विवादों में EVM मशीनें_कितनी सुरक्षित है!!देखें वीडियो!!

विवादों में EVM मशीनें_कितनी सुरक्षित है!!देखें वीडियो!!

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ईवीएम विवादों में फंसी हुई है, हाल ही उत्तर प्रदेश में हुए नगर निकाय चुनावों में कानपुर के अलाव और भी कई जगहों से EVM के ख़राब होने और इन में गड़बड़ी के समाचार आये हैं, कानपुर का वीडियो भी सोशल मीडिया में वायरल हुआ है, वीडियो में कितनी सत्यता है यह तो चुनाव आयोग ही बता सकता है पर इन घटनाओं ने एक बार फिर से जनता के मन में EVM मशीनों को लेकर शंका पैदा कर दी है, जल्द ही गुजरात में चुनाव होने जा रहे हैं वहां भी EVM मशीनों से ही चुनाव होने हगैं, चुनाव आयोग को चाहिए कि राजनैतिक पार्टियों के साथ साथ जनता की तरफ से हो रहे विरोध पर भी ध्यान दे|

चुनाव में लगातार हार का सामना कर रहे दलों ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को फिर से सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है. यूपी निकाय चुनाव के बाद सपा और बसपा नेता इसे लेकर ज्यादा बयानबाजी कर रहे हैं.

चुनाव आयोग राजनीतिक दलों की बयानबाजी की परवाह नहीं कर रहा. आयोग का दावा है कि किसी रिमोट डिवाइस के जरिए ईवीएम को हैक करने की कोई गुंजाइश नहीं है. क्योंकि ईवीएम कंप्‍यूटर नियंत्रित नहीं है. वो अपने-आप में स्वतंत्र मशीनें हैं. वो इंटरनेट या किसी अन्य नेटवर्क के साथ किसी भी समय कनेक्‍टेड नहीं हैं.

ईवीएम में वायरलेस या किसी बाहरी हार्डवेयर पोर्ट के लिए कोई फ्रीक्वेंसी रिसीवर नहीं है. इसलिए हार्डवेयर पोर्ट, वायरलेस, वाईफाई या ब्लूटूथ डिवाइस के जरिए किसी प्रकार की टैम्परिंग या छेड़छाड़ संभव नहीं है. कंट्रोल यूनिट (सीयू) और बैलेट यूनिट (बीयू) से केवल एन्क्रिप्टेड या डाइनामिकली कोडिड डेटा ही स्वीकार किया जाता है. सीयू द्वारा किसी अन्य प्रकार का डेटा स्वीकार नहीं किया जा सकता.

चुनाव आयोग में मीडिया एवं कम्‍युनिकेशन के एडिशनल डायरेक्‍टर जनरल राजेश मल्‍होत्रा का कहना है कि यदि मशीन किसी के हाथ से गिर जाती है तो भी इसमें गड़बड़ी नहीं होगी. आयोग ने कहा है कि उसकी ईवीएम स्‍वदेशी तरीके से बनाई गई हैं. पब्‍लिक सेक्‍टर की दो कंपनियां भारत इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स लिमिटेड, बंगलूरु एवं इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद में ये मशीनें बनाती हैं.

इसके सॉफ्टवेयर प्रोग्राम कोड ये दोनों कंपनियां आं‍तरिक तरीके से तैयार करती हैं. उन्‍हें आउटसोर्स नहीं किया जाता. प्रोग्राम को मशीन कोड में कन्‍वर्ट किया जाता है. उसके बाद ही विदेशों के चिप मैन्‍युफेक्‍चरर को दिया जाता है क्‍योंकि हमारे पास देश के भीतर सेमीकंडक्‍टर माइक्रोचिप निर्माण करने की क्षमता नहीं है.

आयोग के मुताबिक हर माइक्रोचिप के पास मेमोरी में एक पहचान संख्‍या होती है. उन पर निर्माण करने वालों के डिजिटल हस्‍ताक्षर होते हैं. माइक्रोचिप को हटाने की किसी भी कोशिश का पता लगाया जा सकता है. साथ ही ईवीएम को निष्‍क्रिय बनाया जा सकता है.

सवाल ये भी उठ रहा है कि क्या ईवीएम का निर्माण करने वाले इसमें कोई गड़बड़ी कर सकते हैं? इस पर आयोग का कहना है कि ऐसा संभव नहीं है. सॉफ्टवेयर की सुरक्षा के बारे में निर्माण के स्तर पर कड़े सुरक्षा प्रोटोकोल हैं.

निर्माण के बाद ईवीएम को राज्य और किसी राज्य के भीतर जिले में भेजा जाता है. निर्माता इस स्थिति में नहीं हो सकते कि वे कई वर्ष पहले ये जान सकें कि कौन सा उम्मीदवार किस निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ेगा और बैलेट यूनिट में उम्मीदवारों की सीक्वेंस क्या होगी.

हर ईवीएम का होता है सीरियल नंबर
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चुनाव आयोग के मुताबिक हर ईवीएम का एक सीरियल नंबर है. निर्वाचन आयोग ईवीएम-ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके अपने डेटा बेस से यह पता लगा सकता है कि कौन सी मशीन कहां पर है. इसलिए कोई गड़बड़ी होने की संभावना नहीं है.

आयोग ने कहा है कि उसके ईवीएम मॉडल-3 में टेंपर डिटेक्शन एवं सेल्फ डाइगनोस्टिक्स जैसी अतिरिक्त विशेषताएं हैं. जैसे ही कोई व्यक्ति मशीन खोलने का प्रयास करता है, ईवीएम निष्क्रिय हो जाती है. सेल्फ डाइगनोस्टिक्स सिस्‍टम ईवीएम स्विच ऑन करते ही पूरी तरह मशीन की जांच करता है. इसके हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर में किसी भी परिवर्तन का इससे पता लग जाएगा.