‘थ्री डार्क नाइट्स’_मुसलमानों के साथ पुलिस के अत्याचारों की कहानी!

‘थ्री डार्क नाइट्स’_मुसलमानों के साथ पुलिस के अत्याचारों की कहानी!

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परवेज़ ख़ान
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अब तक रात हो चुकी थी, क्या वक्त था इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता।
अधिकारी और सिपाही एक-एक कर क़मरे से बाहर जाते रहे और मैं कुछ देर के बाद क़मरे में अकेला रह गया।
पंखा अपनी सुस्त रफ़्तार से चल रहा था, इसकी हवा क़मरे में मालूम भी नहीं पड़ रही थी।
गर्मी और गंदगी की वजह स,े गंदगी वो जो मारपीट के वक्त ज़मीन की धूल मिट्टी मेरे जिस्म पर चिपट गयी थी, से पसीना आ रहा था।
अकेला बैठा मैं सोच रहा था कि ये लोग किस आफ़त मेें फंसाना, उलझाना चाहते हैं।
क़मरे का दरवाज़ा एक बार फिर खुला, इस बार राजेश द्विवेदी अपनी पुलिस यूनिफ़ार्म में अंदर दाखि़ल हुये।
तैयारी के साथ आये थे
आते ही बड़े प्यार से मुझे समझाना शुरू कर दिया, कहने लगे…..नेताजी अब आप छूटने वाले नहीं हैं।
आप इन्हें बता दें कि अपहरण में आपका हाथ है।
द्विवेदी की ओर देखते हुये मुझे हैरत हो रही थी…..
मैंने कहा…..आप मुझे जानते हैं मेरा अपहरण से दूर-दूर तक का वास्ता नहीं है…फिर भी आप ऐसी बात बोल रहे हैं।
द्विवेदी….नेताजी आपके मना करने से क्या होता है, मैं तो आपकी हमदर्दी में कह रहा हूं, ये जल्लाद किस्म के लोग हैं आपको बहुत…,!!!!
द्विवेदी मेरे साथ अकेले बहुत देर तक बात करते रहे….,
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ये 7 जुलाई 2006 की रात थी।
रात काफ़ी हो चुकी थी…संजीव कुमार यादव भी कमरे में आ पहुंचे, ये उस समय एस.ओ.जी प्रभारी हुआ करते थे। उन्होंने मुझे अपने साथ कमरे से बाहर चलने को कहा…,
मैं अपनी जगह से हलका सा सहारा लेकर उठा।
पिटाई की वजह से टांगों पर सूजन आ गयी थी।
संजीव कुमार के पीछे-पीछे चलता हुआ क़मरे के बाहर आ गया…,
राजेश द्विवेदी भी बाहर चले आये।
हवाई पट्टी के अंदर बिजली के खंभों पर ट्यूबलाईट्स जल रही थी…,जहां तक ट्यूबलाईट की रोशनी जा रही थी उसके बाद घना अंधेरा नज़र आ रहा था।
यहां पुलिस की दर्जनों गाडिय़ां खड़ी थी…,
बड़ी तादात में जो लगभग 100-150 रही होगी..,पुलिस वाले मौजूद थे।
संजीव कुमार ने मुझे एक जगह रूकने को कहा..,मैं अपनी जगह पर ठहर गया।
सामने थोड़ी दूरी पर कुछ कुर्सियां बिछी हुई थी जिन पर पांच लोग जिनमें तीनों क्षेत्राधिकारी, एक अन्य पुलिस अधिकारी और जगदीश शर्मा बैठे हुये थे।
मैंने, पास खड़े हुये राजेश द्विवेदी से पेशाब करने के लिये कहा….कि मुझे तेज़ पेशाब लग रहा है।
उन्होंने एक तरफ़ जाकर फ़ारिग होने के लिये इजाज़त दे दी।
तैनात पुलिस वाले अपनी-अपनी रायफ़लें संभाले सचेत खड़े थे।
इनसे बच कर एक तरफ़ को मैं पेशाब करने के लिये बैठ गया…लेकिन इस वक्त मेरा इरादा यहां से भागने का भी था।
चारों तरफ़ नजर दौड़ाने के बाद अंदाज़ा नहीं हो पा रहा था कि दीवार कितनी दूरी पर है और उसकी ऊंचाई क्या है?
असमंजस की स्थिति बनी हुई थी…बच कर भागने का कोई सही रास्ता नज़र न आया तो पेशाब करके शराफ़त के साथ वापस आकर खड़ा हो गया।
संजीव कुमार यादव ने आवाज़ देकर…जहां अधिकारी कुर्सियों पर बैठे थे बुलाया।
मैं लगभग टहलता हुआ वहां पहुंचा।
अब तक मैं अंदर से अपने दिल को पुख़्ता कर चुका था…अधिकारियों के नज़दीक़ पहुंचने पर जगदीश शर्मा ने मुझे दोनों हाथ कांधे की सीध में फैलाकर खड़ा कर दिया और लाठी लेकर संजीव कुमार यादव पीछे खड़ा हो गया।
देर तक इस तरह हाथ फैलाये रहने की वजह से कांधों में थकान महसूस होने लगी, मेरे चाहने पर भी हाथ सीघे नहीं रह पा रहे थे, वो अपने आाप नीचे गिरने लगे तो पीछे से संजीव कुमार ने दोनों बाजुओं पर एक-एक लाठी कस के मारी। मैं फिर हाथ फैलाकर खड़ा हो गया…,
इस वक्त स्कूल में किसी ग़लती पर बच्चों को दी जाने वाली पनिश्मेन्ट का ध्यान मन में आ रहा था।

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परवेज़ ख़ान

-book three dark knights will be in market in januavry 2018, a real story in true word dscribe the police action against muslims in india.