“रमैय्या वस्तावैय्या”,,,बस गाने का मुखड़ा फ़ाइनल हो गया!

“रमैय्या वस्तावैय्या”,,,बस गाने का मुखड़ा फ़ाइनल हो गया!

Posted by

Izhar Sayyed Arif
===============
उस समय तो राजा मेहदी खा, शैलेन्द्र, हसरत जैसे कई तो हाथोहाथ गीत लिख दिया करते थे. मैं सुनाऊँ तुम्हें बात उस रात की जब जावेद अख्तर को सिचुएशन बता कर फिल्म “तेज़ाब” का गीत लिखने को को कहा गया. जावेद ने कहा “गाने की धुन” क्या है तो लक्ष्मी -प्यारे ने उन्हें डमी धुन गाकर बताई ” एक दो तीन, चार पांच – छह सात आठ नौ दस ग्यारह-बारह तेरह ……” जावेद ने कहा अच्छी धुन है, बोल भी यही रख लेते है !! तेरह के बाद ……..तेरा करूँ गिन–गिन के इंतज़ार आजा पिया आई बहार ” बस गाने का मुखड़ा फाइनल हो गया .

एक दूसरे मामले में राजकपूर अपने फ्रेंड्स के साथ अपने फार्म हाउस पर अपनी तत्कालीन फिल्म श्री 420 पर डिसकशन के लिए एक ही साथ खुली कर में जा रहे थे , वो थे खुद राज कपूर, हसरत जयपुरी, शंकर, जयकिशन, शैलेन्द्र आदि . मस्ती का माहौल था सभी अलग अलग तान छेड़ रहे थे शैलेन्द्र ने बहुत अजीब से शब्द दोहराने शुरू किये जो उन्होंने शायद किसी पहाड़ी को बोलते सुना था वो शब्द थे ” रमैय्या वस्तावैय्या, रमैय्या वस्तावैय्या” .तभी राजकपूर ने शैलेन्द्र से पूछा यार वो तुमसे जो गाना लिखने को कहा था वो लिखा नहीं तुमने ? शैलेन्द्र ने कहा यही गाना रख लेते है ” रमैय्या वस्तावैय्या,” शंकर ने बात काटने हुवे कहा, लेकिन आगे क्या …? शैलेन्द्र ने एक पल सोचा और कहा ” मैंने दिल तुझको दिया ” शंकर ने इस लाइन को दो बार बोला फिर कहा ” हाँ ठीक है” . राज कपूर संतुष्ट नहीं दिखाई दे रहे थे लेकिन अगले दिन जा इसकी रिहर्सल सुनी तो वो भी ख़ुशी से उछाल पड़े .

मदन मोहन, हसरत जयपुरी, डायरेक्टर K. Raghavendra राव और गुरुदत्त रात भर लगे रहे एक गाना लिखने में लेकिन हसरत के लिखे बोल मदन मोहन को पसंद नहीं आ रहे थे . होते होते सुबह हो गयी. सभी थक चुके थे . हसरत ने कहा चलता हूँ बहुत ज़ोर से नींद आ रही है. मदन मोहन ने उन्हें अपनी कार से छोड़ने को बोला तो उन्होंने कहा ” पास ही तो है, सुबह की ठंडी हवा खाते हुवे चला जाऊंगा . चलते-चलते हसरत की नज़र एक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग पर पड़ी जहाँ एक महिला नहा कर अपने बाल सुखाने के लिए बालकनी में आई थी. उसे देखकर हसरत ने जेब से डायरी निकाली और लिखा “तू मेरे सामने है” महिला तौलिये से अपने बाल झटक रही थी, उन्होंने आगे लिखा “तेरी ज़ुल्फ़ें है खुली” उन्होंने फिर उस महिला की तरफ देखा जिसने अब अपना तौलिया कंधे पर एक तरफ डाल लिया था. … उन्होंने आगे लिखा “तेरा अंचल है ढला” ! उन्होंने कुछ सोचा और फिर लिखा “मैं भला होश में कैसे रहूँ” इसे दुबारा पढ़ते ही वो वापिस तेज़ी से लौटे स्टूडियो की तरफ जहाँ मदन मोहन निकलने ही वाले थे. उन्होने ये लाइने उन्हें सुनाई. उन्हें सुनकर मदन मोहन उनके साथ स्टूडियो के अंदर चले गए. वहां उन्होंने भी अंतिम दो शब्दों को दो बार रिपीट कर दिया…कैसे रहूं, कैसे रहूं, बस फिर क्या था बन गया एक ऐसा गाना जिसे जब भी सुनेंगे तो बार बार सुनना चाहेंगे