#रिसर्च_में_सामने_आई_आबे ज़मज़म_की_खूबियाँ!

#रिसर्च_में_सामने_आई_आबे ज़मज़म_की_खूबियाँ!

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by – सिकन्दर कायमखानी
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हम आपको रूबरू करवा रहे हैं उस इंजीनियर शख्स से जिसने करीब चालीस साल पहले खुद आब-ए-ज़मज़म का निरीक्षण किया था! ज़म-ज़म पानी का सैंपल यूरोपियन लेबोरेट्री में भेजा गया! जांच में जो बातें आई उस से साबित हुआ कि ज़म-ज़म पानी इंसान के लिए रब की बेहतरीन नियामत है!
हज का मौका आने पर मुझे करिश्माई पानी ज़म-ज़म की याद ताजा हो जाती है! चलिए मै आपको देता हूं मेरे द्वारा किए गए इसके अध्ययन से जुड़ी जानकारी! 1971 की बात है, मिस्र के एक डॉक्टर ने यूरोपियन प्रेस को लिखा कि मक्का का ज़म-ज़म पानी लोगों के पीने योग्य नहीं है! मैं तुरंत समझा गया था कि मिस्र के इस डॉक्टर का प्रेस को दिया यह बयान मुसलमानों के खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रसित है! दरअसल इसके इस बयान का आधार था कि काबा समुद्रतल से नीचे है और यह मक्का शहर के बीचों बीच स्थित है! इस वजह से मक्का शहर का गंदा पानी नालों से इस कुएं में आकर जमा होता रहता है!
आबे जमजम पर जापानी वैज्ञानिक का अध्ययन…
यह खबर सऊदी शासक किंग फैसल तक पहुंची! उन को यह बहुत ज्यादा अखरी और उन्होंने मिस्र के इस डॉक्टर के इस प्रोपेगण्डे को गलत साबित करने का फैसला किया! उन्होंने तुरंत सऊदी के कृषि और जल संसाधन मंत्रालय को इस मामले की जांच करने और ज़म-ज़म पानी का एक सैंपल चैक करने के लिए यूरोपियन लेबोरेट्री में भी भेजे जाने का आदेश दिया!
मंत्रालय ने जेद्दा स्थित पावर डिजॉलेशन प्लांट्स को यह जिम्मेदारी सौंपी! मैं यहां केमिकल इंजीनियर के रूप में कार्यरत था और मेरा काम समुद्र के पानी को पीने काबिल बनाना था! मुझे ज़म-ज़म पानी को चैक करने की जिम्मेदारी सौपी गई! मुझे याद है उस वक्त मुझे ज़म-ज़म के बारे में कोई अंदाजा नहीं था! ना यह कि इस कुएं में किस तरह का पानी है! मैं मक्का पहुंचा और मैंने काबा के अधिकारियों को वहां आने का अपना मकसद बताया! उन्होंने मेरी मदद के लिए एक आदमी को लगा दिया! जब हम वहां पहुंचे तो मैंने देखा यह तो पानी का एक छोटा कुण्ड सा था! छोटे पोखर के समान 18-14 का यह कुआं हर साल लाखों गैलन पानी हाजियों को देता है, और यह सिलसिला तब से ही चालू है जब से यह अस्तित्व में आया! यानी कई शताब्दियों पहले हजरत इब्राहीम के वक्त से ही!
आइए मैं आपको ज़म-ज़म के पानी की चंद खूबियों के बारे में बताता हूं…
कभी नहीं सूखा…
ज़म-ज़म का यह कुआं कभी भी नहीं सूखा! यही नहीं इस कुएं ने जरूरत के मुताबिक पानी की आपूति की है! जब-जब जितने पानी की जरूरत हुई, यहां पानी उपलब्ध हुआ!
एक सी साल्ट संरचना…
इस पानी के साल्ट की संरचना हमेशा एक जैसी रही है! इसका स्वाद भी जब से यह अस्तित्व में आया तब से एक सा ही है!
सभी के लिए फायदेमंद…
यह पानी सभी को सूट करने वाला और फायदेमंद साबित हुआ है! इसने अपनी वैश्विक अहमियत को साबित किया है! दुनिया भर से हज और उमरा के लिए मक्का आने वाले लोग इसको पीते हैं और इनको इस पानी को लेकर कोई शिकायत नहीं रही! बल्कि ये इस पानी को बड़े चाव से पीते हैं और खुद को अधिक ऊर्जावान और तरोताजा महसूस करते हैं!
यूनिवर्सल टेस्ट…
अक्सर देखा गया है कि अलग-अलग जगह के पानी का स्वाद अलग-अलग होता है लेकिन ज़म-ज़म पानी का स्वाद यूनिवर्सल है! हर पीने वाले को इस पानी का स्वाद अलग सा महसूस नहीं होता है!
कोई जैविक विकास नहीं…
इस पानी को कभी रसायन डालकर शुद्ध करने की जरूरत नहीं होती जैसा कि अन्य पेयजल के मामले में यह तरीका अपनाया जाता है! यह भी देखा गया है कि आम तौर पर कुओं में कई जीव और वनस्पति पनप जाते हैं! कुओं में शैवाल हो जाते हैं जिससे कुएं के पानी में स्वाद और गंध की समस्या पैदा हो जाती है, लेकिन ज़म-ज़म के कुए में किसी तरह का जैविक विकास का कोई चिह्न भी नहीं मिला!
शताब्दियों पहले बीबी हाजरा अलै. अपने नवजात बच्चे इस्माइल अलै. की प्यास बुझाने के लिए पानी की तलाश के लिए सफा और मरवा पहाडिय़ों के बीच दौड़ लगाती है! इसी दौरान मासूम इस्माइल अलै. अपनी एडिय़ों को रेत पर रगड़ते हैं! अल्लाह के करम से उस जगह पानी निकलने लगता है! फिर यह जगह कुएं का रूप ले लेती है जो जाना जाता है ज़म-ज़म का पानी!
रिसर्च: तारिक हुसैन, रियाद

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#जमज़म_के_कुँआ_की_कहानी
साल गुज़रते गए, सलमा बिन्त अम्र ने अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम यानी नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के दादा को जन्म दिया था, अब्दुल मुत्तलिब बड़े हो गए, और अल्लाह तआला का करना ऐसा हुआ कि वह अपने पिता के नगर मक्का में रहने लगे। अब्दुल मुत्तलिब हज्ज के लिए मक्का आने वाले हाजियों को पानी पिलाया करते थे और अल्लाह के घर की सेवा करते थे। चुनाँचे लोग उनके आस पास एकत्रित हो गए और उन्हें अपना नायक बना लिया। अब्दुल मुत्तलिब अल्लाह के सम्मानित घर से बहुत प्यार करते थे। उन्हों ने ज़मज़म के कुँआ के खोदे जाने के बारे में सुन रखा था। अत: उनके अंदर उसके स्थान को जानने की अभिलाषा पैदा हुई ताकि फिर से उसकी खुदार्इ करें। चुनाँचे एक रात, अब्दुल मुत्तलिब ने सपने में देखा कि कोर्इ उन्हें पुकार कर कह रहा है : ज़मज़म का कुँआ खोदो। यह मामला कर्इ बार घटित हुआ, और उन्हों ने सपने में उसका स्थान भी देखा। जब उन्हों ने अपनी क़ौम को इसकी सूचना दी तो उन्हों ने आपका मज़ाक उड़ाया और आपकी बात की पुष्टि नहीं की। अब्दुल मुत्तलिब के केवल एक ही बेटा था जिसका नाम हारिस था। उन्हों ने उससे कुँआ खोदने में उनकी सहायता करने के लिए कहा, चुनाँचे अब्दुल मुत्तलिब और उनके बेटे हारिस ने मिलकर ज़मज़म का कुँआ खोदा।
by सिकन्दर कायमखानी