म्यांमार के मुसलमानों के समर्थन में दुनियाभर से उठने वाली मुस्लमानों की आवाज़।

म्यांमार के मुसलमानों के समर्थन में दुनियाभर से उठने वाली मुस्लमानों की आवाज़।

Posted by

और आख़िर तुम्हें क्या हो गया है कि तुम अल्लाह के मार्ग में और उन कमज़ोर पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के लिए जेहाद नहीं करते हो जिन्हें कमज़ोर बनाकर रखा गया है और जो बराबर दुआ करते हैं कि ख़ुदा हमें इस शहर से मुक्ति दे दे जिसके निवासी अत्याचारी हैं और हमारे लिए कोई अभिभावक और अपनी ओर से सहायक क़रार दे दे।

म्यांमार के मुसलमान यथावत देश के बौद्ध चरमपंथियों और कट्टरपंथी सेना के द्वेषपूर्ण और बर्बरतापूर्ण हमले का निशाना बन रहे हैं। अब तक म्यांमार के हज़ारों मुसलमान मारे जा चुके हैं और घायल हो चुके हैं जबकि पांच लाख से अधिक विस्थापित हो चुके हैं। रोहिंग्या शरणार्थी जान हथेली पर लेकर बांग्लादेश की ओर से पलायन करते हैं और वहां पर विषम परिस्थितियों में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। म्यांमार में रहने वाले रोहिंग्या मुसलमानों के जनसंहार का क्रम 2012 में आरंभ हुआ था। उस समय भी विश्व समुदाय की ज़बरदस्त चुप्पी के बीच हज़ारों रोहिंग्या मुसलमान मारे गये और घायल हुए जबकि लाखों लोग विस्थापित हुए थे। म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों के जनसंहार में जिस बात ने लोगों को अधिक दुखी कर दिया है वह इन अत्याचारग्रस्त इंसानों की हत्या में बौद्ध चरमपंथियों की पाश्विक शैलियां हैं। म्यांमार के मुसलमानों को भीषण यातनाएं दी जाती हैं और ज़िंदा जला दिया जाता है। उनकी महिलाओं का सामूहिक बलात्कार किया जाता है। बौद्ध चरमपंथी रोहिंग्या मुसलमानों के विरुद्ध बेपरवाह होकर अपराधों को अंजाम देते हैं क्योंकि उन्होंने आंग सांन सूची के नेतृत्व में म्यांमार की सरकार और सेना का भरपूर समर्थन प्राप्त है। हज़रत अली इस प्रकार की स्थिति को बयान करते हुए कहते हैं कि अत्याचारी शासकों की सरकार में, सत्य और वास्तविकता को पूरी तरह पैरों तले रौंदा जाता है, यद्यपि यह ग़लत और असत्य है, ज़िंदा व अत्याचार, तबाही और भ्रष्टाचार खुलकर सामने आ जाएगा, ईश्वरीय पुस्तकें ख़त्म हो जाएंगी, ईश्वरीय दूत और मोमेनीन की हत्याएं की जाएंगी, मस्जिदें सुनसान हो जाएंगी, ईश्वरीय परंपरा, ईश्वरीय नियम व क़ानून, तबदील हो जाएंगे।

म्यांमार के मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों के बारे में इस्लाम का क्या कहना है और इस्लाम धर्म दूसरों पर अत्याचार के बारे में क्या नज़रिया रखता है? मनुष्य अपनी ईश्वरीय प्रवृत्ति के आधार पर, अपने जैसों और दूसरों पर अत्याचार को सहन नहीं करता और उसकी भरपूर निंदा करता है, इस्लाम धर्म भी इस आधार पर दूसरे लोगों पर अत्याचार का विरोधी है चाहे वह मुस्लिम हों या ग़ैर मुस्लिम। दूसरों पर अत्याचार का अर्थ होता है मनुष्य के अधिकारों का हनन करना और उसकी मानवीय प्रतिष्ठा का अनादर करना। यही कारण है कि पवित्र क़ुरआन की विभिन्न आयतों में अत्याचार की निंदा की गयी है और अत्याचारियों को कड़े दंड की सूचना दी गयी है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि कमज़ोर व अक्षम लोगों पर अत्याचार, सबसे तुच्छ व बुरा अत्याचार है। म्यांमार के मुसलमानों जैसे निहत्थे और अक्षम लोगों पर अत्याचार की इस्लाम पूरी शक्ति के साथ निंदा करता है क्योंकि वह अपनी रक्षा की क्षमता नहीं रखते। पैग़म्बरे इस्लाम (स) इस बारे में कहते हैं कि ईश्वर का क्रोध उस पर सबसे अधिक है, जो उस पर अत्याचार करता है जिसका ईश्वर के अलावा कोई सहायक व मददगार नहीं होता।

इस्लाम की दृष्टि में दूसरों पर अपनी ताक़त और ज़ोर ज़बरदस्ती द्वारा अत्याचार करने वाले, जल्दी य देर से अपना अंजाम भुगतेगा। पवित्र क़ुरआन के सूरए हज की आयत संख्या 38 में ईश्वर मोमीनों से वादा करता है कि निसंदेह अल्लाह ईमान वालों का बचाव करता है और निश्चित रूप से ईश्वर विश्वासघात करने वाले काफ़िरों को कदापि पसंद नहीं करता है। ईश्वर सूरए शोअरा में अत्याचारियों को इस प्रकार धमकी देते हुए कहता है कि जिन लोगों ने अत्याचार किया है वह शीघ्र ही जान लेंगे कि उन्हें किस स्थान की ओर पलटाया जाएगा। हज़रत अली अलैहिस्सलाम भी इस संबंध में कहते हैं कि अत्याचार से बचने क्योंकि जिसने भी अत्याचार किया उसकी ज़िंदगी तबाह हो गयी।

इसमें कोई अंतर नहीं है कि अत्याचारी बौद्ध हो या मुसलमान, ज़ायोनी हो या अमरीका व यूरोप की वर्चस्ववादी सरकारें हों, हां यहां पर यह संभव है कि अत्याचारियों का पतन और उनकी तबाही कुछ देर से हो या ईश्वर की तत्वदर्शिता के आधार पर टाल दी जाए किन्तु उनको प्रलय में अपने किए का फल तो मिलेगा ही और यह प्रतिशोध और प्रकोप निश्चित है।

ईश्वर आले ईमरान की आयत संख्या 178 में कहता है कि और सचेत हो जाईये कि यह अनेकेश्वरवादी यह न समझें कि हम जिस प्रकार आराम और सरलता दे रहे हैं वह उनके लिए कोई भलाई है, हम तो केवल इसलिए दे रहे हैं कि वह जितना चाहें पाप कर सकें वरना उनके लिए लज्जाजनक पाप है।

ईश्वर जिस प्रकार अत्याचार करने को पसंद नहीं करता, इसी प्रकार अत्याचार को स्वीकार करने और उसे सहन करने को भी पसंद नहीं करता। सूरए शूरा की आयत संख्या 39 में ईश्वर, मोमेनीन की इस प्रकार प्रशंसा करता है कि और जब उन पर कोई अत्याचार होता है तो उसका बदला ले लेते हैं। इस आधार पर यदि अत्याचार ग्रस्त लोगों पर अत्याचार हो तो उनकी यह ज़िम्मेदारी है कि जिस सीमा तक हो अपना बचाव करें, उन्हें अत्याचारियों को इस बात की अनुमति नहीं देनी चाहिए कि जिस प्रकार चाहें मनमानी करें। इस प्रकार के प्रतिरोध को ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता, लेबनान में हिज़्बुल्लाह और फ़िलिस्तीन के इंतेफ़ाज़ा में देखा जा सकता है। म्यांमार के मुसलमान भी कमज़ोर और कम संख्या में हैं, उनको जिस हद तक संभव हो, अपने जनसंहार को रोकने का प्रयास करना चाहिए और अपने अधिकारों का बचाव करना चाहिए। इस प्रकार से ईश्वर कई स्थानों पर उनकी सहायता का भी वादा करता है। सूरए हज की आयत संख्या 39 और 40 में हम पढ़ते हैं कि जिन लोगों से निरंतर युद्ध किया जा रहा है उन्हें उनके अत्याचार ग्रस्त होने के आधार पर जेहाद की अनुमति दे दी गयी है और निरंतर अल्लाह उनकी सहायता पर सक्षम है, वह लोग जो अपने घरों से बिना किसी हक़ के निकाल दिए गये हैं, अलावा इसके कि वह कहते हैं कि हमारा ईश्वर अल्लाह है और ईश्वर कुछ लोगों को कुछ के माध्यम से न रोकता तो समस्त गिराजाघर और यहूदियों के उपासना स्थल और आग की पूजा करने वालों के उपासना स्थल और मस्जिदें सब ढा दी जातीं और अल्लाह अपने सहायकों की निश्चित सहायता करेगा कि वह निश्चित रूप से शक्तिशाली भी है और प्रतिषठा – वा भी है।

म्यांमार के मुसलमानों के जनसंहार के बारे में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा, मुसलमानों और मुस्लिम सरकारों का दायित्व है। इस्लाम न केवल यह कि अत्याचार ग्रस्त मुसलमानों की रक्षा करता है और दुनिया के समस्त अत्याचार ग्रस्त लोगों का समर्थन करता है, इसे मुसलमानों का दायित्व समझता है। नारे लगाने और उनसे सहृदयता व्यक्त करने से अत्याचार ग्रस्त लोगों की समस्याएं समाप्त नहीं हो जातीं और मुसलमानों और मुस्लिम सरकारों की ज़िम्मेदारी है कि वह अपनी क्षमता के अनुसार उनका बचाव करें। सूरए अनफ़ाल की आयत संख्या 72 में ईश्वर कहता है कि यदि मुसलमान तुमसे सहायता मांगे तो उसकी सहायता करो किन्तु पवित्र क़ुरआन में अत्याचार ग्रस्त लोगों की सहायता करने के बारे में सबसे महत्वपूर्ण आयत सूरए निसा की आयत संख्या 75 है जिसमें ईश्वर उन मुसलमानों को डराता है जो अत्याचार ग्रस्त लोगों की सहायता में लापरवाही करते हैं, ईश्वर कहता है कि और आख़िर तुम्हें क्या हो गया है कि तुम अल्लाह के मार्ग में और उन कमज़ोर पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के लिए जेहाद नहीं करते हो जिन्हें कमज़ोर बनाकर रखा गया है और जो बराबर दुआ करते हैं कि ईश्वर इस शहर से मुक्ति दे दे जिसके निवासी अत्याचारी हैं और हमारे लिए कोई अभिभावक और अपनी ओर से सहायक क़रार दे दे। इस आधार पर व्याख्याकर्ताओं की नज़र में यह आयत, अत्याचारग्रस्त लोगों की रक्षा, मुसलमानों पर अनिवार्य करती है।

बहुत सी रिवायतों में भी अत्याचार ग्रस्त लोगों की रक्षा और अत्याचारियों के विरुद्ध संघर्ष करने पर बहुत अधिक बल दिया गया है। पैग़म्बरे इस्लाम का कहना है कि अत्याचार ग्रस्त लोगों की सहायता करने वाले स्वर्ग में मेरे साथ होंगे, यह उच्च स्थान अत्याचार ग्रस्त लोगों की सहायता के महत्व को दर्शाता है। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम एक स्थान पर कहते हैं कि यदि किसी घर के एक कमरे में आग लग जाए और न बुझे तो आग दूसरे कमरों तक भी फैल जाएगी, अत्याचार भी इसी प्रकार है और यदि आरंभ में उनकी रोकथाम नहीं की तो अत्याचार का दायरा बढ़ जाएगा। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी संतानों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि अत्याचारी के दुश्मन और अत्याचारग्रस्त लोगों के सहायक बनो। यह वही काम था जो उन्होंने अपने पूरे जीवन भर अंजाम दिए थे और इसी मार्ग में शहीद भी हो गये। सैद्धांतिक रूप से पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों ने विभिन्न शैलियों से अत्याचारग्रस्त लोगों की सहायताएं की हैं। जैसा कि हज़रत इमाम हुसैन ने अत्याचार से संघर्ष के मार्ग में न केवल अपनी बल्कि अपने साथियों और परिजनों की शहादत पेश की।

यदि जिस पर अत्याचार हुआ हो वह मुसलमान हो तो मुसलमानों पर उसकी रक्षा की ज़िम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है। सूरए अंबिया की आयत संख्या 92 में कहा गया है कि निसंदेह यह तुम्हारा धर्म एक ही धर्म इस्लाम है और मैं तुम सबका ईश्वर हूं इसीलिए मेरी ही उपासना किया करो। इस आधार पर सारे मुसलमान एक ही जाति और एक ही शरीर के भाग हैं और एक दूसरों का समर्थन करना चाहिए। इसी प्रकार सूरए हुजुरात की आयत संख्या 10 में मुसलमानों को एक दूसरे का भाई कहा गया है, इसीलिए उनकी एक दूसरे के मुक़ाबले में ज़िम्मेदारी भी है कि दूसरों की जान व माल व इज़्ज़त की रक्षा, उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि म्यांमार का मुद्दा एक राजनैतिक मुद्दा है क्योंकि इस मामले में स्वयं म्यांमार की सरकार भी लिप्त है और इस सरकार की प्रमुख भी एक ऐसी निर्दयी महिला है जिसने शांति का नोबल पुरस्कार ले रखा है और इस प्रकार शांति के नोबल पुरस्कार की वास्तविकता भी खुल गयी है।

उन्होंने कहा कि म्यांमार और रोहिंग्या मुसलमानों पर जो अत्याचार हो रहे हैं, वह सुनुयोजित षड्यंत्र का भाग है और इस विषय को मुसलमानों के जनसंहार और उनके विरुद्ध अत्याचारों के इतिहास में देखा जा सकता है। मुसलमानों ने पहली बार इस अत्याचार का अनुभव फ़िलिस्तीन और ज़ायोनियों के निर्दयी और आतंकवादी हमलों के दौरान किया और अब यह मामला म्यांमार में दोहराया जा रहा है।