मुस्लिम कौम की तबाही और पस्मान्दगी पर सवाल उठाया जाए तो यही जवाब मिलता है

मुस्लिम कौम की तबाही और पस्मान्दगी पर सवाल उठाया जाए तो यही जवाब मिलता है

Posted by

Tanweer Ahmed Shaikh
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#दिल_को_बहलाने_को_गालिब_यह_ख्याल_अच्छा_है ।
जब कभी कौमे मुस्लिम की तबाही और पस्मान्दगी पर सवाल उठाया जाए अधिकांश यही जवाब मिलता है :
– दीन से दूरी
– नमाज से गफलत
– अल्लाह का ख़ौफ़ नहीं ……
मान लेते हैं कि उपरोक्त सभी हालात जिम्मेवार हैं । लेकिन क्या केवल उपरोक्त हालात ही जिम्मेवार हैं ? अन्य कोई कारण नहीं ?
इस्लामी इतिहास में ऐसा कोई दौर(युग) बता दीजिए जब कोई गुनहगार न रहा हो । क्या कौम मुस्लिम में गुनाह का तसवर नहीं है ? क्या ऐसा हो सकता है कि कौम का कोई फर्द गुनाह न करे ? हर दौर(युग) में मुसलमानों के साथ गुनाह और सवाब का तसव्वर रहा है … कयामत तक जारी रहेगा । हर युग का मुस्लिम रोजे महशर में अपने अमल(कर्मों) के आधार पर गुनाह और सवाब की कसौटी पर तौला जाएगा ।
हां यह हो सकता है कि किसी दौर(युग) में गुनाह और सवाब का अनुपात कम या अधिक हो । किन्तु ऐसा तो कोई युग नहीं दिखता जिसमें कौम मुस्लिम से कोई गुनाह न होता हो ।
अल्लाह ने संसार की सभी वस्तुएं, सुविधाएं मुस्लिम, ईसाई, हिन्दू, यहूदी, सिख, काफ़िर, मुनाफिक सबके लिए समान रखी हैं । सूर्य का प्रकाश , हवा , पानी , आग , जमीन , धातु, समुद्र, बादल, मौसम … हर एक से सभी समानरूप से लाभान्वित होते हैं । इसमें ईमान वाले और बिना ईमान वाले के बीच कोई भेदभाव नहीं होता ।
शारीरिक संरचनाएं भी समान हैं । मानसिक संरचनाएं हमारी उन से बेहतर है ।
हां उनके यहां हराम(शुद्ध) और हलाल(अशुद्ध) की कोई पाबंदी नहीं होती जो हमारे यहां है । हम किसी के साथ नाइंसाफी और बेईमानी नहीं कर सकते । यह तो वह भी मानते हैं कि honest is the best policy । तातपर्य यह है कि हराम और हलाल भी हमारे विकास के लिए बाधक नहीं बल्कि अनुकूल है ।
दूसरे हमारे पास पवित्र आसमानी किताब है । एक लिखित जीवन शैली है जिससे हम अपने कर्तव्यों का निर्वहन आसानी से कर सकते हैं । फिर भला हम कैसे प्रगति के मार्ग पर सबसे पीछे रह सकते हैं ?
कुछ अन्य मित्र यह तर्क देते हैं कि दुनिया में मोमिनों के लिए कोई हिस्सा नहीं है … हमें मृत्यु उपरांत #आखरत में हमारा हिस्सा मिलेगा । यह #अनमोल शब्द इसके लिए नहीं हैं कि आड़ लेकर हम अपनी कोताहियो को छुपाएं । यह शब्द इस लिए हैं की दुनिया की चाह में इतने प्रलोभी न हो जाओ की तुम्हें किसी गरीब को दान देते समय दर्द हो , जकात देते समय धन की चिंता न रहे । जालिम और क्रूर शाशक के समक्ष प्राण की चिंता न हो । किसी गरीब की सहायता करते समय हाथ न कांपे ।
क्या हम में से बहुत से लोग नमाज नहीं पढ़ते ? क्या अब से पहले इतनी ऊंची ऊंची मस्जिदें बनी थी ? क्या कभी मस्जिदों की संख्या इतनी थी ? क्या कभी हज पर इतने लोग जाते थे ? क्या कभी इतने कुरआन और हदीस की किताबें प्रकाशित होती थीं ? क्या कभी इतने मदरसे , मोलवी, आलिम, मुफ़्ती, हाफिज होते थे ? मुझे तो नहीं लगता ।।
फिर केवल यह कहकर हम अपनी गफलतों पर पर्दा डाल रेत में मुंह नहीं छुपा सकते ।
हमें अपनी तबाही के असबाब को तलाशना होगा । अमली जिंदगी (व्यवहारिक जीवन) में उन चुनोतियों का सामना किए बिना हम केवल #शाहिद हो सकते हैं । #गाजी नहीं हो सकते …नहीं हो सकते …. नहीं हो सकते ।
कुछ गलत हो तो माफ करना …😢😢😢