पुरुष सूक्त के विषय मे *BJP* प्रवक्ताओं की भ्रान्ति …..

पुरुष सूक्त के विषय मे *BJP* प्रवक्ताओं की भ्रान्ति …..

Posted by

डॉ विवेक आर्य via Mudit Mishra

=============
पुरुष सूक्त के विषय मे *BJP* प्रवक्ताओं की भ्रान्ति …..
भाजपा प्रवक्ता *सुधांशु त्रिवेदी* जी जातिवाद की उत्पत्ति वेदों के पुरुष सूक्त से मानते है। आजतक के प्रोग्राम में ओवैसी के साथ वार्तालाप में उन्होंने यह कहा। साथ में जब *ओवैसी ने ब्राह्मण बनाने का निवेदन किया* तो भी सुधांशु त्रिवेदी जी ने कोई उत्तर नहीं दिया।
_*काश सुधांशु त्रिवेदी*_ ने पुरुष सूक्त के वास्तविक अर्थ को और शुद्धि के उद्देश्य को समझा होता।
उन्होंने ओवैसी को कहा होता कि _*मैं आपको ब्राह्मण बनाने को तैयार हूँ। क्या आप क़ुरान, कलमा और सुन्नत छोड़ने को तैयार है?*_ ओवैसी का मुँह न खुलता। अब पुरुष सूक्त के सत्य को जानिए।
पुरुष सूक्त 16 मन्त्रों का सूक्त है जो चारों वेदों में मामूली अंतर में मिलता है। पुरुष सूक्त जातिवाद का नहीं अपितु वर्ण व्यस्था के आधारभूत मंत्र हैं जिसमे *“ब्राह्मणोस्य मुखमासीत”* ऋग्वेद 10/90 में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र को शरीर के मुख, भुजा, मध्य भाग और पैरों से उपमा दी गयी है। इस उपमा से यह सिद्ध होता हैं की जिस प्रकार शरीर के यह चारों अंग मिलकर एक शरीर बनाते है, उसी प्रकार ब्राह्मण आदि चारों वर्ण मिलकर एक समाज बनाते है। जिस प्रकार शरीर के ये चारों अंग एक दुसरे के सुख-दुःख में अपना सुख-दुःख अनुभव करते है। उसी प्रकार समाज के ब्राह्मण आदि चारों वर्णों के लोगों को एक दुसरे के सुख-दुःख को अपना सुख-दुःख समझना चाहिए। यदि पैर में कांटा लग जाये तो मुख से दर्द की ध्वनि निकलती है और हाथ सहायता के लिए पहुँचते है उसी प्रकार समाज में जब शुद्र को कोई कठिनाई पहुँचती है तो ब्राह्मण भी और क्षत्रिय भी उसकी सहायता के लिए आगे आये। सब वर्णों में परस्पर पूर्ण सहानुभूति, सहयोग और प्रेम प्रीति का बर्ताव होना चाहिए। इस सूक्त में शूद्रों के प्रति कहीं भी भेद भाव की बात नहीं कहीं गयी है।
कुछ अज्ञानी लोगो ने पुरुष सूक्त का मनमाना अर्थ यह किया कि ब्राह्मण क्यूंकि सर है इसलिए सबसे ऊँचे हैं अर्थात श्रेष्ठ हैं एवं शुद्र चूँकि पैर है इसलिए सबसे नीचे अर्थात निकृष्ट है। यह गलत अर्थ हैं क्यूंकि पुरुषसूक्त कर्म के आधार पर समाज का विभाजन है नाकि जन्म के आधार पर ऊँच नीच का विभाजन है।
इस सूक्त का एक और अर्थ इस प्रकार किया जा सकता है की जब कोई व्यक्ति समाज में ज्ञान के सन्देश को प्रचार प्रसार करने में योगदान दे तो वो ब्राह्मण अर्थात समाज का सिर/शीश है, यदि कोई व्यक्ति समाज की रक्षा अथवा नेतृत्व करे तो वो क्षत्रिय अर्थात समाज की भुजाये है, यदि कोई व्यक्ति देश को व्यापार, धन आदि से समृद्ध करे तो वो वैश्य अर्थात समाज की जंघा है और यदि कोई व्यक्ति गुणों से रहित हैं अर्थात शुद्र है तो वो इन तीनों वर्णों को अपने अपने कार्य करने में सहायता करे अर्थात इन तीनों की नींव बने,मजबूत आधार बने।
_*विडम्बना देखिये जब पुरुष सूक्त के विषय में भाजपा प्रवक्ता जैसे लोगों को भ्रान्ति है। तो फिर अम्बेडकवादी, नास्तिक, साम्यवादी, सनातनी मुसलमान और ईसाईयों को कौन समझायेगा?*_
डॉ विवेक आर्य