मंदिरों में हर साल चढ़ने वाले सोने को विकास के कामों में ख़र्च करें तो देश का कायापलट रातों रात हो सकता है

मंदिरों में हर साल चढ़ने वाले सोने को विकास के कामों में ख़र्च करें तो देश का कायापलट रातों रात हो सकता है

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देश में 6,53,785 गांव हैं और शायद ही कोई ऐसा गांव हो जहां औसतन 1-2 धार्मिक स्थल न हों, कहने का मतलब यह है कि 3 गांवों में कम से कम 5 धार्मिक स्थल (मंदिर, मस्जिद मजार.. सभी) तो होते ही हैं, तो इनकी कुल संख्या होगी लगभग 10 लाख 50 हजार।
इनमें शहरों में मौजूद मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों या गिरजाघरों की संख्या शामिल नहीं है, अगर शहरों में मौजूद मंदिरों को भी जोड़ दिया जाये तो ये संख्या होती है लगभग 15 लाख।

अब सरकारी आंकड़े पर नजर डाले सरकार के मुताबिक भारत में 6 लाख से भी अधिक मंदिर हैं और इनमें से 1लाख 8 हजार पंजीकृत मंदिर हैं।
अब थोड़ा आगे देखते है- इनमें कई मंदिर ऐसे है जिनका सालाना चढ़ावा भारत के बजट के कुल योजना व्यय के बराबर होगा। अकेले 10 सबसे ज्यादा धनी मंदिरों की ही संपत्ति देश के 100 मध्यम दर्जे के टॉप 500 में शामिल उद्योगपतियों से अधिक है।

देश में हर साल आम हिंदुस्तानियों द्वारा औसतन 25 हजार किलो सोना खरीदा जाता है, इस सोने का लगभग 10 फीसदी किसी न किसी रूप में चढ़ावे में चला जाता है, अगर देश के 10 बड़ी कमाई वाले मंदिरों की ही संपत्ति को जोड़ें तो यह तकरीबन 60 खरब रुपए के आसपास पहुंचती है। अकेले दक्षिण भारत के तिरुअनंतपुरम स्थित स्वामीपद्मनाभ मंदिर की संपत्ति ही 10 खरब रुपए की आंकी गई है।

अगर हम मंदिरों में हर साल चढ़ने वाले सोने को विकास के कामों में खर्च करें तो रातों रात देश का कायापलट हो सकता है। मंदिर ही इतना सोना मुहैया करा सकते हैं जिस से सरकार देश का अधिसंरचनात्मक विकास कर सकती है। इस से देश के विकास की मौजूदा रफ्तार छह गुना तेज हो सकती है, देश में अगर 2000 नई यूनिवर्सिटीज और 80 हजार नए विभिन्न क्षेत्रों के शिक्षण संस्थान खोल दिए जाएं तो देशमें न सिर्फ साक्षरता दर तेजी से बढ़ेगी बल्कि रोजगार भी सर्जित होंगे, एक तरफ जहां देश में 5 करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हैं, वहीं डेढ़ से पौने 2 करोड़ कुशल कामगारों, प्रशिक्षित प्रोफेशनलों की भारी कमी है।
देश के विभिन्न धार्मिक स्थलों से सरकार अगर ईमानदारी से उन की – “यह संपत्ति बतौर निवेश” ले तथा उन्हें इस का जरूरी लाभ दे तो सभी तरह की बुनियादी व्यवस्था की जा सकती है, देश के तेजी से विकास के लिए 100 खरब रुपए के बुनियादी निवेश की जरूरत है और इस की बहुत आसानी से धार्मिक स्थल पूर्ति कर सकते हैं। इसकी जरुरत इसलिए भी है क्यूँकि भारत शायद दुनिया में एकमात्र ऐसा देश है जहां 10 से 15 फीसदी करेंसी मंदिरों में हमेशा निष्क्रिय अवस्था में पड़ी रहती है।

अब देश कि इस छद्म अमीरी से हट कर वास्तविकता पर भी एक नजर डाले- 2011 की जनगणना रिपोर्ट में ”कोई रोजगार ना करने वाले और उनके शैक्षिक स्तर” का आंकड़ा हाल ही में जारी किया गया है, इसके अनुसार देश में कुल 3.72 लाख भिखारी हैं (ये नोटबंदी जीएसटी से पहले का आकड़ा है, अब कई लाख और बढ़ गये होंगे) लेकिन आप ये जानकर चौंक जाएंगे कि इनमें से बहुत सारे पढ़े लिखे हैं।

जी हां, इन 3.72 लाख भिखारियों में से 21 फीसदी ऐसे हैं जो 12 वीं तक पढ़े लिखे हैं। यही नहीं इनमें से 3000 ऐसे हैं जिनके पास किसी प्रोफेशनल कोर्स का डिप्लोमा है और बहुत सारे ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट हैं।

इन आंकड़ो से एक बात और सामने आई है। ये सब भिखारी अपनी पसंद से नहीं बने बल्कि मजबूरी में बने हैं। सोचिए मंदिरों में निष्क्रिय पड़े पैसे क्या काम आ सकते है।

2011 की हि जनगणना के अनुसार, शहरी भारत में नौ लाख बेघर लोग थे, साथ ही पूरे भारत में बेघरों कि संख्या 32 लाख थी। एक परिवार में 5 सदस्य भी माने तो 6 लाख परिवार खुले में रात गुजारने को मजबूर है। एक अनुमान के मुताबिक देश में प्रति वर्ष लगभग 981 लोगों की मौत ठंड से हो जाती है। अगर हम पिछले 14 वर्षों में ठंड से हुई मौतों के बारे में विचार करें, तो वर्ष 2003 से 2016 के बीच ठंड लगने से लगभग 12,933 लोगों की मौत हो चुकी है और ये सरकारी आंकड़ा है, वास्तविक संख्या बहुत ज्यादा होगी।

सोचिए 15 लाख मंदिर, मस्जिद किस काम आ सकते है, जबकि 6 लाख परिवारो के पास रहने का घर नहीँ है।
सोचते रहिए बाकी वामपंथ तो मुर्दाबाद है सो है हि !!!
और हाँ, अब मैं जब भी किसी धार्मिक स्थल को देखता हूँ तो मेरा सर भी झुक जाता है लेकिन आस्था से नहीं “शर्म” से।

15 दिन बाद, अखबार में किसी मंदिर मजार की सीढ़ीयो पर ठिठुर कर मरे किसी इंसान के बारे में खबर पढ़ो तब सोचना जरुर की पत्थरो की इन इमारतों की असल ज़रुरत किसे है।