हाँ…..मैं ग़रीब की बेटी हूं!!!!

हाँ…..मैं ग़रीब की बेटी हूं!!!!

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Chaitali Khattar
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हाँ
मैं गरीब की बेटी हूं
जिंदगी को सितम मैं कहती हूं
मजबूरियों में भी खुश रहती हूं
चंद बूंदों से पेट भर लेती हूं
क्योंकि मैं गरीब की बेटी हु
ठंडी में ठिठुर लेती हूं
बरसात में भीग लेती हूं
गर्मी पाँव जलाती है
तो
पत्थरों पे मैं सो लेती हूं
क्योंकि
मैं गरीब की बेटी हूं
कभी सब्जी तो कभी कुछ न मिले
नमक, रोटी पे मैं जी लेती हूं
जख्म चाहे जैसा भी हो
थोड़ी हल्दी लगा लेती हूं
क्योंकि
मैं गरीब की बेटी हू
एक सलवार, एक समीज
रोज बिना साबुन मैं धोती हू
बड़ी दुकानों की रौनक देख
अक्सर मैं खुश हो लेती हूं
क्योंकि
मैं गरीब की बेटी हूं
गम भी बहुत है, दर्द भी बहुत है
दिल में सब दबा लेती हूं
कभी अकेली तो कभी सबके सामने
आंखों से आंखों भिगों लेती हूं
क्योंकि
मैं गरीब की बेटी हूँ..
सर्दियां शरू हो गयी है सभी ने कम्बल रजाई निकाल ली है शॉपिंग मॉल से ब्रांडेड कार्डिगन्स आ गए हैं सबकी निगाहें टिकी हुई है अमीर लाड़लियों पे क्योंकि कभी किसी गरीब की बेटी किसीकी लाडली नहीं होती न परी गुड़िया रानी वो तो बस एक बोझ है उनके दहेज़ पे कि डिज़ाइनर से उन्होंने शादी की शॉपिंग की होगी आज कानपुर में लंगर था पर वहाँ भी गरीबो के लिए जगह नहीं इन तस्वीरों में दो बच्चियां है एक के पास तोह इस सर्द मौसम में भी कपड़े तक नहीं यही भारतीय संस्कृति सभ्यता इंसानियत है कलयुग की , कभी किसी के लिए कुछ अच्छा भी करना चाहिए जब शॉपिंग करने जाये तोह इन जैसे बच्चो बुजुर्गों के लिए कपड़ा स्वेटर शाल ले आये हम अक्सर उस वक़्त को याद कर रुख जाते है जब हमें जरुरत थी तब हमारे लिए कौन खड़ा हुआ था ज़िन्दगी सिर्फ़ बदला लेने या बीती पुरानी कड़वी यादों का नाम नही ये ज़िन्दगी लड़ने झगड़ने के लिए बहुत छोटी है और जीने के लिए बहुत बड़ी है ।
हम सबने अपने जीने का तरीका बहुत आधुनिक कर लिया है बच्चो को बड़े बड़े कॉलेजेस में बाहर पढ़ने भेजा रैगिंग उत्पन्न हो गयी हर संडे मॉल में फिल्म देखने जाने लगे फैट नाम की बीमारी हर घर में होने लगी 350 रूपए कोक और पॉपकॉर्न का पैकेज लेते हैं फिर 1500 महीने का gym या पर्सनल ट्रेनर रखे तो 7-8 हज़ार का खर्च , ज़्यादा दहेज़ देने की होड़ में घर बसें कम उजड़े ज्यादा hangout करना सिखाया बच्चो को अब बच्चे स्कूल कॉलेज से घर ही वापस नही आते आज रात यहाँ सुबह कहाँ किसीको पता नहीं कार गाड़ियों से चलना शान है इतना प्रदुषण बड़ा लिया कि स्मॉग शरू हो गया गंगा मैली हो गयी और बिसलरी की बोत्तले शुद्ध ,अक्सर फिल्मों या आम दुनिया में कई रईसों को देखकर हम सीखते हैं ये दिन भर शराब पीते हैं उसे हम कल्चर मान तुरंत अपना लेते हैं मगर संस्कृति बोझ लगती हैं कमाल है जो अपना है असली है वो बोझ जो पराया है नकली है उसको सीने से लगाना है और ज़माने के सामने कूल बन दिखाना है इन अमीर लड़कों से लड़के शराब पीना लड़कियों के चक्कर पालना सीखते हैं फिर क्या होता हैं थाने में शोषण के लिए में पुलिस के नर्म नर्म डंडे , शराब धुम्रपान से कर्क रोग जिसके इलाज़ के लिए पैसे तक नही बचते ।
हम सभी ने अपनी बुरा वक्त देखा है उस बीते वक़्त को वापस नही ला सकते पर आने वाला कल बेहतर बना सकते हैं अगर बचपन दुबारा जीना है तो इन मासूम बच्चों के साथ जीए किसने कहा वो बचपन वाली बातें अब नही होती वो मासूमियत शरारतें अब नही होती ।