#ईवीएम : आधुनिक मोहिनी…!!

#ईवीएम : आधुनिक मोहिनी…!!

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#कीर्तिकुमार
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भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। और अमरीका विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र है। पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को परिभाषित करते हुए कहा था कि, लोकतंत्र जनता की अपनी जनता के लिए जनता द्वारा संचालित व्यवस्था है! सन 1950 में भारतीय संविधान लागू होने के साथ भारत ने 550 से भी अधिक देसी रजवाड़ों में बँटे भारत को एक कर लोकतंत्र को अपनाया। भारत को लोकततंत्र का जामा पहनाने वाले आर्शद्रष्टा डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर ने सोचा था कि सदियों की असमान जातिवादी व्यवस्था से पीड़ित भारत के बहूजनों की मुक्ति का मार्ग लोकतंत्र के माध्यम से बहूजनों द्वारा सत्ता के सूत्र अपने हाथों में ले कर ही निकल सकता है।

उनका यह आकलन बिलकुल सही था! क़रीबन 50 साल के बाद भारत का बहुजन सत्ता के क़रीब पहुँचा ही था लेकिन भारत में ब्राह्मणवादी जातिव्यवस्था को बरक़रार रखने व मज़बूती से टिकाए रखने के लिए काम करने वाले ब्राह्मणों के संगठन आरएसएस के षड्यंत्रकारी जातिवादी ब्राह्मणों के इशारों पर लोकतंत्र और भारतीय संविधान को मिटाने की साज़िशें तेज़ हो गई। जातिवादी ब्राह्मणों का सत्ता पर टिके रहने के लिए किसी न किसी रूप से बहूजनों को शासन व्यवस्था से दूर रखना ज़रूरी था। इसी साज़िश के तहत चुनावों में बैलट पेपर की जगह EVM यानी की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल की रणनीति अपनायी गई और 2004 के सामान्य चुनाव से इसे लागू कर दिया गया। शुरू में तो ये बहुत ही सरल और आधुनिक तकनीक लगी लोगों को, लेकिन फिर तर्क और संशय की कसौटी पर खरे न उतरने पर इस यंत्र पर सवाल उठने लगे। और विरोध भी बिलकुल लाज़मी है, आख़िरकार सवाल सबसे बड़े लोकतंत्र का है!

तकनीक और आधुनिकता में भारत से कई आगे रहे राष्ट्र अब भी ईवीएम का स्वीकार नहीं कर रहे। जर्मनी ने ईवीएम को बैन कर दिया, अमरीका को भी ईवीएम पर भरोसा नहीं, यूरोप, जापान, ओस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश ईवीएम को नकार चुके है। तो फिर सवाल यह है कि भारत में इतने विरोध के बावजूद भी ईवीएम का इस्तेमाल क्यों हो रहा है..?! पहली बार जब देश में चुनाव हुए तो ब्राह्मणों की बोलबाला थी, 22 में से 13 मुख्यमंत्री ब्राह्मण थे! और 30% ब्राह्मण लोकसभा में पहुँचे थे। 90 के दशक तक भारी बहुमत से सरकारें बनी, लेकिन मंडल की रिपोर्ट के बाद सीट बचाने के लाले पड़ गए थे। इस माहौल में ईवीएम को लाया जाता है और फिरसे सत्ता में साम्प्रदायिक जातिवादी ताक़तों की पकड़ मज़बूत बनती है! सत्ता हथियाने में जालसाज़ी करना कोई नई बात नहीं! इंद्रासन पाने के लिए देव-असुर संग्राम में मोहिनी ने छल से देवों को विजयी बनाने के लिए अमृत पिलाया था, आज फिरसे साम्प्रदायिक जातिवादी ताक़तों की सत्ता बरक़रार रखने के लिए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ईवीएम का सहारा ले रहे है!

नोटबंदी के बाद बेंक में जमा नोटों को मशीन की गिनती पर भरोसा न करके मशीन से गिनने के बाद हाथों से गिना जाता है, तो फिर सबसे बड़े लोकतंत्र के भविष्य का आधार मशीन पर कैसे रख सकते है..?!! ईवीएम एक ख़तरनाक षड्यंत्र है। गुजरात में 9 तारीख़ को ईवीएम के ज़रिए होने जा रहे चुनाव का में बहिष्कार करता हूँ और एक मज़बूत लोकतंत्र के लिए बैलेट पेपर आधारित पारंपरिक मताधिकार प्रयोग व्यवस्था का समर्थन करता हूँ। अगर आप भी निस्पक्ष और मज़बूत लोकतंत्र के समर्थक है, तो आगे आए और ईवीएम से हो रहे चुनाव का बहिस्कार करें। और बैलेट पेपर आधारित चुनावी व्यवस्था की माँग करें।

#कीर्तिकुमार