#सांस्कृतिक_नरसंहार : मानव और संस्कृति के हत्यारे!

#सांस्कृतिक_नरसंहार : मानव और संस्कृति के हत्यारे!

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अजेष्ठ त्रिपाठी
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#सांस्कृतिक_नरसंहार —

वर्तमान समय में कई समृद्ध सभ्यताओं का वजूद खत्म हो गया है, और उनको समाप्त करने के पीछे संसार के दो सबसे बड़े इब्राहीमी पंथों – इस्लाम और ईसाई – के चरमपंथियों का सक्रिय योगदान है। इन पंथों की ऐसी प्रवृति के पीछे उनकी विस्तारवादी महत्वाकांक्षा है। इस्लाम और ईसाई के अलावा दुनिया के किसी भी पंथ में पूरी दुनिया का धर्मपरिवर्तन कराने का उद्देश्य नहीं है। मुरुभूमि में जन्में इन दो पंथों ने धर्म के नाम पर जीतने लोगों को मारा है, उतने लोग किसी भी विश्व-युद्ध, आकाल या महामारी में नहीं मारे गए। लोगों को मारने के साथ साथ इन्होने वहाँ की संस्कृति का भी समूल नाश कर अपने पंथ को स्थापित किया। जिस प्रकार इस्लाम में गैर-मुस्लिमों को ‘#काफिर’ जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाता है, उसी प्रकार ईसाईयों द्वारा सनातन धर्मियों को ‘#पैगान’ कह कर नीचा दिखाया जाता है। वास्तव में इन दो पंथो जैसा धर्मांध, असहिष्णु तथा विस्तारवादी विश्व में कोई अन्य पंथ नहीं है।
#ईसाई_मिशनरियों ने सबसे पहले यूरोप और उत्तरी अफ्रीका के समृद्ध सांस्कृतिक विविधता का विनाश किया जिनमें यूनानी, मिस्री, कैल्टिक, गोथिक, वाइकिंग और रोमा सहित सैकड़ों सभ्यताएं हैं। इन सभी लोगों को क्रूरतम तरीके से खतम किया गया। विद्वानो, दार्शनिकों, और कलाकारों को वीभत्स तरीके से मारा गया। मंदिरों और पुजा-स्थानों को अपमानित करते हुये निर्ममता से तोड़ा गया। यह विडम्बना ही है, कि जिन चमत्कारों के आधार पर यूरोप की लाखों महिलाओं को ईसाईयों ने जिंदा जला दिया, आज उन्ही चमत्कारों के आधार पर ईसाई पादरी को संत घोषित किया जाता है।

#यूरोप_की_औपनिवेशवादी (colonist) ताकतों ने जब विश्व के तमाम हिस्सों में कब्जा करना शुरू किया तो उनके साथ चर्च की बर्बरता और सभ्यताओं का विनाश करने और इस कृत्यों को सही साबित करने का बहाना भी साथ था। दक्षिणी अमेरिका के माया सभ्यता और अटजेक सभ्यताओं का समूल विनाश करने का काम तो ईसाई मिशनरियों ने खुद स्वयं किया और वहाँ के मंदिरों से सोना, चाँदी व बहुमूल्य मूर्तिओं लूटा व मंदिरों को तोड़ दिया। इसी प्रकार मेक्सिको और उत्तरी अमेरिका के मूल इंडियन निवासियों की जनसंख्या और सभ्यता को भी विनष्ट किया गया। सभ्यता का ही बहाना बना कर यूरोपीय ईसाइयों ने ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों (aborigines) को तो पूरी तरह से ग़ुलाम बना लिया गया और उनकी एक पूरी पीढ़ी को खतम कर दिया गया।

#इसी_प्रकार_इस्लाम ने मोरक्को से ले कर भारत तक सभी देशों पर आक्रमण कर वहाँ के निवासियों को मुस्लिम बनाया, संपत्तियों को लूटा तथा इन देशों में पहले से फल फूल रही सभ्यता का विनाश लगभग नियमित अंतरालों पर किया। अरब आक्रमणकारी मुस्लिम ने बड़ी बेरहमी से ‘काफिरों’ का कत्लेआम किया। ईरान के पारसियों का खात्मा तो मात्र 15 सालों में कर दिया गया। तक्षशिला स्थित विश्व की प्रथम विश्वविद्यालय को तबाह कर दिया गया। मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा जलाए जाने के बाद नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय महीनों तक जलता रहा।

#बल-प्रयोग, कत्लेआम, लूट-पात और आतंक आदि तरीक़े जब नाकाफ़ी पड़ गए तो इस्लामिक षड्यंत्रकारियों ने काफिरों के खिलाफ अन्य गैर-युद्ध तरीक़े अपनाए। जिनमे से ‘#धीम्मी’ और ‘#अल_तकिया’ प्रमुख हैं। धीम्मी उन काफिरों को कहा जाता है, जो अपनी जान-माल और धर्म की सुरक्षा के लिए इस्लामिक राज्य को एक विशेष प्रकार का टैक्स देते हैं जिसे ‘जज़िया’ कहा जाता है। धीरे-धीरे धीम्मी लोग इस्लामिक ज़्यादतियों को जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बना लेते हैं। भारत के अधिकांश भाग में हिंदुओं को सदियों तक धीम्मी की तरह रहना पड़ा है। ‘अल-तकिया’ काफिरों के खिलाफ इस्लामिक जिहाद की दूसरी कारगर रणनीति है। यह तरीका छठें इममिया इमाम जफ़र-अल-सादिक़ (765 CE) के समय विकसित हुई। ‘अल-तकिया’ एक तरीक़े से मुस्लिमों के लिए काफिरों के खिलाफ जिहाद के लिए मक्कारी, धोखेबाज़ी और झूठ बोलने का इस्लामिक प्रमाणपत्र है। यह पूरे विश्व को मुस्लिम बनाने का इस्लामिक लक्ष्य का एक कारगर षड्यंत्र है। इसी तकिया नीति के अनुरूप झूठ बोल कर इस्लाम को शान्तिप्रिय धर्म बताया जाता है, काफिरों की लड़कियों को ‘लव जिहाद’ में फसाने के लिए झूठ का सहारा लिया जाता है तथा इस्लाम की सच्चाई को छुपा कर सूफी का अस्थायी चोला भी पहना जाता है।

#ईसाई_और_मुस्लिम_पंथों की विश्व विजयी महत्वाकांक्षा ने इनके आपसी संघर्ष को भी जन्म दिया है। विश्व के सैकड़ों संस्कृतियों का विनाश करने वाले ये प्रमुख पंथ आपस में भी एक दूसरे के खून के प्यासे हैं। अफ्रीका के कई देश मुस्लिम-ईसाई संघर्ष की आग में जल कर बर्बाद हो गए उनमें से नाइजीरिया, सुडान आदि प्रमुख है। इन पंथों के विस्तारवादी खूनी टकराव को सैमुअल हंटिंगटन ने अपनी पुस्तक ‘सभ्यताओं का टकराव’ में विस्तार से लिखा है। वास्तव में यह टकराव इन दो पंथों के बीच का ही है, जिसमें छोटी-छोटी किन्तु समृद्ध सभ्यताओं का नरसंहार हो रहा है।

#विशेष – डॉ. अमित श्रीवास्तव का कथन की – संस्कृति का मानव सभ्यता से गहरा संबंध है। सभ्यता की आत्मा वहां की संस्कृति है। संस्कृति के खत्म होते ही सभ्यता का भी विनाश हो जाता है। इसका ज्वलंत उदाहरण हमने यूनान, रोम और मिस्र आदि सभ्यताओं के विलुप्त होने में देख सकते हैं। लोग भले ही उन पुरानी सभ्यताओं में रहने वाले लोगों के ही वंशज हों, किन्तु आज वे सांस्कृतिक रूप से बिलकुल अलग हैं। इस प्रकार संस्कृति मानव सभ्यता की आत्मा है। वर्तमान समय के सभी वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियां इन पुरातन सभ्यताओं की ही देन है। विज्ञान, गणित व खगोल के लगभग सभी प्रारंभिक ज्ञान भारतीय, चीनी, यूनानी, एवं सभ्यताओं से लिए गए हैं। और ईसाई समुदाय और मुस्लिम समुदाय ने इन्हें सिर्फ बर्बाद किया है कई सभ्यताओ और सांस्कृतिक नरसंहार की वजह यही दो धर्म रहे है ।।

#चित्र –
इस्लामिक स्टेट द्वारा विध्वंसित पाइमिरा के सांस्कृतिक धरोहर

#नोट — पैग़ानिस्म और धिम्मी से लोग अभी अनजान है इसके विषय मे आगे पोस्ट होंगी ।। पोस्ट को कॉपी पेस्ट कीजिये नाम देने की कोई जरूरत नही है ।।