौं तो अहा अमरपुर जहाँ । इहाँ मरनपुर आएउ कहाँ॥
केइ उपकार मरन कर कीन्हा । सकति हँकारि जीउ हरि लीन्हा॥
यहाँ राजा का पद्मिनी के ध्‍यान में बेसुध होना कहकर साधक भक्त की समाधि द्वारा ईश्वर-सान्निध्‍य-प्राप्ति की व्यंजना की गई है। वह सान्निध्‍य कैसा आनन्दमय है! उस अमरधाम से जीव जब इस संसार में आता है तब उसकी सुध करके एकबारगी रो पड़ता है। जायसी ने तो जन्म के समय में बच्चे के रोने पर हेतूत्प्रेक्षा करके भाव को यहीं छोड़ दिया है, पर अँगरेज कवि वर्ड्सवर्थ इस भाव को और आगे ले गए हैं। वे कहते हैं कि अपने उस अमरधाम की सुध संसार में आते ही यद्यपि भूल जाती है, पर उसका संस्कार कुछ काल तक रहता है। अपने बचपन के दिनों का स्मरण कीजिए। ये ही हरे भरे मैदान, अमराइयाँ और नाले आदि जो अब साधारण दृश्य जान पड़ते हैं, कैसी आनन्दमयी दिव्य प्रभा से मण्डित दिखाई पड़ते थे। फूल अब भी सुन्दर लगते हैं, चन्द्रमा अब भी शरत्काल में सुहावना लगता है, पर इन सब की वह दिव्य आभा अब पृथ्वी पर कहाँ, जो बचपन में हृदय को आनन्दोल्लास से भर देती थी। बचपन में हमारे चारों ओर स्वर्ग का आभास कुछ बना रहता है। पर ज्यों ज्यों हम बड़े होते जाते हैं त्यों त्यों इस भवसागर की छाया में बद्ध होते जाते हैं। वह आनन्दसंस्कार मिटता जाता है, हम उसे भूलते जाते हैं। अत: इस संसार में जन्म लेना क्या है, एक प्रकार का भूलना है, एक प्रकार की निद्रा है-

अवर बर्थ इज बट ए स्लीप ऐंड ए फारगेटिंग ;

द सोल दैट राइजेज बिथ अस, अवर लाइव्ज स्टार ;

हैथ हैड एल्सह्नेयर इट्स सेटिंग

ऐंड कमेथ फ्राम ए फार ;

नाट इन एंटायर फारगेट फुलनेस

ऐंड नाट इन अवर नेकेडनेस

बट ट्रेलिंग क्लाउड्ज आव ग्लोरी डू वी कम

फ्राम गाड, हू इज अवर होम,

हेवेन लाइज एबाउट अस इन अवर इनफैंसी!

शेड्स आव द प्रिजन हाउस बिगिन टु क्लोज

अपान द ग्रोइंग ब्वाय।

-ओड आन इंटिमेशन आव इम्मारटैलिटी फ्राम रिकलेशन्स आव अर्ली चाइल्डहुड।

शास्‍त्रभिमानी लोग तर्कबुद्धि से जिन तत्त्वों का साक्षात्कार करते हैं मनुष्य की रागात्मिकता वृत्ति भी पूर्ण शुद्धता प्राप्त करके उन तथ्यों में रमती है। पहुँचे हुए कवियों की वाणी में जो सत्य की मार्मिक अनुभूति (ज्ञान मात्र नहीं) मिलती है, वह भी अमूल्य है। देखिए, जोगी होते हुए राजा के मुँह से कवि ने उसी अमरधाम की ओर स्वाभाविक दृश्य द्वारा संकेत कराया है-

हौं रे पथिक पखेरू , जेहि बन मोरि निबाहु।
खेलि चला तेहि बन कहँ, तुम अपने घर जाहु॥
राजा रत्नसेन जब सिंहल के पास सातवें समुद्र में पहुँचता है तब दु:ख की सारी छाया हट जाती है, आनन्द की अमन्द आभा फूटती दिखाई पड़ती है और हृदय की कली खिल जाती है। यह है साधक का अपनी साधना के फल के निकट पहुँचना, जबकि सारे भ्रम और सन्ताप दूर होते दिखाई पड़ने लगते हैं और ब्रह्म की आनन्दमयी ज्योति के साक्षात्कार से आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप की ओर अग्रसर होती जान पड़ने लगती है-

देखि मानसर रूप सोहावा । हिय हुलास पुरइनि होइ छावा॥
गा अँधियार , रैन मसि छूटी । भा भिनुसार किरिन रवि फूटी॥
‘अस्ति अस्ति’ सब साथी बोले । अंधा जो अहे, नैन बिधि खोले॥
आनन्द की कैसी लोकव्यापिनी व्यंजना है। एक एक शब्द से ऐसा उल्लास उमड़ पड़ता है जिसमें वृत्ति मग्न हो जाती है।

मन्दिर में पद्मावती के आने पर राजा रत्नसेन जो बेसुध होकर सो गया है उससे इस बात की व्यंजना की गई है कि ईश्वर बराबर सामने रहता है, पर जो इस संसार की माया में लिप्त होकर सोए रहते हैं उन्हें साक्षात्कार नहीं होता, जो योगी जागते हैं उन्हीं को होता है-

तबहूँ न जागा , गा तू सोई । जागे भेंट , न सोए होई ॥

और जागनेवाले योगी कौन हैं, गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं –

एहि जग जामिनि जागहिं जोगी । परमारथी प्रपंच वियोगी ॥

हीरामन के मुँह से सिंहलद्वीप और पद्मिनी का वर्णन सुन बेसुध होकर राजा जब फिर जागता है तब अपने चित्तौर के राजपाट और घरबार से उसकी दृष्टि फिरकर उस सिंहलद्वीप की ओर लग जाती है। यह दशा उस सच्चे भावुक जिज्ञासु की है जो गुरु से ब्रह्मज्योति का आभास पाकर उसी की ओर प्रवृत्त हो जाता है और इस संसार में सब व्यवहार उसे अज्ञानान्धकार के समान लगने लगते है। –

हिय के जोति दीप वह सूझा । यह जो दीप अँधियारा बूझा॥
उलटि दीठि माया सौं रूठी । पलटि न फिरी जानि कै झूठी॥
प्रेमपथिक रत्नसेन के इस मार्ग में साधक के मार्ग की झलक देखिए-

ओहि मिलान जो पहुँचै कोई । तब हम कहब पुरुष भल सोई॥
है आगे परबत कै बाटा । विषम पहार अगम सुठि घाटा॥
बिच बिच नदी , खोह औ नारा । ठाँवहिं ठाँव बैठ बटपारा॥
वह ‘मिलान’ जहाँ पहुँचना है ईश्वर है। अनेक प्रकार के विघ्न पहाड़ और नदी खोह हैं। काम, क्रोध, मोह आदि बटमार या डाकू हैं। साधक के विघ्नों का स्वरूप दिखाने के लिए ही कवि ने राजा रत्नसेन के लौटते समय तूफान की घटना का आयोजन किया है। लोभ के कारण राजा विपत्ति में फँसता है और लंका का राक्षस उसे मिलकर भटकाता है। यह लंका का राक्षस शैतान है जो साधकों को भटकाया करता है।

इसी प्रकार सिंहलगढ़ का निम्नलिखित वर्णन भी हठयोग के विभागों के अनुसार शरीर का वर्णन है-

गढ़ तस बाँक जैसि तोरी काया । पुरुष देखु ओही कै छाया॥
पाइय नाहिं जूझ हठि कीन्हें । जेइ पावा तेइ आपुहि चीन्हें॥
नौ पौरी तेहि गढ़मझियारा । औ तहँ फिरहिं पाँच कोटबारा॥
दसहुँ दुआर गुपुत एक ताका । अगम चढ़ाव बाट सुठि बाँका॥
भेदै जाइ कोइ वह घाटी । जो लह भेद चढ़ै होइ चाँटी॥
गढ़तर कुंड सुरँग तेहिमाहाँ । तहँ वह पंथ, कहौं तोहि पाहाँ॥
दसवँ दुआरि ताल कै लेखा । उलटि दिस्ट जो लाव सो देखा॥
हठयोगी अपनी साधना के लिए शरीर के भीतर तीन नाड़ियाँ मानते हैं। मेरुदण्ड या रीढ़ की बाईं ओर इला, दाहिनी ओर पिंगला नाड़ी है। इन दोनों के बीच में सुषुम्ना नाम की नाड़ी है। स्वरोदय के अनुसार बाएँ नथ में से जो साँस आती जाती है वह इला नाड़ी से होकर और दाहिने नथने से जो आती जाती है वह पिंगला से होकर। यदि श्वास कुछ क्षण दाहिने और कुछ क्षण बाएँ नथने से निकले तो समझना चाहिए कि वह सुषुम्ना नाड़ी से आ रही है। मध्‍यस्था सुषुम्ना नाड़ी ब्रह्मस्वरूप है और उसी में जगत अवस्थित है। बिना इन नाड़ियों के ज्ञान के योगाभ्यास में सिद्धि नहीं होती। जो योगाभ्यास करना चाहते हैं वे पहले इला, फिर पिंगला और उसके अनन्तर सुषुम्ना को साधते हैं। सुषुम्ना के सबसे नीचे के भाग में नाभि के नीचे, योगी कुण्डलिनी मानते हैं इसी को जगाने का प्रयत्न वे करते हैं। जाग्रत होने पर कुण्डलिनी चंचल होकर सुषुम्ना नाड़ी के भीतर भीतर सिर की ओर चढ़ने लगती है और हृत्कमल और बारह चक्रों को पार करती हुई ब्रह्मरन्‍ध्र या मूर्द्धज्योति तक चली जाती है। जैसे जैसे वह ऊपर चढ़ती जाती है, योगी के सांसारिक बन्धन ढीले पड़ते जाते हैं। यहाँ तक कि ब्रह्मरन्‍ध्र में पहुँचने पर मन और शरीर से उसका सम्‍बन्‍ध छूट जाता है और साधक पूर्ण समाधि या तुरीयावस्था को प्राप्त होकर ब्रह्म के स्वरूप में मग्न हो जाता है।

ऊपर जो पंक्तियाँ उद्धृत हैं उनमें ‘नौ पौरी’ नाक, कान, मुँह आदि नव द्वार हैं। दशम द्वार ब्रह्मरन्‍ध्र है जिसके पास तक पहुँचने में बहुत से विघ्न या अन्तराय पड़ते हैं। पाँच कोतवाल, काम, क्रोध आदि विकार हैं। गढ़ के नीचे का कुण्ड नाभिकुण्ड है जहाँ कुण्डलिनी है। इस नाभिकुण्ड से गई हुई सुरंग सुषुम्ना नाड़ी है जो ब्रह्मरन्‍ध्र तक चली गई है। वह ब्रह्मरन्‍ध्र बहुत ऊँचे है, वहाँ तक पहुँचना अत्यन्त कठिन है। संसार से अपनी दृष्टि हटाकर जो उसकी ओर निरन्तर ध्‍यान लगाए रहता है वही साधक वहाँ तक पहुँच पाता है। जैसे रत्नसेन को शिव ने सिंहलगढ़ के भीतर पहुँचने का मार्ग बताया है वैसे ही साधक को किसी सिद्ध पुरुष से उपदेश ग्रहण किए बिना ब्रह्म की प्राप्ति नहीं हो सकती। आरम्भ में कवि ने जो सिंहलगढ़ का वर्णन किया है उसमें कहा है कि ‘चारि बसेरे सौं चढ़ै, सत सौं उतरै पार’। ये चार बसेरे सूफी साधकों की चार अवस्थाएँ हैं -शरीअत, तरीकत, हकीकत और मारफत। यही मारफत पूर्ण समाधि की अवस्था है जिसमें ब्रह्म के स्वरूप की अनुभूति होती है।

रत्नसेन का सिंहलद्वीप में जाना भी हठयोगियों के प्रवाद के अनुकरण पर है। गोरखपन्थी जोगी सिंहलद्वीप को सिद्धपीठ मानते हैं जहाँ शिव से पूर्ण सिद्धि प्राप्त करने के लिए साधक को जाना पड़ता है।

लड़की का मायके से पति के पास जाना और जीव का ईश्वर के पास जाना दोनों में एक प्रकार के साम्य की कल्पना निर्गुणोपासक भावुक भक्तों में बहुत दिनों से चली आती है। कबीरदास के तो बहुत से भजनों में यह कल्पना भरी हुई है, जैसे-

खेलि लेइ नैहर दिन चारी।

पहिली पठौनी तीनि जन आए, नाऊ ब्राह्मण, बारी।
दुसरी पठौनी पिय आपुहि आए, डोली, बाँस कहारी।
धरि बहियाँ डोलिया बैठावैं , कोउ न लगत गोहारी।
अब कर जाना , बहुरि नहीं अवना , इहै भेंट अँकबारी॥

सुनि कै गवन मोरा जिया घबराई।

आजु मँदिरवा में अगिया लगिहै , कोउ न बुझावन जाई॥

इस प्रकार की अन्योक्तियाँ हिन्दू गृहस्थों, विशेषत: स्त्रियों के मर्म को अधिक स्पर्श करनेवाली होती हैं, इससे इनके द्वारा माँगनेवाले साधु लोगों के हृदय पर प्रभाव डालकर भिक्षा का अच्छा योग कर लेते हैं। जायसी ने भी प्रथम समागम के अवसर पर पद्मावती के मुँह से इस प्रकार के व्यंग्यगर्भित वाक्य कहलाए है। –

अनचिन्ह पिउ काँपौं मन माहाँ । का मैं कहब ,गहब जो बाहाँ॥
बारि बैस गहै प्रीति न जानी । तरुनि भई मैमंत भुलानी॥
जीवन गरब न मैं किछु चेता । नेह न जानौं सावँ कि सेता॥
अब सो कंत जो पूछिहि बाता । कस मुख होइहि पीत की राता॥
इसी प्रकार की उक्तियाँ पद्मिनी की विदाई के समय भी हैं, जैसे-

रोवहिं मात पिता औ भाई । कोउ न टेक जौ कंत चलाई॥
भरीं सखी सब, भेंटत फेरा । अंत कंत सौ भएउ गुरेरा॥
कोउ काहु कर नाहिं निआना । मया मोह बाँधा अरुझाना॥
जब पहुँचाइ फिरा सब कोऊ । चला साथ गुन अवगुन दोऊ॥
इसी मायके और ससुराल की प्रचलित अन्योक्ति को ध्‍यान में रखकर जायसी ने ग्रन्थ के आरम्भ में ही पद्मावती और सखियों के खेलकूद का ऐसा माधुर्यपूर्ण वर्णन किया है। सिंहल की हाट आदि के वर्णन में भी बीच बीच में जायसी ने पारमार्थिक झलक दिखाई है, जैसे-

जिन्ह एहि हाट न लीन्ह बेसाहा । ता कहँ आन हाट कित लाहा॥

कोई करें बेसाहनी, काहू केर बिकाइ।
कोई चलै लाभ सौं, कोई मूर गँवाइ॥
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