#नियाज़_फ़ातिहा_की_हक़ीक़त

#नियाज़_फ़ातिहा_की_हक़ीक़त

Posted by

by सिकन्दर कायमखानी
===============
हमारे मआशरे में एक चीज़ जो खास तौर पे बहुत से मुसलमानों के घरों में देखी जा सकती है, वो है नियाज़ करवाना या फातिहा दिलाना जिसमे खाने-पीने की चीज़ों को सामने रखते हैं और सुरह फातिहा और दीगर क़ुरआनी सूरतें और आयतें पढ़ी जाती हैं और फिर आखिरी में पीर-ओ-पैगम्बरों की नज़र की जाती है.
क्या ये नज़र-ओ-नियाज़, ये फातिहा दिलाना सही है??
सबसे पहले हम क़ुरआन और हदीस पे गौर करते हैं :
अल्लाह तआला क़ुरआन में फरमाता है “हमने तुम्हारे लिए दीन को मुकम्मल कर दिया”
(सुरह माएदा, आयत नंबर 3)
Surah maaida aayat 3
“तुम पे हराम किया गया मुरदार और खून और खिंजीर का गोश्त, और जिस पे अल्लाह के सिवा किसी और का नाम पुकारा गया हो.”
(सुरह बकरा आयत 173, सुरह माएदा 3, सुरह अनाम 145 सुरह नहल 115)
हज़रते आयशा रजि० से रिवायत है के मुहम्मद स० अलैह० फरमाते हैं के जिसने हमारे दीन में कुछ ऐसी बात शामिल की जो उसमे से नहीं है तो वो मरदूद है.
(सहीह बुखारी 2697, सहीह मुस्लिम 1718)
एक हदीस है के मुहम्मद स० अलैह० फरमाते हैं “” दीन के अंदर नयी नयी चीज़ें दाखिल करने से बाज़ रहो, बिला शुबहा हर नयी चीज़ बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है और हर गुमराही जहन्नम में ले जाने वाली है.”
(अबु’दाऊद किताब अल सुंनह 7064)
रसूलल्लाह स० अलैह० ने फ़रमाया “सबसे बेहतरीन अमर (अमल करने वाली) अल्लाह की किताब है और सबसे बेहतर तरीका मुहम्मद स० अलैह० का तरीका है, और सबसे बदतरीन काम दीं में नयी नयी बातें पैदा करना है, और हर नयी बात गुमराही है “
(इबने माजा जिल्द 1 हदीस 45)
.
इसके अलावा भी दलील के लिए न जाने कितनीही क़ुरआनी आयतें और हदीसें मौजूद हैं जो इस बात की दलील देती हैं के दीन में कोई नयी चीज़ ईजाद न करो और खाने पीने की चीज़ों पे सिर्फ अल्लाह का नाम लो ताकि वो तुम्हारे लिए हलाल हो जाये.
अब ज़रा ग़ौर फरमाते हैं नियाज़ फातिहा के तरीके और उस से जुडी बातों से.
नियाज़ फातिहा के ग़लत होने की दलील:-
1.
आपने देखा होगा के नियाज़ फातिहा जब भी होती है तो किसी पीर या बुज़ुर्ग या किस औलिया-ओ- पैगम्बर के नाम की होती है, मतलब उनका नाम लिया जाता है बेशक उनके नाम लेने के पहले क़ुरआनी सूरतें और आयतें पढ़ी जाती है मगर जब भी किसी और का नाम आ जाये तो फिर वो खाने की चीज़ हराम हो जाती है. इसलिए नियाज़ फातिहा दिलाना सरासर ग़लत है और गुनाह है.
2.
अगर कुछ लोग इस बात पे बहस करें के अगर हमने सिर्फ क़ुरआनी आयतें पढ़ी तो फिर तो वो हलाल हुआ क्यूंकि क़ुरआन अल्लाह का कलाम है…तो ऐसे समझदार लोगों से मैं पूछना चाहता हूँ के क्या किसी हदीस या क़ुरआन से इन्हे ऐसा करने की दलील मिलती है के कभी मुहम्मद रसूलल्लाह स० अलैह० ने या उनके सहबाओं ने ऐसा किया हो के खाने पीने के सामन सामने रख कर क़ुरआन की तिलावत की हो और फिर खाया हो??
नहीं ऐसी कोई दलील किसी सही हदीस में नहीं है. मतलब साफ़ हुआ के लोगों ने अपनी तरफ से दीन में इस नयी चीज़ का ईजाद किया है, फिर तो ये बिदअत है और हर बिदअत गुमराही है.
3.
कुछ जाहिल लोग ये दलील देते हैं के खाने पे क़ुरआन की तिलावत करने से खाना हराम होता है तो फिर बिस्मिल्लाह कहने से भी कहना हराम हो गया. सबसे पहली बात के क़ुरआन की आयतें तिलावत करने से खाना हराम नहीं होता बल्कि तुम्हारा ये फेल (खाने पे तिलावत करना) बिदअत है क्यूंकि न तो मुहम्मद स० अलैह० ने कभी खाने को सामने रख कर तिलावत की और न ही उनके सहाबियों से कभी सुबूत मिला, हाँ खाने से पहले बिस्मिल्लाह के तमाम सुबूत मौजूद हैं.
4.
कुछ मौलवी जिन्होंने दीन को अपना कारोबार बन लिया है वो मेरे उन भाइयों को, जिन्हे दीन की समझ कम है ये दलील देते हैं के खाने की चीज़ पे तो हमने क़ुरआन पढ़ी और ये तो और भी अच्छी बात है फिर भी ये लोग ऐतराज़ करते हैं….. मैं अपने उन भाइयों को बताना चाहता हूँ के जैसे नमाज़ की एक रकत में सिर्फ दो ही सजदे हैं और अगर तीसरा सजदा किया तो ये गुनाह होगा बेशक सजदे के दौरान हम अल्लाह की तारीफें करें, मगर ये काम गुनाह हो गया क्यूंकि ये बिदअत है मतलब दीन-इ-इस्लाम में नयी चीज़ जोड़ी हमने इसलिए ये गुनाह है. उसी तरह से खाने की चीज़ें सामने रख कर क़ुरआन पढ़ें तो ये भी बिदअत हो जाती है क्यूंकि ये किसी हदीस से या क़ुरआन से साबित नहीं है.
सबसे आखरी बात ,वो ये के क्या दीन का कारोबार चलने वाले हमारे मौलवियों को लगता है की हमारा दीन मुकम्मल नहीं हुआ,जो वो इसमें नयी चीज़ें जोड़े जा रहे हैं …जबकि अल्लाह फरमाता है के हमने तुम्हारे दीन को मुकम्मल कर दिया.
मतलब ये अल्लाह के कलाम को ताक पे रख कर (नउजुबिल्लाह) अपनी मनमानी करते रह रहे हैं और जिन्हे दीन की सही समझ नहीं है उन्हें भी बहका रहे हैं और न जाने कहाँ कहाँ से झूटी दलीलें दे रहे हैं जबकि हमें तो बस वही काम करनी चाहिए जिसका हुक्म अल्लाह और उसके रसूल ने दिया हो या मुहम्मदुर रसूलल्लाह से साबित हो और सहाबाओं ने किया हो.
ऊपर की तमाम बातों से ये साबित हुआ के नियाज़ फातिहा दीन में नयी ईजाद करदा अमल हैं जो की बिदअत है और हमे इस गुमराही से बचना चाहिए. बजाये सवाब के हम गुनाह की तरफ जा रहे हैं.
अल्लाह तआला से दुआ है के हम तमाम मुसलमान भाइयों को सही दीन पे अमल करने की तौफ़ीक़ अत फरमाए और जो दीन के रास्ते से भटक गए हैं उन्हें रहे रास्त पे ला दें (आमीन)
पॉस्ट by सिकन्दर कायमखानी