संघ के मनगढ़ंत इतिहास और बढ़ते सांप्रदायिक ख़तरे पर विश्व विख्यात इतिहासकार प्रो. इरफ़ान हबीब : वीडियो देखें

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परवेज़ ख़ान
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क़ाबा किस मूँह से जाओगे ग़ालिब
शर्म तुमको मगर नहीं आती
पहले आती थी हाले दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती
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सियासत में लोग ‘नेता’ चिकने घड़े के जैसे हो जाते हैं, उन्हें बुरा कहो, भला कहो, चोर बोलो, गाली दो,,,सब सहते हैं,,,और अपने मन की कहते हैं, करते हैं,,,जनता की बात वह सिर्फ चुनाव में वोट मांगते वक़्त सुनते हैं जिसे सुन कर दूसरे कान से उड़ा देते हैं,,,,,

मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने, उन से देश और जनता को बहुत उम्मीदें थीं, फालतू की उम्मीदें भक्त लोगों को थीं, जो ख़याली पुलाव जैसा थीं, कि पाकिस्तान को मिटा देंगे, चीन को झुका देंगे, अमेरिका क़दमों में पड़ा होगा,,,आदि आदि,,,,भक्तों का क्या है,,,कुछ भी सोच सकते हैं,,,नशा बुरी चीज़ है,,,,

गुजरात का फसाद आरएसएस, बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद् की प्लानिंग का नतीजा थे,,,मोदी का कसूर यह है कि ‘गोधरा ट्रेन’ हादसे के बाद उन्होंने कोई चौकसी नहीं बरती, साथ ही अगले दिन 28 फरवरी 2002 से शुरू हुए दंगों को रोकने के लिए खुद कोई कदम नहीं उठाया,,,दंगों पर कारवाही करने के लिए गुजरात सरकार के ग्रहमंत्रालय को पूरी छूट दे कर रखी गयी, जहाँ अधिकारीयों ने आरएसएस की तरफ से मिले आदेशों का पालन किया,,,,मोदी को बाद में इन दंगों से राजनैतिक फायदा हुआ और वह वहां हिन्दू धर्म के रक्षक की छवि में हिन्दू अवतार बन गए, गुजरात में कई सफल प्रयोग उस दौरान हुए, आतंकवादी और पुलिस एनकाउंटर का परिक्षण ‘इसराईल मॉडल’ पर किया गया,,कितने ही लोगों को मारने के बाद आतंकवादी बता कर उसका फायदा उठाया गया, यह सारे काम गुजरात सरकार का गृहमंत्रलय अमित शाह की देख रेख में कर रहा था,,,अधिकारी लोगों की हत्या करने के बाद बयान देते कि ‘आतंकी मारे गए, मोदी पर हमला करना चाहते थे, इनके ‘तार’ विदेशों तक जुड़े हैं,,,,

2014 में मोदी भारत का प्रधानमंत्री बन गए,,फिर क्या था भक्तों की तो किस्मत खुल गयी,,,अख़लाक़ अहमद को घर के अंदर घुस कर ईद के दिन मार डाला,,,सरकार अपनी है, कोई बिगड़ क्या लेगा,,,जो जेलों में थे उनको छुड़वाया गया, असीमानंद, प्रोहित, प्रज्ञा सभी आज़ाद हो गए,,,गुजरात में फेक एनकाउंटर करने वाले हाथों में तलवार लहराते हुए जेलों से बहार आ गए,,उनकी बहाली हो गयी,,सरकार के पास असीमित ताकात होती है, इस ताक़त का अंदाजा आम आदमी कैसे भी नहीं लगा सकता है,,,सरकार चोर को साहूकार बना दे और साहूकार को चोर,,,सरकार चलती रही भक्त आग उगलते रहे, पाकिस्तान की मुफ्त यात्रा मुसलमानों को कराने की बात कहने वाले मुसलमानों को कब्रिस्तान पहुंचते रहे,,,मोदी के प्रधानमंत्री बनने से कट्टरवादियों को बहुत ख़ुशी थी, उनको लगता था कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वह भारत में बसे मुसलमानों को ‘गन्ने के रास की मशीन में लगा कर’ या ‘कोल्हू’ में पेल देगा,,,मतलब कि मुसलमानों को ठिकाने लगा देगा,,,,बस यही एक बात थी जिसकी वजह से कट्टरपंथियों ने मोदी को वोट दिया और सपोर्ट किया था,,,इस के आलावा मोदी के पास कोई और क्वालिफिकेशन थी नहीं, वैसे मोदी की एजुकेशन क्वालिफिकेशन का मोदी के आलावा पूरे देश में किसी को पता नहीं है|

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने काम बहुत किये, जितनी भी पुरानी योजनायें चल रही थीं, सब के नाम बदल कर नए नाम से लागू की , मीडिया ने खूब वाहवाही की, मोदी भक्ति में चूर भारतीय मीडिया मोदी की महिमा में लगा रहा,,,,मोदी को इतना चढ़ा दिया कि आज उस के गले में हड्डी अटक गयी है,,,नोटबंदी,,,,किसी गंवार की अगर तारीफ कर दो तो वह सातवें आसमान पर पहुँच जाता है,,,मीडिया ने एक नौसिखिये, अनट्रेंड आदमी को महामानव बना दिया,,उस आदमी को भी लगा कि में ऐसा ही हूँ,,,नोटबंदी को भारतीय मोदी भकत मीडिया, बीजेपी के नेता, मोदी के चाहने वालों के आलावा कोई एक भी वियक्ति सही कदम नहीं बतायेगा|

देश जे 33 गैर सरकारी संगठनों द्वारा किए गए सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि 55 फीसदी लोगों का मानना ​​है कि नोटबंदी से कालाधन समाप्त नहीं हुआ और 48 फीसद लोगों की राय है कि आतंकवादी गतिविधियों पर भी इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।

पिछले साल आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी की घोषणा के एक साल बाद देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करने के उद्देश्य से किए जाने वाले इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट आज यहां जारी की गई, जिसमें यह नतीजा सामने आया है। सामाजिक संगठन अनहद की अगुवाई में देश के 21 राज्यों में 3647 लोगों के सर्वेक्षण के दौरान नोटबंदी से संबंधित 96 सवाल पूछे गए थे।

प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता जॉन दयाल, गौहर राजा, सुबोध मोहंती और शबनम हाशमी ने यह रिपोर्ट किया, जिसमें कहा गया है कि केवल 26.6 प्रतिशत लोगों का मानना ​​है कि नोटबंदी से काले धन का सफाया हुआ है, जबकि 55.4 प्रतिशत लोग मानते हैं कि कालाधन नहीं पकड़ा गया। जबकि 17.5 प्रतिशत ने इसका जवाब नहीं दिया।

इसी तरह, केवल 26.3 प्रतिशत लोगों का मानना ​​था कि नोटबंदी से आतंकवाद खत्म हुआ, जबकि 25.3 प्रतिशत ने इसका जवाब नहीं दिया। 33.2 प्रतिशत ने माना कि इससे घुसपैठ कम हुआ है, जबकि 45.4 प्रतिशत लोगों का यह मानना ​​था कि सीमाओं में घुसपैठ में कोई कमी नहीं हुई और 22 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने इसका जवाब नहीं दिया।

नरेंद्र मोदी सरकार भले ही देश में विकास का दावा करे, लेकिन नोटबंदी के बाद इस साल के शुरुआती चार महीनों में 15 लाख लोगों को नौकरियां गंवानी पड़ीं.

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के कन्ज्यूमर पिरामिड हाउसहोल्ड सर्वे में कहा गया है कि मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले के परिणामस्वरूप देश में 15 लाख लोगों की नौकरी चली गई.

इस सर्वे में कहा गया है कि यदि एक नौकरी करने वाले पर चार लोग आश्रित हों तो इस हिसाब से करीब 60 लाख लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हुआ.

सर्वे के मुताबिक, सितंबर-दिसंबर, 2016 के बीच देश में कुल नौकरियों की संख्या 40 करोड़ 65 लाख थी, परंतु नोटबंदी के ठीक बाद जनवरी-अप्रैल 2017 के बीच नौकरियां घटकर 40 करोड़ 50 लाख रह गईं. इसका मतलब है कि नोटबंदी के बाद 15 लाख नौकरियां घट गईं. एमआईई यह सर्वे 1,61,167 परिवारों से बातचीत पर आधारित है.

उधर, फिक्की के त्रैमासिक सर्वे में कहा गया है कि निर्माण क्षेत्र के 73 प्रतिशत नौकरी देने वालों का कहना है कि वे अगले तीन महीने तक कोई भी नई नौकरी देने की स्थिति में नहीं हैं. पिछली तिमाही में यह प्रतिशत 77 था.

बिजनेस स्टैंडर्ड में छपे एक लेख में कहा गया है कि नोटबंदी के बाद धीमी नियुक्यिां बाजार पर और दबाव पैदा कर सकती हैं, जबकि लगातार नौकरियां जा रही हैं. फिक्की का सर्वे ऐसे समय में आया है जब आधे से कम उत्तरदाताओं को ही उम्मीद है कि अगले तीन महीने में उत्पादन में बढ़ोत्तरी होगी.

सिर्फ़ 49 प्रतिशत उत्तरदाता आशान्वित हैं कि अगले तीन महीने में उत्पादन में बढ़ोत्तरी होगी. इसके पहले जनवरी से मार्च की तिमाही में सिर्फ 48 प्रतिशत उत्पादकों को उम्मीद थी कि निर्माण बढ़ेगा.

– परवेज़ ख़ान