राजकपूर के पांच दोस्त!

राजकपूर के पांच दोस्त!

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Izhar Sayyed Arif
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शैलेन्द्र, साहिर, प्रेमवार बर्टनि, राजा मेहदी अली खां, शहरयार, शकील मेरे पसंदीदा शायरों में है जिनके बारे में अक्सर लिखता रहता हूँ . आज एक गाने की वजह से शैलेन्द्र का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूँ के उस बाग़ी फितरत के शायर को अपना इज़्ज़त अपनी बहुत प्यारी थी . जब पचास के दशक में उसे मुशायरे में सुनकर राजकपूर ने उनकी शायरी से बहुत प्रभावित होकर उन्हें अपनी फिल्म में गाने लिखने का ऑफर दिया तो उन्होंने साफ जवाब दिया के फिल्मो में होने वाली भांडगिरी से मैं कोई सरोकार नहीं रखना चाहता . इसके बाद राजकपूर से रेलवे वर्कशॉप में क्लर्क की पोस्ट पर कार्यरत उस शायर को कई बार गाने लिखने का प्रस्ताव भेजा मगर हर बार इंकार ही हाथ आया . बीमारी के इलाज के दौरान शैलेन्द्र ने छह महीने की मोहलत पर राजकपूर से कुछ रूपए उधार लिए मगर बीमारी से उबरने के बाद उन्हें लगा के वो शायद इतनी बड़ी राशि का भुगतान अपने अल्प सैलॅरी से नहीं कर पाएंगे . नतीजतन वो बहुत शर्मिंदा से राजकपूर के पास पहुंच कर बोले आप मुझे अपनी फिल्म में गाने लिखने के लिए एडवांस दे रहे थे वो आप मुझे दे दीजिये क्योंकि मुझे आपसे लिया गया उधार चुकाना है . मैं आपकी फिल्म के लिए गाने लिखने को तैयार हूँ . उस समय तक ‘बरसात’ के सारे गीत रिकार्ड हो चुके थे। गीतकार थे हसरत जयपुरी। राजसाहब ने उन्हें समझाया- मैं इस नौजवान को मौका़ देना चाहता हूँ। इसलिए मुझे तुम्हारे दो गीत हटाने पडेंगे। ये गीत थे –‘प्रेम नगर में बसने वाले’ और ‘मैं जिंदगी में हरदम रोता ही रहूंगा।’ इन्हें हटाकर शैलेंद्र से दो गीत लिखवाए गए। दोनों गीत बेहद लोकप्रिय हुए। वे गीत हैं –१. ‘बरसात में हमसे मिले तुम सनम तुमसे मिले हम’ और २. ‘पतली कमर है तिरछी नज़र है।’

इसी फ़िल्म से राजकपूर ने पांच लोगों की टीम बनाई और आजीवन दोस्ती निभाई। ये हैं – शंकर-जयकिशन, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी और मुकेश। शैलेंद्र के लिखे- जीना यहां मरना यहां, मेरा जूता है जापानी, होठों पे सचाई रहती है जैसे गीतों ने राजकपूर की शाख्सियत को गढ़ने में विशेष भूमिका अदा की। जब शैलेंद्र ने अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘तीसरी कसम’ बनाई तो नायक की भूमिका के लिए राजकपूर से अनुरोध किया। हालांकि उस समय राजकपूर की उम्र अधिक हो गई थी मगर उन्होंने दोस्ती निभाई। एक सीधे-साधे प्रौढ़ प्रेमी के रुप में उन्होंने फिल्म को यादगार बना दिया। शैलेंद्र के सादगी भरे शब्दों ने राजकपूर के सीधे सादे व्याक्तित्व के साथ मिलकर दर्शकों पर अमिट छाप छोडी- ‘सजन ने झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है ।’

शैलेन्द्र के बाग़ी तेवर कभी कभी उनके गांव में भी देखने को मिले . इसका ही एक उदाहरण मैं उनके फिल्म “बद्तमीज़” के गीत से देता हूँ जिसे मुहम्मद रफ़ी ने क्या शानदार आवाज़ दी है के एक बार सुन लेने से गीत की धुन के साथ बोल भी ज़बान पर चढ़ जाते है : –

*हसीन हो तुम ख़ुदा नहीं हो तुम्हारा सज़दा नहीं करेंगे
अगर मोहब्बत में हुक़्म दोगे तो हँसते-हँसते ये जाँ भी देंगे
समझते हो ख़ुद को जाने क्या तुम कि सारी दुनिया को ख़ाक़ जाना
ग़ुरूर का सर झुकेगा एक दिन हँसेगा तुम पर भी ये ज़माना
हमेशा ये सिन नहीं रहेगा, हमेशा ये दिन नहीं रहेंगे
हसीन हो तुम…
हमारी नज़रों का शुक़्र कीजिए कि आसमाँ पर तुम्हें बिठाया
हमारे दिल को दुआएँ दीजिए कि धड़कनों में तुम्हें बसाया
बुलन्दियों से गिरोगे तुम भी, अगर निगाहों से हम गिरेंगे
हसीन हो तुम…
हमारे जैसे अगर हैं लाखों तुम्हारे जैसे भी कम नहीं हैं
जो पत्थर से फोड़ लें सर वो और होंगे वो हम नहीं हैं
नहीं मोहब्बत में मर सके जो भला वो जीकर ही क्या करेंगे
हसीन हो तुम…खुदा नहीं हो ओ ओ ओ