14 नवम्बर का इतिहास : 14 नवंबर 1889 को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु का जन्म हुआ था

14 नवम्बर का इतिहास : 14 नवंबर 1889 को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु का जन्म हुआ था

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14 नवम्बर सन 1973 ईसवी को ब्रिटेन की राजकुमारी एन ने आम नागरिक से शादी की। इससे पहले राजघराने में कभी एसा नहीं हुआ था।

14 नवम्बर सन 2006 ईसवी को भारत तथा पाकिस्तान के विदेश सचिवों ने नई दिल्ली में एंटी टेररिज़्म मैकेनिज़्म बनाने पर सहमति की।

14 नवम्बर सन 1533 ईसवी को स्पेन के खोजकर्ताओं ने दक्षिणी अमरीका के उत्तर पश्चिम में स्थित एक्वाडोर का पता लगाकर उसे अपने उपनिवेश में शामिल कर लिया। लगभग 3 शताब्दियों तक एकवाडोर पर स्पैनिश साम्राज्य का नियंत्रण रहा परंतु सन 1822 में साइमन बोलिवर के नेतृत्व में होने वाले जनान्दोलन के कारण यह क्षेत्र स्वतंत्र हो गया। इस प्रकार एकवाडोर ग्रेट कोलम्बिया फेडरेशन में शामिल हो गया परंतु 8 ही वर्षों बाद फेडरेशन को समाप्त कर दिया गया और एकवाडोर सहित फेडरेशन के सभी सदस्य अलग हो गये और एकवाडोर में लोकतंत्र स्थापित हो गया।

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14 नवंबर वर्ष 1889 को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु का जन्म उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुआ था। जवाहरलाल नेहरू ने दुनिया के कुछ बेहतरीन स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो से, और कॉलेज की शिक्षा ट्रिनिटि कालेज लंदन से पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने अपनी लॉ की डिग्री कैंब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की। जवाहरलाल नेहरू 1912 में भारत लौटे और वकालत आरंभ की। 1917 में जवाहर लाल नेहरू होम रूल लीग में शामिल हो गए। राजनीति में उनकी असली दीक्षा दो साल बाद 1919 में हुई जब वे महात्मा गांधी के संपर्क में आए। उस समय महात्मा गांधी ने ब्रिटिश क़ानून के विरुद्ध एक अभियान शुरू किया था। जवाहर लाल नेहरू ने 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और इस दौरान पहली बार गिरफ्तार किए गए। कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। 1926 में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से सहयोग की कमी का हवाला देकर त्यागपत्र दे दिया। सन् १९४७ में भारत को स्वतंत्रता मिलने पर जब भावी प्रधानमंत्री के लिये कांग्रेस में मतदान हुआ तो सरदार पटेल को सर्वाधिक मत मिले। उसके बाद सर्वाधिक मत आचार्य कृपलानी को मिले थे किन्तु गांधीजी के कहने पर सरदार पटेल और आचार्य कृपलानी ने अपना नाम वापस ले लिया और जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया। उन्हें वर्ष 1955 में भारत रत्न से सम्मनित किया गया। 27 मई वर्ष 1964 को उनका निधन हो गया।

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14 नवम्बर सन 1716 ईसवी को वेल्हम लाएबनिटज़ नामक जर्मन गणितज्ञ और दर्शनशास्त्री का 70 वर्ष की आयु में निधन हुआ। वे वर्ष 1646 ईसवी को पैदा हुए और 15 वर्ष की आयु से गणित तथा दर्शनशास्त्र का गहरा अध्ययन आरंभ कर दिया और इन विषयों में डॉक्ट्रेट की डिग्री ली।

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23 आबान सन 1294 हिजरी शम्सी को ईरान की तीसरी संसद इस देश की क़ाजार शासन श्रृंखला के अंतिम नरेश अहमद शाह के आदेश पर भंग कर दी गयी। यह अनुचित क़दम अहमद शाह ने ब्रिटेन और रुस के मंत्रियों से भेंट के पश्चात उठाया। उस समय ब्रिटेन और रुस का प्रयास था कि प्रथम विश्व युद्ध में वे ईरान को जर्मनी के विरुद्ध मैदान में खींच लें। इसी उद्देश्य से इन देशों ने अपनी सेनाएं ईरान रवाना कीं। दक्षिणी ईरान में ब्रिटेन ने और उत्तरी ईरान में रुस ने अपनी सेना पहुँचाई। रुस की सेना राजधानी तेहरान की ओर बढ़ी इस पर कुछ सांसदों ने विरोध प्रकट करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा समिति का गठन किया। किंतु यह समिति कुछ न कर सकी क्योंकि अयोग्य राजनेताओं के सत्ता में होने के कारण ईरानी सरकार बहुत कमज़ोर हो चुकी थी। अंतत: वर्ष 1917 में रुस में क्रान्ति आने के बाद इस देश की सेनाएं उत्तरी ईरान से वापस गयीं किंतु दक्षिणी ईरान में ब्रिटिश सेना यथावत बनी रही और उसने अपनी पिटठू सरकार को सत्ता में पहुँचा कर ईरान में अपने साम्राज्यवादी हितों की पूर्ति का प्रयास किया।

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14 सफ़र सन 632 हिजरी क़मरी को मुसलमान इतिहासकार न्यायाधीश और धर्मगुरू इब्ने शद्दाद का निधन हुआ। उनका पूरा नाम अबुल महासिन बहाउददीन था। वे सन 539 हिजरी क़मरी में इराक़ के मूसिल नगर में जन्में थे। बचपन में कुरआन का स्मरण करने के पश्चात वे हदीस, तफ़सीर, इतिहास आदि विषयों में लीन हो गये। शिक्षा प्राप्ति के पश्चात वे बग़दाद के निज़ामिया शिक्षा केंद्र में शिक्षा देने लगे। बाद में उन्होंने अधिक ज्ञान की खोज में बहुत से इस्लामी देशों की यात्राएं कीं। जब वे सीरिया गये तो इस्लामी नियमों और जेहाद से संबंधित एक पुस्तक प्रसिद्ध सेनापति सलाहुद्दीन अययूबी को उपहार स्वरूप दी। उनकी सलाहुद्दीन अययूबी से मित्रता हो गयी और वे सलीबी युद्ध के दौरान इतिहासकार के रूप में सलाहुद्दीन अययूबी के साथ साथ रहे और विश्व विख्यात पुस्तक अन्नवादिरूस्सुलतानिया लिखी।